Vinayak Pathak/AI-Generated Image
सारांशः एक नियम ने चीनी CCTV ब्रांड को रातोंरात बाज़ार से बाहर कर दिया. यह CP Plus के लिए वरदान साबित हुआ. बिक्री दोगुनी हो गई और शेयर भी, जो अब 110 गुनी अर्निंग्स पर ट्रेड करता है. आसान ग्रोथ का दौर बीत चुका है. आगे जो आएगा वो कमाना मुश्किल होगा.
सबसे अच्छे क़ारोबार हमेशा क़ाबिलियत से नहीं जीतते. कभी-कभी सरकार कोई नियम बदल देती है और जो सही जगह खड़ा होता है उसे बाज़ार मिल जाता है.
CP Plus के साथ यही हुआ, जो Aditya Infotech का मुख्य ब्रांड है. अप्रैल 2024 में भारत सरकार ने CCTV हार्डवेयर के लिए साइबर सुरक्षा की जांच पास करना ज़रूरी कर दिया. बाज़ार में मज़बूत पकड़ वाले चीनी ब्रांड यह जांच पास नहीं कर पाए.
CP Plus ने उनके जाने से ख़ाली हुई ज़्यादातर जगह भर दी है. इसके बाद से इसकी बिक्री फ़ाइनेंशियल ईयर 23 के मुक़ाबले दोगुने से ज़्यादा हो गई है. शेयर भी लिस्टिंग के बाद से दोगुने से ज़्यादा हो गया है. यह अब 110 गुना कमाई पर ट्रेड करता है.
लहर वाजिब थी. पर सवाल यह है कि क्या क़ीमत अगली लहर को भी पहले ही खा चुकी है.
यहां तक कैसे पहुंची कंपनी
Aditya Infotech आंध्र प्रदेश में अपनी फ़ैक्ट्री में कैमरे असेंबल करती है और 550 शहरों में 1,000 से ज़्यादा डीलरों के ज़रिए बेचता है. ग्राहकों में छोटे क़ारोबार से लेकर बड़े सरकारी प्रोजेक्ट तक शामिल हैं. कंपनी सीधे नहीं बेचती, यह काम डीलर करते हैं.
सरकारी नियम का साथ, ज़्यादा क़ीमत वाले IP कैमरों की तरफ़ बदलाव और बड़े पैमाने पर काम करने के फ़ायदे ने तीन सालों में EBIT मार्जिन को 310 बेसिस पॉइंट यानी क़रीब 3 प्रतिशत पॉइंट ऊपर धकेला.
एक अहम क़दम था फ़ैक्ट्री पर पूरा कंट्रोल लेना. Dixon Technologies के साथ मिलकर शुरू हुई यह फ़ैक्ट्री सितंबर 2024 में Aditya Infotech ने पूरी तरह ख़रीद ली, जिससे उसे निग़रानी फ़ैक्ट्री पर पूरा कंट्रोल मिल गया. फ़ैक्ट्री अभी हर महीने क़रीब 19 लाख यूनिट बना रही है, जिसे FY27 तक 24-25 लाख यूनिट तक ले जाने का लक्ष्य है. Dixon ने तब से कंपनी में अपनी हिस्सेदारी Q4 FY26 में 6.2% से घटाकर 2.3% कर ली है.
| आंकड़ा | FY23 | FY24 | FY25 | TTM |
|---|---|---|---|---|
| बेची गई यूनिट (करोड़) | 1.09 | 1.42 | 1.56 | — |
| बिक्री (करोड़ ₹) | 2,285 | 2,782 | 3,112 | 3,776 |
| EBIT मार्जिन (%) | 6.5 | 7.6 | 6.9 | 9.6 |
CP Plus के पास भारतीय निगरानी बाज़ार के बड़े और जाने-माने हिस्से का क़रीब 20.8% है, जो FY25 में कैमरा हार्डवेयर और मुख्य सॉफ़्टवेयर मिलाकर ₹10,620 करोड़ का था. छोटे और अनजाने क़ारोबारियों को मिलाकर पूरा बाज़ार ₹15,900 करोड़ का होने का अनुमान है. बिक्री की संख्या के हिसाब से CP Plus हर साल बेचे जाने वाले अनुमानित 4 करोड़ यूनिट का क़रीब 40% है, लेकिन पैसों में हिस्सा कम है.
ग्राहकों का हाल बताता है, क्यों: 60% छोटे और मध्यम क़ारोबार, 30% बड़े क़ारोबार और सरकार, 10% रेजिडेंशियल. यह मास मार्केट में क़ीमत के दम पर बना क़ारोबार है, जो बड़ा बाज़ार है लेकिन जहां हर ऑर्डर छोटा होता है और मार्जिन एक सीमा से ज़्यादा नहीं बढ़ सकता.
आसान दौर क्यों ख़त्म हो गया
चीनी ब्रांड की विदाई का असर अब पूरी तरह आ चुका है. भारतीय कंपनियों ने भी उसी सरकारी बदलाव का फ़ायदा उठाया. जो बचा है वो ख़ाली जगह भरना नहीं, बल्कि बाज़ार के लिए मुक़ाबला है.
मुक़ाबला कड़ा है. Prama Hikvision के पास CP Plus के 45 के मुक़ाबले 58 सरकार से मंज़ूर मॉडल हैं, वसई में एक ऐसी फ़ैक्ट्री है जो हर महीने 15 लाख यूनिट बनाती है और FY25 में ₹3,372 करोड़ की बिक्री थी, जो CP Plus के लगभग बराबर है.
बड़े क़ारोबार और सरकारी ग्राहक, जहां मुनाफ़ा और ग्राहकों की वफ़ादारी काफ़ी बेहतर है, बड़े ठेकेदारों के ज़रिए मुक़ाबले की बोलियों में ख़रीदते हैं, जहां Bosch और Honeywell के दशकों पुराने रिश्ते हैं. एक और लिस्टेड कंपनी Prizor Viztech ने दो साल में बिक्री चार गुना की और उसी लहर पर एक साल में शेयर छह गुना चढ़ गया. बाज़ार का दरवाज़ा अभी भी खुला है.
आगे मांग में एक बड़ा फ़ासला भी है. IP कैमरे पांच से सात साल चलते हैं. FY24 और FY25 में जो कैमरे लगे, उन्हें FY31 से FY33 तक बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. नई ग्रोथ नए लगाए जाने से आनी होगी, जो बाहर गए ब्रांड की जगह भरने से धीमी और ज़्यादा मुक़ाबले वाली है.
कच्चे माल की लागत पर भी दबाव है. क़रीब 60% सामान बाहर से आता है, चिपसेट, मेमोरी, सेंसर. फ़्लैश मेमोरी की क़ीमतें बढ़ रही हैं. मैनेजमेंट ने दो अंकों में क़ीमत बढ़ाने की ज़रूरत बताई है. ऐसे बाज़ार में जहां हर भारतीय कंपनी के पास सरकारी मंज़ूरी और अपना डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क है, यह बढ़ोतरी ग्राहकों तक पहुंचाना आसान नहीं होगा.
सॉफ़्टवेयर पर मैनेजमेंट ने SaaS यानी सब्सक्रिप्शन के ज़रिए बार-बार मिलने वाली कमाई की तरफ़ धीरे-धीरे जाने का इरादा बताया है. सोच सही है. लेकिन अभी तक कुछ ख़ास नहीं हुआ: FY25 में सर्विस से कमाई ₹4 करोड़ से कम थी. इस बीच कैश मैनेजमेंट कंपनी CMS Info पहले से ही एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च कर चुकी है जो सर्विस देने को पहले रखता है और दूर बैठकर निग़रानी करता है. सॉफ़्टवेयर की तरफ़ जाना एक भीड़ भरी दौड़ है, साफ़ रास्ता नहीं.
कैश कन्वर्ज़न का हाल कमज़ोर है. FY25 में ₹109 करोड़ के कुल मुनाफ़े के मुक़ाबले ऑपरेटिंग कैश फ़्लो सिर्फ़ ₹27 करोड़ रहा. H1 FY26 तक डीलरों का बक़ाया पैसा ₹1,054 करोड़ था, जो कुल एसेट का 30% है. पैसा बैंक में नहीं, डीलरों के पास पड़ा रहता है. कैश कन्वर्ज़न साइकिल यानी सेल्स को असल कैश में बदलने में लगने वाला समय H1 FY26 में थोड़ा बेहतर हुआ, जो अच्छी बात है. लेकिन दिखाए गए मुनाफ़े और असल में जेनरेट होने वाले कैश के बीच लगातार बना रहने वाला यह अंतर इस क़ारोबार की ख़ासियत है,न कि कोई अस्थायी उतार-चढ़ाव.
110 गुना कमाई पर असल में क्या चाहिए
CP Plus ने जो क़ारोबार बनाया है वो असली है: दो दशकों में बने मज़बूत नेटवर्क, सर्विलांस में मज़बूत घरेलू पैठ और एक फ़ैक्ट्री जिस पर अब पूरा कंट्रोल है. समस्या क़ारोबार नहीं है. समस्या क़ीमत है.
जो निवेशक पांच साल में 15% सालाना रिटर्न चाहता है, उसके लिए CP Plus को प्रति शेयर अर्रिंग्स में सालाना 26% बढ़ानी होगी और शेयर अब भी 70 गुना अर्निंग्स पर बना हुआ है. अगर यह 40 गुने पर आ जाए, जो एक पुराने हार्डवेयर क़ारोबार के लिए सही सोच है, तो उसी नतीजे के लिए अर्निंग्स सालाना 41% बढ़नी होगी.
सरकारी नियम का साथ पीछे छूट चुका है. मुक़ाबला कड़ा है. कई ग्रोथ के रास्ते अभी शुरुआती दौर में हैं. 110 गुना अर्निंग्स पर ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं है. अच्छा लेकिन साधारण प्रदर्शन भी यहां से मज़बूत रिटर्न देने की संभावना नहीं रखता.
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