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सारांशः कोई प्रमोटर अपने शेयर गिरवी रख सकता है, और कोई कंपनी कमज़ोर दौर से गुज़र सकती है और अक्सर दोनों संभल भी जाते हैं. पर जब ये दोनों बातें एक ही शेयर में एक साथ दिखें, तब क्या होता है? यह जानने के लिए हमने एक स्क्रीन चलाई, और उसमें पकड़ा गया हर नाम वहां होने लायक़ नहीं है. फ़ैसला करने से पहले क्या देखना है, यह रहा.
एक दुकानदार के बारे में सोचिए, जिसने चुपचाप अपनी दुकान किसी साहूकार के पास गिरवी रख दी है, पर हर सुबह शटर अब भी उठाता है. बाहर से देखने पर सब ठीक लगता है. मुसीबत उस दिन शुरू होती है, जिस दिन साहूकार अपना पैसा वापस मांगता है, और दुकान की क़ीमत कर्ज़ से कम निकलती है.
प्रमोटर जब अपने शेयर गिरवी रखते हैं, तो कुछ ऐसा ही होता है. प्रमोटर प्लेजिंग का मतलब है कि कंपनी को चलाने वाले लोग कर्ज़ लेते हैं, और उसके बदले अपने ही शेयर गिरवी रख देते हैं. यह कर्ज़ उनका अपना होता है, कंपनी का नहीं, इसलिए यह कंपनी के खातों में कभी दिखता ही नहीं.
ये दोनों बातें साथ हों, तभी असली ख़तरा है
इन दोनों में से कोई एक ख़तरा अकेले हो, तो कंपनी आमतौर पर संभल जाती है. बहुत से प्रमोटर कारोबार बढ़ाने के लिए शेयर गिरवी रखते हैं, और बाद में छुड़ा भी लेते हैं. और बहुत सी कंपनियां कमज़ोर दौर से गुज़रकर फिर से पटरी पर आ जाती हैं.
पर जब दोनों एक साथ हों, तो ये एक-दूसरे से अलग नहीं रहते. गिरवी रखी चीज़ की क़ीमत उतनी ही होती है, जितना उसका बाज़ार भाव. अगर शेयर का प्राइस काफ़ी गिर जाए, तो कर्ज़ देने वाला प्रमोटर से और पैसा या और शेयर मांगता है. और अगर प्रमोटर यह नहीं दे पाता, तो कर्ज़ देने वाला वो शेयर खुले बाज़ार में बेच देता है. यह बिकवाली प्राइस को और नीचे धकेलती है, जिससे और शेयर बेचने की नौबत आ सकती है.
अब इसमें एक ऐसी कंपनी जोड़ दीजिए, जिसके पास पहले से ही कैश की कमी है. कंपनी प्रमोटर को सहारा नहीं दे सकती, प्रमोटर शेयर को सहारा नहीं दे सकता, और गिरता प्राइस नया पैसा जुटाना और मुश्किल बना देता है. यानी कमज़ोर बैलेंस शीट, मार्जिन कॉल को एक ऐसे चक्र में बदल देती है, जिससे निकलना मुश्किल हो जाता है. यह स्क्रीन इसी जोखिम को ढूंढ रही है.
डेटा क्या कहता है
हमने वैल्यू रिसर्च के शेयरों में से वो कंपनियां छांटीं, जिनका ऑल्टमैन ज़ेड-स्कोर 2.99 से कम है, जिनके प्रमोटरों ने 30% या उससे ज़्यादा शेयर गिरवी रखे हैं और जिनका मार्केट कैप ₹500 करोड़ से ज़्यादा है. ऑल्टमैन ज़ेड-स्कोर कई फ़ाइनेंशियल रेशियो को मिलाकर एक नंबर देता है, जो बताता है कि कंपनी के दिवालिया होने का जोखिम कितना है. 2.99 से ऊपर का स्कोर सुरक्षित माना जाता है, 1.81 से 2.99 के बीच का ग्रे ज़ोन और 1.81 से नीचे का संकट वाला ज़ोन.
इसमें 9 नाम निकले, और यह अपने आप में दूसरी ध्यान देने वाली बात है. ज़्यादातर गिरवी रखे शेयर ऐसी कंपनियों के होते हैं, जिनकी बैलेंस शीट ठीक-ठाक होती है. और ज़्यादातर कमज़ोर बैलेंस शीट वाली कंपनियों के प्रमोटरों के पास गिरवी रखने लायक़ ज़्यादा कुछ बचा ही नहीं होता. इसलिए दोनों का एक साथ मिलना कम ही होता है.
| कंपनी | सेक्टर | मार्केट कैप (₹ करोड़) | ऑल्टमैन ज़ेड-स्कोर | गिरवी रखे प्रमोटर शेयर (%) |
|---|---|---|---|---|
| Afcons Infrastructure | Industrials | 8,921 | 1.6 | 50.2 |
| B L Kashyap and Sons | Industrials | 1,174 | 2.3 | 58.3 |
| BGR Energy Systems | Industrials | 1,869 | -1 | 30 |
| CIAN Agro Industries & Infrastructure | Consumer Staples | 2,796 | 2.3 | 30 |
| India Power Corporation | Energy & Utilities | 620 | 2.4 | 40 |
| Kirloskar Electric Company | Industrials | 859 | 1.9 | 37.5 |
| Shalimar Paints | Materials | 635 | 2 | 52.9 |
| Sical Logistics | Industrials | 686 | -1 | 41.2 |
| True Green Bio Energy | Consumer Discretionary | 617 | 1.9 | 35.2 |
| स्क्रीन 8 अक्तूबर 2026 को चलाई गई. गिरवी वाले शेयरों का डेटा जून 2026 तिमाही के शेयरहोल्डिंग पैटर्न से. यहां दिखाए गए स्कोर पुराने फ़ाइनेंशियल आंकड़ों के हिसाब पर टिके हैं, और इन्हें ख़रीदने या बेचने की सलाह न समझें. | ||||
एक नाम, जिसे ज़्यादा सावधानी से पढ़िए
Afcons Infrastructure इस लिस्ट की सबसे बड़ी कंपनी है और स्क्रीन इसे ग़लत पढ़ती है. इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन का काम करने वाली कंपनियां लंबे प्रोजेक्ट पर कम मार्जिन कमाती हैं, और उन पर बड़ी देनदारियां होती हैं, जैसे ग्राहकों से मिला एडवांस, रिटेंशन मनी और सप्लायरों को चुकाने वाली रक़म, जिनसे काम चलता है. ज़ेड-स्कोर इन दोनों बातों को कमज़ोरी का संकेत मानता है, जबकि कॉन्ट्रैक्ट का कारोबार असल में ऐसे ही चलता है. फिर भी, इसके गिरवी शेयरों को समझना ज़रूरी है. पर अपने आप में इसका कम स्कोर कुछ तो इसके कारोबार के तरीक़े की वजह से भी है. यही बात कंस्ट्रक्शन और इंजीनियरिंग वाले बाक़ी दो नामों, B L Kashyap and Sons और BGR Energy Systems, पर भी लागू होती है.
क्या देखें, इसी क्रम में
प्रमोटर के गिरवी शेयर अभी हमारे स्क्रीनर में फ़िल्टर के तौर पर नहीं हैं, इसलिए यह काम शेयर के पेज पर हाथ से करना होगा. नीचे की तस्वीरों में Afcons Infrastructure की मिसाल से दिखाया गया है कि हर नंबर कहां मिलता है.
1. वैल्यू रिसर्च स्टॉक रेटिंग, जो क्वालिटी, ग्रोथ और वैल्यूएशन को पहले ही एक नज़रिए में समेट देती है.

Afcons Infrastructure की वैल्यू रिसर्च रेटिंग
2. ऑल्टमैन ज़ेड-स्कोर: कंपनी किस ज़ोन में है, और क्यों.

Afcons Infrastructure का ऑल्टमैन ज़ेड-स्कोर
3. पिछली चार तिमाहियों में गिरवी शेयरों का रुझान, और गिरवी रखने की बताई गई वजह. अगर गिरवी बढ़ रहे हैं और वजह कर्ज़ चुकाना है, तो यही असली चेतावनी है.

Afcons Infrastructure का शेयरहोल्डिंग पैटर्न
4. क्या कारोबार अपना ख़र्च ख़ुद उठा पा रहा है: डेट-टू-इक्विटी और इंटरेस्ट कवरेज.

Afcons Infrastructure के सॉल्वेंसी रेशियो
सबक़
जब गिरवी शेयरों वाला प्रमोटर ऐसी कंपनी के ऊपर बैठा हो, जिसके आंकड़े पहले से संकट का इशारा कर रहे हों, तो हर मुसीबत दूसरी को सुलझाना और मुश्किल बना देती है. इसलिए गिरवी शेयरों का स्तर नहीं, उनकी दिशा देखिए.
अपनी किसी एक कंपनी का शेयरहोल्डिंग पैटर्न खोलिए. अगर गिरवी रखे शेयर शून्य हैं, तो आपने 30 सेकंड में कुछ सीख लिया. और अगर शून्य नहीं हैं, तो आपके सामने पढ़ने के लिए चार तिमाहियां हैं.
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