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लो-वोलैटिलिटी फ़ंड क्यों गिरावट में नहीं बचा पाए?

इंडेक्स के नियम ने ठीक उन्हीं कंज़्यूमर स्टॉक्स पर दांव बढ़ाया, जो अगले एक साल में 22 प्रतिशत गिर गए

इंडेक्स के नियम ने ठीक उन्हीं कंज़्यूमर स्टॉक्स पर दांव बढ़ाया, जो अगले एक साल में 22 प्रतिशत गिर गएAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः जब बाज़ार में उथल-पुथल होती है, तब लो-वोलैटिलिटी इंडेक्स फ़ंड कम झटकों वाले सफ़र का वादा करते हैं. इस साल उस वादे की असली परीक्षा हुई. इनके लिए स्टॉक चुनने वाला नियम सिर्फ़ एक चीज़ देखता है और बाक़ी बहुत कुछ नज़रअंदाज़ कर देता है. यही कमी इन फ़ंड्स के बारे में उनके नाम से कहीं ज़्यादा बताती है.

लो-वोलैटिलिटी इंडेक्स फ़ंड शेयरों में निवेश के एक सहज, कम झटकों वाले तरीक़े के तौर पर बेचे जाते हैं. इस साल ऐसा नहीं हुआ. जो दो इंडेक्स सिर्फ़ कम वोलैटिलिटी के आधार पर स्टॉक चुनते हैं, उन्होंने उतना ही या उससे भी ज़्यादा गंवाया, जितना वो बाज़ार गिरे जिन्हें वो ट्रैक करते हैं.

छुपे नगीनेः क्या कहता है डेटा?

शेयर मार्केट कैप (₹ करोड़) P/E ROE (%) 5 साल का औसत ROE (%) डेट-टू-इक्विटी 5 साल में EPS की सालाना ग्रोथ (%) संस्थागत हिस्सेदारी (%) स्टॉक रेटिंग
Jindal Poly Investment and Finance Company 930 1.2 54.8 45.9 0.01 19.7 0.48 5 स्टार
Kothari Petrochemicals 646 9 21.4 24.1 0 20.4 0.18 5 स्टार
Kamdhenu 962 11.2 22.5 22.5 0 26.8 3.73 5 स्टार
डेटा 27 अक्टूबर 2026 का. स्रोत: वैल्यू रिसर्च

हम सिर्फ़ दो इंडेक्स को क़रीब से देख रहे \हैं और इसकी एक वजह है. 11 इंडेक्स फ़ंड और ETF इन्हें फ़ॉलो करते हैं और ये दोनों सिर्फ़ कम वोलैटिलिटी के आधार पर स्टॉक चुनते हैं. NSE के कुछ और इंडेक्स के नाम में भी लो-वोलैटिलिटी है, लेकिन उनमें से सिर्फ़ एक, Nifty Alpha Low-Volatility 30, को ट्रैक करने वाले फ़ंड मौजूद हैं. यह उन स्टॉक्स को भी तलाशता है जिन्होंने हाल में बाज़ार को पीछे छोड़ा है, इसलिए इसे लो-वोलैटिलिटी की सीधी कसौटी नहीं माना जा सकता. जैसा कि टेबल में दिखता है, इसने Nifty 100 से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया. NSE के बाक़ी लो-वोलैटिलिटी इंडेक्स को भारत में कोई फ़ंड फ़ॉलो नहीं करता. BSE का भी अपना एक ऐसा इंडेक्स है, जिसे तीन फ़ंड फ़ॉलो करते हैं. ये स्टोरी सिर्फ़ NSE के इंडेक्स पर टिकी है.

नज़र सिर्फ़ पिछले साल के प्राइस पर

दोनों इंडेक्स स्टॉक चुनने के लिए एक ही पैमाना इस्तेमाल करते हैं: पिछले एक साल में उनके प्राइस में कितना उतार-चढ़ाव हुआ. Nifty100 Low Volatility 30, Nifty 100 के 30 सबसे स्थिर स्टॉक चुनता है और सबसे स्थिर स्टॉक को सबसे ज़्यादा वेटेज देता है. यह हर तिमाही अपनी लिस्ट रिव्यू करता है. Nifty500 Low Volatility 50, Nifty 500 में से 50 स्टॉक चुनता है और हर साल जून और दिसंबर में अपनी लिस्ट बदलता है.

दोनों में से कोई भी नियम ये नहीं देखता कि कंपनी कितना कमाती है या उसके शेयर कितने महंगे हैं. पिछले साल जो स्टॉक स्थिर रहा, वो इंडेक्स में आ जाता है, फिर चाहे आगे स्थिर रहे या न रहे.

स्थिर कंज़्यूमर स्टॉक्स का सबसे बुरा साल

इस नियम ने Nifty100 Low Volatility 30 को साबुन, बिस्कुट और सिगरेट बनाने वाली कंपनियों से भर दिया. लोग ये चीज़ें अच्छे-बुरे हर दौर में ख़रीदते हैं और इनके शेयरों में भी ज़्यादा हलचल नहीं हुई थी. सितंबर 2025 के आख़िर में इंडेक्स में ITC, Hindustan Unilever, Britannia और Nestle India का वेटेज 15.3 प्रतिशत था. Nifty 100 में ऐसी कंज़्यूमर कंपनियों का हिस्सा सिर्फ़ 7.7 प्रतिशत था. चार्ट दिखाता है कि इंडेक्स का मिक्स बाज़ार से कितना अलग था.

यह दांव उल्टा पड़ गया. ऐसी कंज़्यूमर कंपनियों को ट्रैक करने वाला Nifty FMCG इंडेक्स साल भर में 22 प्रतिशत गिरा, जो Nifty 100 की गिरावट के दोगुने से भी ज़्यादा है. ITC के शेयर 36.6 प्रतिशत और Britannia के 22.8 प्रतिशत गिरे.

इंडेक्स में Nifty 100 के 4.6 प्रतिशत के मुक़ाबले 16.5 प्रतिशत के आंकड़े के साथ, हेल्थकेयर स्टॉक्स भी ज़्यादा थे और Nifty Healthcare इंडेक्स 3.6 प्रतिशत चढ़ा. इससे मदद तो मिली, लेकिन इतनी नहीं कि इंडेक्स आगे निकल पाता. बैंकों और दूसरी फ़ाइनेंशियल कंपनियों का कम हिस्सा होने से भी ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा, क्योंकि Nifty Financial Services इंडेक्स भी क़रीब-क़रीब Nifty 100 जितना ही गिरा.

नाम पिछले साल की कहानी है, अगली गिरावट की नहीं

ये लेबल आपको बस इतना बताता है कि पिछले साल फ़ंड के स्टॉक्स का व्यवहार कैसा रहा. 2026 में नियम के पसंदीदा सेक्टरों में से एक, कंज़्यूमर गुड्स, का साल किसी भी बड़े सेक्टर के मुक़ाबले सबसे ख़राब रहा.

अगर आपने इनमें से कोई फ़ंड इसलिए लिया है कि सफ़र आराम से कटे, तो उसका मंथली पोर्टफ़ोलियो ज़रूर देखें. अगली गिरावट में वो कैसा टिकेगा, ये उसके नाम से ज़्यादा इस बात से पता चलता है कि उसमें कौन-से सेक्टर हैं.

यह भी पढ़ेंः क्या मुझे तीन साल की अवधि के लिए डेट फ़ंड में निवेश करना चाहिए?

ये लेख पहली बार अक्तूबर 28, 2026 को पब्लिश हुआ.

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