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सारांशः कुछ साल पहले तक तीन साल से ज़्यादा के निवेश के लिए डेट फ़ंड, FD से स्पष्ट रूप से बेहतर माने जाते थे, क्योंकि उनमें इंडेक्सेशन के साथ 20% टैक्स लगता था. 1 अप्रैल 2023 के बाद ये फ़ायदा ख़त्म हो गया. अब डेट फ़ंड का मुनाफ़ा भी FD के ब्याज की तरह आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल है. फिर भी डेट फ़ंड में कुछ फ़ायदे बचे हैं, पर वो उतने बड़े नहीं हैं जितने पहले थे.
क्या तीन साल की अवधि के लिए डेट फ़ंड में निवेश करना ठीक रहेगा? - एक पाठक
सीधे शब्दों में कहें तो हां, किया जा सकता है. लेकिन अब इसकी वजह टैक्स में बड़ी बचत नहीं है. आइए समझते हैं.
पहले क्या था
जिन लोगों के पास निवेश की तय अवधि होती है, वो आमतौर पर FD चुनते हैं. पहले डेट फ़ंड इसलिए बेहतर माने जाते थे क्योंकि तीन साल से ज़्यादा रखने पर उनके मुनाफ़े पर इंडेक्सेशन के साथ 20% टैक्स लगता था. इंडेक्सेशन से ख़रीद की लागत महंगाई के हिसाब से बढ़ जाती थी, जिससे टैक्सेबल मुनाफ़ा काफ़ी घट जाता था. 30% स्लैब वाले निवेशक के लिए ये फ़र्क हज़ारों रुपये का होता था.
अब क्या बदल गया
1 अप्रैल 2023 या उसके बाद ख़रीदी गईं डेट फ़ंड यूनिट पर इंडेक्सेशन का फ़ायदा नहीं मिलता. ऐसे फ़ंड का मुनाफ़ा, चाहे आप उसे कितने भी समय तक रखें, शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन माना जाता है और आपकी कुल आय में जुड़कर स्लैब रेट पर टैक्सेबल होता है. यानी टैक्स रेट के मामले में डेट फ़ंड और FD अब बराबर हैं.
1 अप्रैल 2026 से नया इनकम टैक्स एक्ट, 2025 लागू हो गया है. इसमें सेक्शन नंबर बदल गए हैं, पर डेट फ़ंड पर टैक्स का यही नियम जारी है. नए एक्ट में ऐसे फ़ंड को 'स्पेसिफ़ाइड म्यूचुअल फ़ंड' कहा गया है, यानी वो फ़ंड जो अपना 65% से ज़्यादा पैसा डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट में लगाते हैं.
अगर आपके पास 1 अप्रैल 2023 से पहले ख़रीदीं गईं डेट फ़ंड यूनिट हैं, तो उन पर नियम अलग है. उन्हें 24 महीने से ज़्यादा रखकर बेचने पर बिना इंडेक्सेशन के 12.5% टैक्स लगता है.
ऐसे समझिए हिसाब
मान लीजिए आप 30% टैक्स स्लैब में हैं और तीन साल के लिए ₹15 लाख लगाते हैं. एक बार FD में और एक बार डेट फ़ंड में. दोनों पर 7% सालाना रिटर्न मान लेते हैं.
FD के ब्याज पर टैक्स हर साल बनता है, भले ही आप ब्याज न निकालें. इसलिए हम मान रहे हैं कि हर साल का टैक्स उसी ब्याज से चुकाया जाता है और बाक़ी रकम दोबारा 7% पर लगती है. डेट फ़ंड में टैक्स सिर्फ़ बेचते समय लगता है.
| FD | डेट फ़ंड | |
|---|---|---|
| निवेश | ₹15,00,000 | ₹15,00,000 |
| सालाना रिटर्न | 7% | 7% |
| टैक्स कब देना होगा | हर साल | सिर्फ़ बेचने पर |
| तीन साल में कुल टैक्स | ₹99,206 | ₹1,01,269 |
| टैक्स के बाद हाथ में रकम | ₹17,31,481 | ₹17,36,295 |
डेट फ़ंड में टैक्स थोड़ा ज़्यादा चुकाना पड़ता है, फिर भी हाथ में क़रीब ₹4,800 ज़्यादा आते हैं. वजह ये है कि टैक्स का पैसा तीन साल तक आपके निवेश में बना रहता है और उस पर भी रिटर्न मिलता है. पर ध्यान दें, पहले यही फ़र्क क़रीब ₹77,000 का था. 10% या उससे कम स्लैब वालों के लिए ये फ़र्क और भी छोटा हो जाता है.
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फिर डेट फ़ंड क्यों?
टैक्स में बड़ी बचत भले न रही हो, डेट फ़ंड के कुछ फ़ायदे अब भी हैं:
- टैक्स टालने का फ़ायदा: टैक्स सिर्फ़ बेचने वाले साल में लगता है. अगर उस साल आपकी आय कम रहने की उम्मीद है, जैसे रिटायरमेंट के बाद, तो टैक्स भी कम लगेगा.
- TDS नहीं: FD के ब्याज पर बैंक TDS काटता है, जबकि डेट फ़ंड के मुनाफ़े पर (रेज़िडेंट निवेशकों के लिए) TDS नहीं कटता.
- लिक्विडिटी: ज़रूरत पड़ने पर आप पूरी रकम तोड़े बिना थोड़ा पैसा निकाल सकते हैं. FD समय से पहले तोड़ने पर आमतौर पर पेनल्टी लगती है.
किन बातों का ध्यान रखें
डेट फ़ंड का रिटर्न तय नहीं होता, FD का होता है. ब्याज दरें बढ़ने पर डेट फ़ंड का NAV गिर सकता है और जिन कंपनियों के बॉन्ड में फ़ंड पैसा लगाता है, उनके डिफ़ॉल्ट का जोखिम भी रहता है. इसके अलावा एक्सपेंस रेशियो आपके रिटर्न को थोड़ा कम करता है. दूसरी तरफ़, बैंक FD पर ₹5 लाख तक का डिपॉज़िट इंश्योरेंस मिलता है.
तीन साल के लिए ऐसे फ़ंड चुनें जिनके पोर्टफ़ोलियो की औसत मैच्योरिटी आपकी अवधि के आसपास हो, जैसे शॉर्ट ड्यूरेशन, बैंकिंग एंड PSU या कॉर्पोरेट बॉन्ड फ़ंड. ज़्यादा रिटर्न के लालच में क्रेडिट रिस्क फ़ंड से बचें.
तो क्या करें?
अगर आप ऊंचे टैक्स स्लैब में हैं, लिक्विडिटी चाहते हैं और रिटर्न में थोड़ा उतार-चढ़ाव सह सकते हैं, तो तीन साल के लिए डेट फ़ंड ठीक विकल्प है. अगर आपको तय रिटर्न चाहिए, आप कम टैक्स स्लैब में हैं, या आप सीनियर सिटिज़न हैं और पुरानी टैक्स व्यवस्था में ब्याज आय पर मिलने वाली ₹50,000 तक की छूट का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाए हैं, तो FD आपके लिए बेहतर रहेगी. वहीं, जिनकी कुल आय नई टैक्स व्यवस्था में टैक्स-फ़्री सीमा के भीतर रहती है, उनके लिए टैक्स के लिहाज़ से दोनों में कोई ख़ास फ़र्क नहीं है.
कुल मिलाकर, अब ये फ़ैसला टैक्स से ज़्यादा इस बात पर टिका है कि आपको निश्चितता चाहिए या लचीलापन.
आपके लक्ष्य के लिए सही डेट फ़ंड कौन सा है? वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपकी ज़रूरत और अवधि के हिसाब से फ़ंड चुनने में मदद करता है.
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ये लेख पहली बार अक्तूबर 27, 2026 को पब्लिश हुआ.



