
इस साल की शुरुआत में मुझे एक उम्रदराज व्यक्ति से मैसेज मिला कि फिक्स्ड डिपॉजिट से उनका रिटर्न 25 फीसदी तक घट गया है। आपको यह चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन यह सच है। 5 साल पहले जब उन्होंने एफडी में निवेश किया था, उसके बाद से अब तक एफडी पर रिटर्न 25 फीसदी तक कम हो चुका है। ऐसे लोग जो ब्याज दर पर खबरों की हेडलाइन पढते हैं, उनके लिए इसका कोई खास मतलब नहीं है। पिछले कुछ सालों के दौरान एफडी पर ब्याज दर में 2 से 3 फीसदी तक कमी आई है। उन्होंने कहा कि पहले मुझे हर माह 35,352 रुपया मिल रहा था जिससे मेरा खर्च आराम से चल जाता था। अब मैच्योरिटी पर मैने एफडी अमाउंट को उसी बैंक में नए सिरे से निवेश किया तो अब मुझे हर माह 26,489 रुपए मिल रहा है। उनकी एफडी पर ब्याज दर में 2.5 फीसदी की कमी आई लेकिन उनकी इनकम 25 फीसदी तक घट गई है। किसी खास डिपॉजिट पर ब्याज दर अगर 10 फीसदी से घट कर 8 फीसदी हो जाती है तो रिटर्न में 20 फीसदी तक कमी आती है। अगर आपको एफडी से रिटर्न के तौर पर हर माह 20,000 रुपए मिल रहा है तो अब आपको हर माह 16,000 रुपए मिलेगा।
कम ब्याज दर का दौर
ऐसे समय में देश कम ब्याज दर वाली अर्थव्यवस्था की ओर जा रहा है, अर्थव्यवस्था के लिए तो यह अच्छा है। उम्रदराज और रिटायर्ड लोगों के लिए यह फायदेमंद नहीं है। महंगाई ओर ब्याज दर कम होना, बेहतर वित्तीय प्रबंधन और ऊंची आर्थिक विकास दर का वरिष्ठ नागरिकों को कोई फायदा नहीं मिलता है। ये लोग अब न तो कमा रहे हैं और न ज्यादा सेविंग कर रहे हैं। उम्रदराज व्यक्ति को अब बेहतर नौकरी या ज्यादा सैलरी नहीं मिलने जा रही है। हालांकि ब्याज दर बढ़ने की उम्मीद करना इसका समाधान नहीं है। हम लोग ज्यादा ब्याज दर की चाहत इसलिए रखते हैं क्योंकि सालों से हमने महंगाई की ऊंची दर को नजरअंदाज किया है। और यह अधिक ब्याज दर का नतीजा है। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है लेकिन ऊपर जिस व्यक्ति का उदाहरण दिया गया है उस व्यक्ति का वित्तीय भविष्य संकट में है। पहले की 5 साल की एफडी में जब यह व्यक्ति 35,352 रुपए ब्याज पा रहा था और इसे खर्च कर रहा था तो वह वास्तव में अपनी पूंजी का एक हिस्सा खर्च कर रहा था। एफडी से उसकी कुल इनकम में से 7,000 रुपए से 10,000 रुपए तक ही उसकी रियल इनकम थी। बाकी पैसा वह अपनी पूंजी से ही खर्च कर रहा था।
करोड़ो लोग नजरअंदाज करते हैं ये तथ्य
उसकी रियल इनकम कम नहीं होती अगर वह सिर्फ रियल इनकम खर्च कर रहा होता। अगर ऐसा होता तो हो सकता है कि उसकी रियल इनकम बढ़ जाती। वह कैसे सिर्फ अपनी रियल इनकम खर्च करता ? इसका जवाब है कि उसको हर साल अपनी डिपॉजिट का सिर्फ 1.5 फीसदी ही खर्च करना चाहिए था और बाकी रकम को कंपाउडिंग के लिए छोड़ देनी चाहिए थी। यह कैलुकेशन इस बात पर आधारित है कि एफडी पर ब्याज दर महंगाई दर से 1.5 फीसदी अधिक है।
साफ है कि उसको ऐसा करने के लिए और ज्यादा रकम की जरूरत होगी। उसने 40 लाख रुपए डिपॉजिट किया है लेकिन इसके लिए उसे 2 करोड़ रुपए से अधिक के डिपॉजिट की जरूरत पड़ेगी, जो उसके पास नहीं है। तो इस व्यक्ति की समस्या का 100 फीसदी कोई समाधान नहीं है। सिर्फ इक्विटी पर मिलने वाला रिटर्न ही उसकी समस्या का कुछ हद तक समाधान कर सकता है। इक्विटी पर मिलने वाला रियल रिटर्न फिक्स्ड इनकम से मिलने वाले रियल रिटर्न का दोगुना या तीन गुना होता है। एफडी पर जहां महंगाई दर से 1.5 फीसदी ज्यादा रिटर्न मिलता है वहीं इक्विटी से महंगाई दर से 3 से 5 फीसदी तक ज्यादा रिटर्न मिल सकता है।
इक्विटी के सिवा नहीं है कोई रास्ता
इस समस्या के समाधान का सिर्फ एक रास्ता है कि कुछ पैसा इक्विटी में निवेश किया जाए। यह निवेश ऐसा हो जिसमें जोखिम कम से कम हो और टैक्स की बचत भी हो। सबसे अच्छा तरीका इन स्टेप्स को फॉलो करना होगा।
सबसे पहले, एक साल के खर्च को अलग रखें और बाकी पैसा धीरे धीरे दो या तीन हाइब्रिड फंड में निवेश करें। इसके बाद आप इन फंडों से पैसा निकालना शुरू कर सकते हैं। आप कुल फंड का 3 से 4 फीसदी सालाना निकाल सकते हैं। इससे आपको लगभग उतनी ही रकम या उससे ज्यादा रकम मिल जाएगी जो आपको आज एफडी से मिल रही है। इस तरीके की सबसे अच्छी बात यह है कि शेष निवेश की कीमत महंगाई दर के बराबर बढ़ेगी अगर आप यह तरीका अपना सकते हैं तो यह तय है कि आपको रिटायरमेंट के बाद के सालों में गरीबी का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा इस तरीके से टैक्स की बचत भी होगी। अगर कोई व्यक्ति रिटायरमेंट के बाद के सालों में गरीबी से बचना चाहता है तो उसे इक्विटी में निवेश के डर को खत्म करना होगा। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।