
इस कॉलम के पिछले कई संस्करणों में हमने बात की कि आपके निवेश पोर्टफोलियो में इक्विटी कितना होना चाहिए फिक्स्ड इनकम कितना। जिन निवेशकों को मैं जानता हूं उनमें से लगभग हर निवेशक एक ही ओर ज्यादा झुका हुआ दिखा। इधर या उधर। मैंने भी अपनी जिंदगी ऐसा कई बार किया है। कभी इधर कभी उधर ।
ऐसा क्यों हुआ इसके दो कारण हैं। पहला आपको नहीं पता कि आपको क्या करना चाहिए। दूसरा आपने जानने के बावजूद वह नहीं किया जो करना चाहिए था। अब पहले हिस्से पर फोकस करते हैं। असेट रीबैलेंसिंग क्या है और आपको यह क्यों करना चाहिए ?
जैसा कि हमने पिछले दो सप्ताह में देखा है कि आपको पोर्टफोलियो का एक तय हिस्सा इक्विटी में और एक हिस डेट में होना चाहिए। और इसका एक तय अनुपात सालों तक बना रहना चाहिए और इसमें बदलाव तभी होना चाहिए जब आपके हालात बदल जाएं। मुझे लगता है कि यह बदलाव पूरे जीवन में चार या पांच बार से अधिक नहीं होना चाहिए। जब आप कमाना और निवेश करना शुरू करते हैं तो यह एक स्तर पर शुरू होना चाहिए और जब आपकी शादी और बच्चे हो जाएं तो इसमें बदलाव हो सकता है। इसके बाद जब आपके बच्चे किशोरावस्था में हों तब और इसके बाद रिटायरमेंट से पांच साल पहले। और फिर रिटायरमेंट के कुछ साल बाद। निश्चित तौर पर दुर्घटनाएं होती हैं। लोगों की नौकरियां जातीं हैं। लोग गंभीर तौर पर बीमार होते हैं। ऐसे समय में भी बदलाव किया जा सकता है। कहने का मतलब यह है कि अच्छा असेट अलॉकेशन हर साल नहीं बदलता है।
लगभग हर रोज आपका ओरिजनल असेट अलॉकेशन इधर या उधर खिसकता है। इक्विटी में हमेशा उतार चढ़ाव ज्यादा रहता है और आम तौर पर इसका रिटर्न फिक्स्ड इनकम से ज्यादा रहता है। इसका मतलब है कि इक्विटी और फिक्स्ड इनकम को हमेशा रीबैलेंस करना पड़ता है। इसका मतलब है कि बाजार में उतार चढ़ाव की वजह से अगर ओरिजनल असेट अलॉकेशन किसी भी तरफ शिफ्ट हो गया है तो आपको एक असेट से रकम निकाल कर दूसरी असेट में शिफ्ट करना है जिससे आप ओरिजनल असेट अलॉकेशन हासिल कर सकें।
जब इक्विटी तेजी से बढ़ने लगे और ऐसा ज्यादातर समय होगा तो आप समय समय पर कुछ इक्विटी निवेश बेच कर रकम को फिक्स्ड इनकम में निवेश करेंगे जिससे कि संतुलन बहाल किया जा सके। जब इक्विटी में गिरावट आए तो आप समय समय परर फिक्स्ड इनकम से कुछ निवेश बेच कर रकम फिक्स्ड इनकम में लगाएं जिससे कि संतुलन बहाल किया जा सके। इस तरीके से आप मुनाफा भी कमा सकते हैं मुनाफे की रकम को कम जोखिम वाली असेट में निवेश कर सकते हैं। इस तरह से एक संतुलन बन जाता है।
निवेश करते हुए इसे अमल में लाना आपको जटिल लग सकता है लेकिन असल जिंदगी में इसका असर काफी जादुई हो सकता है। इस तरह से इक्विटी निवेश की एक बड़ी समस्या यानी कम अवधि में तेज उतार चढ़ाव के असर को कम किया जा सकता है और रिटर्न पर भी इसका असर बहुत मुश्किल से पड़ता है। लेकिन इस पर अमल करना निश्चित तौर पर मुश्किल लगता है। सिर्फ यही नहीं। पिछले कुछ सालों से टैक्स बचाने के लिहाज से भी यह बहुत अच्छा नहीं रहा है। पहले एक साल से अधिक समय तक निवेश में रहने वाली इक्विटी बेचने पर टैक्स नहीं लगता था। लेकिन अब इस पर 10 फीसदी टैक्स लगता है। इसका मतलब है कि इक्विटी से निवेश बेच कर दूसरे असेट में लगाने पर आपकी वह रकम कम हो जाएगी जो आपके भविष्य के लिए है।
रीबैलेंसिंग को आसान और टैक्स के लिहाज से बेहतर बनाने के लिए कुछ आसान तरीके हैं। पहली बात तो यह है कि इसे बहुत जल्दी जल्द नहीं करना चाहिए। अगर आपका फिक्स्ड इनकम पोर्शन एक तिहाई होना चाहिए और अगर यह गिर कर 30 फीसदी हो जाता है तो आपको इसको लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। ओरिजनल असेट अलॉकेशन में 5 से 10 फीसदी तक इधर उधर हो जाए तो ठीक है। इस पर कुछ करने की जरूरत नहीं है। हां इससे ज्यादा बदलाव होने पर आपको रीबैलेंसिंग को लेकर चिंता करनी चाहिए। ज्यादातर समय आप कम हो जाने वाली असेट में नया निवेश बढ़ा कर इस असंतुलन को दूर कर सकते हैं। इसके लिए आपको निवेश बेचने की जरूरत नहीं है।
इससे भी आसान एक तरीका है। यह तरीको ऐसे म्युचुअल फंड निवेशकों के लिए सटीक है जो ज्यादा समय नहीं देना चाहते हैं। यह तरीका है हाइब्रिड इक्विटी- डेट फंड में निवेश करना। क्योंकि इक्विटी से डेट और डेट से इक्विटी में रकम स्विच करने का काम फंड में ही हो रहा है। और जब तक आप रकम को निकल कर इस्तेमाल नहीं करते हैं तब तक टैक्स नहीं लगता है। इसके अलावा सेबी ने म्युचुअल फंड की तमाम कैटेगरी को अच्छी तरह से परिभाषित कर दिया है। इसकी वजह से अलग अलग तरह के इक्विटी डेट अलॉकेशन के लिए कई तरह के हाइब्रिड फंड उपलब्ध हैं।
हालांकि इस पर फिर कभी बात करेंगे।







