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नई हाईप की नई रेल

उम्मीद के मुताबिक़, ज़ोमैटो IPO ने 'डिजिटल' IPOs का एक सैलाब ला दिया है। निवेशकों को ये खेल पूरी गंभीरता से देखना चाहिए।

उम्मीद के मुताबिक़, ज़ोमैटो IPO ने 'डिजिटल' IPOs का एक सैलाब ला दिया है। निवेशकों को ये खेल पूरी गंभीरता से देखना चाहिए।

जिसकी मुझे उम्मीद थी-या कहूं, जिसका डर था-वही हुआ, ज़ोमाटो IPO की सफलता ने उस से मिलते-जुलते IPOs की बाढ़ ला दी। जब मैं 'मिलते-जुलते' कह रहा हूं, तो मैं एक नई बिज़नस कैटेगरी की बात कर रहा हूं, असल में तो ये उससे भी आगे, यानि बिज़नस को नए तरीक़े से कैटेगराइज़ करने की बात है। ये स्केल, या सैक्टर, या इंडस्ट्री के स्तर पर समानता तलाशने तक ही सीमित नहीं है, जिनके आधार पर कंपनियों को किसी-न-किसी कैटेगरी में डाला जाता रहा है। बल्कि ये एक नया ही फ़िनॉमिना है और ज़ोमाटो और पे-टीएम पर, वो आम पैमाने लागू नहीं होते, जो अब तक कंपनियों को जांचने-परखने के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

जहां तक IPOs और इक्विटी निवेश का ताल्लुक़ है, ये बात साफ़ नज़र आती है कि इन दोनों कंपनियों में काफ़ी समानता है। और ठीक इनके जैसी ही दूसरी और भी कंपनियां हैं, जो इन्हीं की तरह, अपना IPO लाने की क़तार में हैं। आप इन कंपनियों को कुछ इस तरह से परिभाषित कर सकते हैं, -- ये भारी-भरकम वेंचर कैपिटल से लदी हैं, इन्होंने कभी मुनाफ़ा नहीं देखा है, और आमतौर पर ये नुकसान में ही रही हैं। चाहे बात IPO की हो, या सैकेंडरी मार्केट की, इन्हें किसी भी आर्थिक पैमाने पर, 'अच्छा निवेश' नहीं कहा जा सकता।
घाटे में चल रही किसी कंपनी में निवेश करना एक बात है, मगर किसी ऐसे बिज़नस में निवेश करना, जिसने कभी फ़ायदे की शक़्ल ही न देखी हो, बिल्कुल दूसरी ही बात है। एक हद तक इस बहस में भी दम है कि ऐसी कंपनियों को ग्लोबल स्केल पर ये साबित करना बाक़ी है, कि वो पैसा बनाने के क़ाबिल हैं भी, या नहीं। फ़ूड-डिलिवरी, और कैब-सर्विस, वाली कंपनियां इसका अच्छा उदाहरण हैं। वैसे कोई कंपनी ऐसी भी हो सकती है, जो कभी पैसा ही न बना पाए, हालांकि ये बड़ी ख़राब स्थिति कही जाएगी। मगर उसे क्या कहा जाए, जब किसी ख़ास बिज़नस लाइन में, दुनिया भर में कहीं भी, किसी ने भी, पैसा ही न बनाया हो। ये बात, सोचने पर मजबूर कर देती है, कि ये बिज़नस भी कहला सकते हैं, या नहीँ।

ऐसे बिज़नस में निवेश करने का हमेशा एक क्लासिक-लॉजिक दिया जाता है, कि ये तेज़-ग्रोथ, और बहुत बड़ा मार्केट-शेयर हथियाने की क़ीमत है। आज कई ऐसे बड़े इंटरनेट के बिज़नस हैं, जिनके इतिहास को इसकी गवाही के तौर पर भी पेश किया जाता है, जैसे -- गूगल, फ़ेसबुक, अमेज़न। हालांकि यहां ध्यान देने वाली बात ये है, कि नुक़सान को तर्कसंगत ठहराने के लिए, ग्रोथ, और वो भी ज़बर्दस्त ग्रोथ का होना बेहद ज़रूरी है। क्या आपको इस क़िस्म की ग्रोथ, बड़े भारतीय नामों में नज़र आता है? पे-टीएम, जो जल्द ही, अब तक का सबसे बड़ा भारतीय IPO लाने वाला है, उसके ग्राफ़ की टॉप-लाइन, पिछले तीन साल के दौरान थमी हुई रही है! नेट-इन्कम के मामले में, इस कंपनी के मार्च 2021 के अंत के आंकड़े, मार्च 2018 के आखिर के आंकड़ों से भी नीचे हैं।

इन IPOs को लेकर, कुछ और बातें भी बेचैन करती हैं, जैसे, ज़्यादातर बड़े ऑफ़र-फॉर-सेल (OFS) का अनुपात। हालांकि OFS बिज़नस का हिस्सा नहीं होते, मगर ये मौजूदा शेयरहोल्डरों के लिए अपना हिस्सा कैश करने का मौक़ा ज़रूर होते हैं। पे-टीएम की बात करें, तो उसका आधा IPO तो सेल का ऑफ़र है। अगर थोड़ी देर के लिए टेक-स्टार्टअप की तड़क-भड़क को किनारे रख दिया जाए, और कंपनी की आर्थिक हालत बताई जाए, फिर इशू का साइज़ बताया जाए, और उसके बाद ये तथ्य भी ज़ाहिर कर दिया जाए, कि आधा इशू तो ऑफ़र-फ़ॉर-सेल है, तो पक्का है कि आप काफ़ी असहज महसूस करने लगेंगे। पूरे-के-पूरे भारतीय IPO मार्केट के इतिहास को, यूं ही हाथ के इशारे से, किसी चमक-दमक वाले डिजिटल भविष्य के लिए रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता। ठीक इसी तरह, नायका जैसे इसी क्लास के दूसरे IPOs तो इस विषय में, और भी गए गुज़रे नज़र आते हैं।

दरअसल आप नायका पर ग़ौर करें, तो आपको ये एहसास होगा, कि मुनाफ़ा न कमा पाना, असल में इन कंपनियों के लिए IPO के मौक़े पर, मुनाफ़े वाला सौदा हो जाता है। ये नायका का दुर्भाग्य ही कहलाएगा, कि उसने कभी-कभार, थोड़ा-बहुत मुनाफ़ा कमाया है। अब इसका मतलब हुआ, कि निवेशक इसका PE कैलकुलेट कर सकते हैं, और ये जान सकते हैं, कि जो हिस्सेदारी वो ले रहे हैं, उसकी वैल्यू क्या है। मगर ज़ोमाटो, और पे-टीएम जो हमेशा घाटे में ही रहे हैं, वो क़िस्मत वाले हैं कि उन्होंने कभी पैसा, बनाया ही नहीं। और क्योंकि पैसा नहीं बनाया है, इसलिए न तो प्रॉफ़िट कैलकुकेट किया जा सकता है, न ही PE के बारे में जाना जा सकता है। इसलिए इस कहानी में जो बाक़ी बचता है, वो है अति-उत्साह से भरे ऐसे भविष्य की कथा, जो सच्चाई से अछूती है।

एक बात और, एक इक्विटी निवेशक के तौर पर, उन कंपनियों के भविष्य से आपको रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ता, जिनमें आपने निवेश नहीं किया है। मगर हां, ऐसे लोग हमेशा मौजूद रहेंगे, जिन्हें कहानियां प्रभावित करती रहेंगी। बड़ी बात ये है, कि - ग्रोथ, वैल्यू, और बिज़नस जैसे पारंपरिक तरीक़ों ने हमेशा निवेशकों का भला किया है, और आगे भी करते रहेंगे।

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