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एक बड़ा बदलाव

इलैक्ट्रिक गाड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता ने ऑटो इंडस्ट्री को एक बड़े बदलाव के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है जिसमें जीतने वाले भी होंगे और हारने वाले भी

इलैक्ट्रिक गाड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता ने ऑटो इंडस्ट्री को एक बड़े बदलाव के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है <span>–</span> जिसमें जीतने वाले भी होंगे और हारने वाले भी

आपको शायद उस मज़ेदार स्टोरी के बारे में पता होगा जिसमें इलॉन मस्क की टेस्ला को भारत लाने की ‘चुनौतियों’ का रोना रोया गया था। कुछ हफ़्ते पहले, टेस्ला और स्पेस-एक्स के सीईओ इलॉन मस्क से ट्विटर पर पूछा गया था कि उनकी कारें भारत में कब से मिलने लगेंगी। दिलचस्प ये है कि मस्क ने इस ट्वीट को नज़रअंदाज़ नहीं किया, जैसा वो अक्सर करते ही हैं। इसके बजाए उन्होंने इस ट्वीट का जवाब दिया, “अभी भी सरकार के साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा हूं”। इस पर सरकार का जवाब था-आधिकारिक नहीं-कि मस्क का स्टेटमेंट दबाव डालने का एक तरीक़ा है ताकि पूरी तरह से विदेश में बनी कारों से इंपोर्ट ड्यूटी कम कर दी जाए।
इसी पर भारत के कई राज्यों के मंत्रियों ने ट्वीट किए, जिनमें सभी ने मस्क को अपने-अपने राज्य में फ़ैक्ट्री लगाने के लिए न्योता दिया। इनमें से महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना, और पश्चिम बंगाल के ट्वीट मैंने नोटिस किए। पश्चिम बंगाल वाले ट्वीट में साफ़-साफ़ कहा गया था कि उनके स्टेट के पास बेहतरीन इंफ़्रास्ट्रक्चर है और वो बिज़नस के लिए सबसे ‘फ्रैंडली स्टेट’ हैं। मुझे यक़ीन है, टाटा मोटर्स ख़ुशी-ख़ुशी इस बात की पुष्टि करेगा।
दिलचस्प ये है कि और भी बहुत सारे भारतीयों ने मस्क को ट्वीट किया। ये बताते हुए कि उन्हें यहां आने को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि भारत सरकार, बेहतरीन इलैक्ट्रिक कारों को भारत में लाना ही नहीं चाहती। दरअसल सोशल मीडिया में, और कुछेक पारंपरिक मीडिया में भी, जिस तरह की चर्चा है उसमें इस इलैक्ट्रिक कार और भारत के फ़ाईज़र (Pfizer) फ़ैन क्लब में एक तरह की समानता नज़र आती है। ठीक वैसे ही, जैसे, कुछ भारतीयों को इस बात का पक्का यक़ीन है कि फ़ाईज़र, जो बेस्ट वैक्सीन समझी जाती है, और क्योंकि वो भारत में उपलब्ध नहीं है, इसीलिए हमारी वैक्सीन कैंपेन की क्वालिटी ही बेकार है।
जैसा कि सच है, भारत में इलैक्ट्रिक वाहनों को सरकार का काफ़ी सपोर्ट हासिल है और इस क्षेत्र में अच्छी-खासी प्रगति भी हो रही है। मिसाल के लिए - टाटा मोटर्स साल 2022 में 50,000 से ज़्यादा इलैक्ट्रिक वाहनों को बाज़ार में उतारने की तरफ़ बढ़ रहा है। सभी तरह के वाहनों को जोड़ें, तो देश में 50 से ज़्यादा इलैक्ट्रिक गाड़ियां या तो प्रोडक्शन में हैं या प्रोडक्शन के क़रीब हैं। टेस्ला को लेकर जो शोर मचा हुआ है, उसकी अजीब बात ये है कि ये कारें अगर भारत में लॉंच भी हो जाती हैं, तो इनकी क़ीमत एक करोड़ से नीचे होनी मुश्किल है। मुझे यक़ीन है कि उनकी कितनी कारें यहां बिकेंगी, इसे लेकर मस्क को अच्छी समझ होगी। कुछ भी हो, भारत का इलैक्ट्रिक कारों की तरफ़ बढ़ना तो एक साईड स्टोरी होगी, असली एक्शन तो टू-व्हीलर्स, थ्री-व्हीलर्स और बसों में होगा।
ये बात अब मान ली गई है कि इंटर्नल कंबस्चन इंजन अपने ख़ात्मे की ओर है, और अब इलैक्ट्रिक प्रपल्शन तेज़ी से उसकी जगह लेगा। वैश्विक स्तर पर तो कई वाहन निर्माताओं ने पारंपरिक इंजन की रिसर्च और डिज़ाईन का काम भी रोक दिया है, इन कंपनियों में अब ह्युंदई भी शुमार हो गई है।
ये एक बड़ी इडंस्ट्री है और बदलाव की जिस दिशा में ये आगे बढ़ रही है, उसे लेकर एक निवेशक के तौर पर हमें सचेत रहना चाहिए। आख़िर कम ही इंडस्ट्री हैं जो ऑटो जितनी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, सबसे बड़ा ख़तरा इस बात को मान लेने का है कि भविष्य में इस इंडस्ट्री का स्वरूप, मौजूदा ट्रेंड्स पर ही होगा। इस ख़तरे को समझने के लिए आप उसे समझें, जो आधी सदी पहले में कंप्यूटर इंडस्ट्री में हुआ। शुरुआती 70 के दशक तक कंप्यूटर एक लंबी-चौड़ी व्यवस्था हुआ करते थे, जिसे एक कंपनी ऑपरेट करती थी। इसमें कई सौ, या कई हज़ार ‘टर्मिनल्स’ जुड़े होते थे। ये कंप्यूटर ‘मेनफ़्रेम’ हुआ करते थे, और IBM इस बिज़नस की सबसे बड़ी कंपनी थी। जैसे-जैसे 70 और 80 का दशक गुज़रा, इन कंप्यूटरों की कंप्यूट या गणना करने की ताक़त बढ़ती गई। उस दौर में लोगों की समझ कहती थी कि विशाल मेनफ़्रेम की जगह छोटे सिस्टम ले लेंगे। असलियत में हुआ ये कि अब तक़रीबन हर इंसान की जेब में एक कंप्यूटर है जो एक विशाल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। 50 साल पहले किसी ने इस नतीजे के बारे में शायद ही सोचा होगा।
मगर, इसकी अजीब बात ये है कि-मेनफ़्रेम अब भी मौजूद हैं, और IBM अब भी बड़ी मेनफ़्रेम कंपनी है। सच तो ये है, उसका मेनफ़्रेम बिज़नस पहले से कहीं बड़ा है! इतना ही नहीं, जब आप किसी एयरलाइन या बैंक की एप अपने पॉकेट कंप्यूटर पर इस्तेमाल करते हैं (जिसे आप फ़ोन कहते हैं), तो कई बार आप इसी मेनफ़्रेम से जुड़ रहे होते हैं। यानि असलियत में, पुराना कंप्यूटिंग मॉडल बदला नहीं, इसके बजाए एक दूसरा, बिल्कुल नया मॉडल उसके साथ-साथ बनता गया और उससे जुड़ गया।
मुझे ऐसा लगता है कि ट्रांसपोर्टेशन में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है। जिस बात की सबसे कम संभावना है, वो ये कि पूरा मॉडल तो यही रहेगा, बस वाहनों की ऊर्जा का स्रोत जीवाश्म पर आधारित (fossil fuel based) ईंधन से बदल कर इलैक्ट्रिकल हो जाएगा।
कुछ भी हो, एक बड़ी इंडस्ट्री में इस तरह का बुनियादी बदलाव आना शुरु हो गया है, जो पहले कभी नहीं हुआ। इसका नतीजे ये होगा कि कई नए विजेता उभरेंगे, और पुराने कई विजेता हार जाएंगे।

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