
निवेश की दुनिया के प्रसिद्ध नाम राकेश झुनझुनवाला का असमय देहांत सच में बेहद दुखद घटना है। झुनझुनवाला इक्विटी निवेशकों की एक पूरी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। मैं ये नहीं कहूंगा कि ‘वो प्रेरणा का स्रोत थे’ क्योंकि प्रेरणा तो रहेगी, भले ही व्यक्ति चला गया है।
सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया में उन पर लिखी जा रही बातें मैं लगातार पढ़ रहा हूं, पर एक बात से दुखी भी हूं। उनपर कही गई बातों में इस पर बहुत ज़्यादा ज़ोर है कि उन्होंने मार्केट में कितना पैसा बनाया और इस पर बहुत कम कि उनके निवेश का तरीक़ा अलग कैसे था। मेरे और आपके लिए या और भी किसी के लिए जो अभी इक्विटी निवेश की शुरुआत ही कर रहे हैं, उन्हें इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्होंने ₹20,000 करोड़ बनाए या ₹40,000 करोड़। असल बात बिल्कुल अलग है।
झुनझुनवाला के निवेश का तरीका ,अच्छे निवेश की पहचान करना और फिर से बड़े और बहुत बड़े स्तर पर ले जाने का रहा है। समय और और संख्या दोनों के लिहाज़ से ‘बड़ा’ निवेश। निष्पक्षता से कहूं, तो ऐसे बहुत से लोग हैं जो झुनझुनवाला की तरह निवेश करते हैं। मगर, ये उनकी सफलता का स्केल, और शख़्सियत की ख़ूबी रही, जो उन्हें एक शानदार मिसाल बना देती है जिसका अनुसरण किया जाए। झुनझुनवाला ने अपने अच्छे निवेशों को दशकों तक होल्ड किया। इतना ही नहीं वो उनमें और निवेश करते रहे, और यही वजह रही कि वो टाइटन और क्रिसिल जैसी कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी बना पाए। ये, भारतीय इक्विटी निवेशकों के चलन से ठीक उलट है, उनसे भी जो ख़ुद को बुनियादी तौर पर लंबी-अवधि का निवेशक मानते हैं।
अपने नुक़सान से बाहर निकल जाना और अपने अच्छे निवेश में ज़्यादा-से-ज़्यादा जोड़ते जाना, एक मामूली निवेश की सलाह लगती है। मगर यही असली इक्विटी निवेश है। ये इक्विटी निवेश पर हावी ‘प्रॉफ़िट बुक’ करने के चलन का ठीक उलटा है। बात ये है कि ज़्यादातर लोगों को जैसे ही लगता है कि उन्होंने किसी स्टॉक में काफ़ी पैसा बना लिया है, वो अपना निवेश बेच देते हैं। यानि, आप एक स्टॉक ख़रीदते हैं और महसूस करते हैं कि ये उतना बढ़ गया है जितना आपके तय किए वक़्त में बढ़ना था, आप उसे बेच देते हैं। ये प्रॉफ़िट बुक करना कहलाता है, और निवेशकों के मुताबिक़ इससे मुनाफ़ा ‘लॉक-इन’ हो जाता है। इक्विटी निवेशकों के बीच अक्सर कहा जाता है कि प्रॉफ़िट बुक करने से कभी किसी को नुक़सान नहीं हुआ।
ये बात एकदम समझ में आती है, और प्रॉफ़िट बुकिंग को समझना सरल कर देती है। दूसरी कई बातों की तरह, इस व्यवहार की जड़ें भी मनोविज्ञान में हैं, तर्क में नहीं। लोग डरते हैं कि उनका मुनाफ़ा या तो हाथ से फिसल जाएगा, या घट जाएगा और इस क़िस्म के पछतावे और शर्मिंदगी की कोई जगह नहीं है। फ़ायदे का ऊंचा स्तर पाने की सफलता का एहसास बेशक़ीमती है। असल में, एक निवेशक के नज़रिए से, प्रॉफ़िट बुक करना मार्केट ‘टाइम’ करने का ही एक तरीक़ा है, जो शायद ही कभी काम करता है, और अगर करता भी है तो सिर्फ़ संयोग से। जैसा चार्ली मंगर ने कहा है, मार्केट-टाइम करने के नज़रिए से बेचना असल में निवेशक को दो तरह से ग़लत होने के तरीक़े देता है: गिरावट और ज़्यादा हो सकती है या नहीं भी हो सकती, और अगर होती है, तो उन्हें ये पता करना होगा कि वापस निवेश में उतरने का सही समय क्या होगा। अफ़सोस कि प्रॉफ़िट बुक करना और गिरावट से बचना सफलता का भ्रम पैदा करता है।
इस आत्मघाती मानसिकता का सबसे अच्छा तोड़ है झुनझुनवाला जैसी मिसाल की तरफ़ देखना। सही कारणों से स्टॉक में निवेश करें, और अगर आप सही साबित होते हैं तो अपने निवेश में और जोड़ते रहें और उसे कई साल या दशकों तक होल्ड कर के रखें, तब तक, जब तक आपके निवेश का मूल कारण क़ायम रहता है। वैल्यू रिसर्च में, स्टॉक एडवाइज़र सर्विस को लॉन्च हुए क़रीब पांच साल हो गए हैं। इस दौरान, हमने बड़ी संख्या में और भरोसा करने वाले मेंबर बनाए हैं, मगर फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं जो अच्छे और फ़ायदेमंद स्टॉक्स से बाहर निकलने पर तुले रहते हैं। वो लगातार ‘टार्गेट प्राइस’ जानने पर ज़ोर देते रहते हैं। लोगों में ये आइडिया बड़े गहरे से समाया हुआ है कि स्टॉक होल्ड करना, ऐसा ट्रेन का सफ़र है जहां आपको अपनी मंज़िल का पहले से पता होना ही चाहिए। अगर राकेश झुनझुनवाला ने इस तरह से निवेश किया होता, तो भी वो बेहद सफल निवेशक होते, मगर आज आपने उनका नाम नहीं सुना होता।





