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यह आपकी इमरजेंसी नहीं है

मार्केट की सुबह की घबराहट आपसे नहीं, बल्कि क़र्ज़ लेकर निवेश करने वालों से जुड़ी होती है

मार्केट की सुबह की घबराहट आपसे नहीं, बल्कि क़र्ज़ लेकर निवेश करने वालों से जुड़ी होती हैAditya Roy/AI-Generated Image

सोमवार, 2 मार्च की सुबह, जब मध्य-पूर्व में पैदा हुए ताज़ा संकट की ख़बरें पूरी दुनिया में छाई हुई थीं, भारतीय शेयर बाज़ार ऐसे खुले जैसे कोई बड़ा नाटकीय संकट आ गया हो. प्री-मार्केट ट्रेडिंग में संकेत मिल रहे थे कि सेंसेक्स 2,700 अंकों से ज़्यादा गिर सकता है. लेकिन उसी दिन दोपहर बाद जब क्लोज़िंग बेल बजी, तब तक असली गिरावट उसका सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही रह गई थी. अगर सुबह नौ बजे फ़ोन खोलकर बाज़ार देखा गया होता, तो ऐसा लग सकता था कि वित्तीय जीवन किसी बड़े संकट में है. लेकिन अगर वही फ़ोन बंद करके चार बजे फिर देखा जाता, तो हैरानी होती कि इतना हंगामा आख़िर किस बात का था.

अब तक ये पैटर्न बिल्कुल जाना-पहचाना हो चुका है. हर बड़े भू-राजनीतिक झटके-हर युद्ध, हर अप्रत्याशित चुनाव परिणाम, हर महामारी की बड़ी हेडलाइन - के समय यही कहानी दोहराई जाती है. फिर भी, हर बार बाज़ार की शुरुआती प्रतिक्रिया देखकर हम चौंक ही जाते हैं. असल सवाल ये नहीं है कि बाज़ार बुरी ख़बरों पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया क्यों देता है. असली सवाल ये है कि ये ज़्यादा प्रतिक्रिया करता कौन है और क्यों?

इसका जवाब एक बहुत साधारण विचार में छिपा है, जिसके बारे में ज़्यादा चर्चा नहीं होती: लीवरेज्ड निवेशक लीवरेज्ड क़ीमतें पैदा करते हैं.

सोचिए, जब कोई निवेशक शेयरों में निवेश करने के लिए पैसा उधार लेता है या फ़्यूचर्स और ऑप्शंस बाज़ार में पोज़िशन लेता है, तब क्या होता है. उस समय निवेश धैर्य वाली पूंजी से नहीं हो रहा होता. वह ऐसे पूंजी से हो रहा होता है जिस पर रोज़ का किराया देना पड़ता है और अगर क़ीमतें उल्टी दिशा में जाएं तो वही पैसा तुरंत वापस भी लौटाना पड़ सकता है. ऐसे निवेशक के लिए समय साथी नहीं होता-वह एक टिक-टिक करती घड़ी होता है. जब आधी रात को कोई बुरी ख़बर आती है, तो लीवरेज्ड ट्रेडर के पास शांत होकर सोचने की सुविधा नहीं होती. उसे तुरंत कार्रवाई करनी पड़ती है, क्योंकि हर घंटे की देरी बड़ा नुक़सान ला सकती है या मार्जिन कॉल की वजह से पूरी पोज़िशन ही साफ़ हो सकती है. उसकी घबराहट अविवेकपूर्ण नहीं होती. उसकी परिस्थिति में वही एक तार्किक प्रतिक्रिया होती है.

सुबह 9:15 बजे जो बाज़ार दिखाई देता है, असल में उस समय वही चल रहा होता है. वह लॉन्ग-टर्म इक्विटी निवेशकों का बाज़ार नहीं होता. वह उन लोगों का बाज़ार होता है जिन्होंने वहां मौजूद रहने के लिए पैसा उधार लिया है. जिनकी निवेश अवधि वर्षों में नहीं, घंटों में मापी जाती है. उनके लिए मध्य-पूर्व में अचानक भड़का कोई तनाव एक असली और तुरंत पैदा हुई इमरजेंसी बन जाता है. पहले भी इस कॉलम में SEBI की उस रिसर्च का ज़िक्र किया गया है, जिसमें बताया गया कि व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडरों में से 89 फ़ीसदी लोग पैसा गंवाते हैं. उन्हीं नुक़सानों को पैदा करने वाला लीवरेज ही प्री-मार्केट गिरावट को भी पैदा करता है. जब सेंसेक्स 2,700 अंक गिरने का संकेत देता है और माथे पर पसीना आता है, तब दरअसल किसी और की फ़ाइनेंशियल स्ट्रक्चर का भावनात्मक असर महसूस हो रहा होता है. दोपहर में होने वाली रिकवरी, जैसा कि टीवी एंकर अक्सर कहते हैं, बाज़ार का “शांत होना” नहीं होती. असल में ये असली बाज़ार का उधार के पैसों वाले बाज़ार पर दोबारा नियंत्रण पाना होता है. जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता है और लीवरेज्ड पोज़िशन मजबूरी में बंद होती हैं या खुद ही खत्म की जाती हैं, वैसे-वैसे वे लोग फिर से क़ीमत तय करने लगते हैं जो म्यूचुअल फ़ंड, SIP और लंबे समय से रखे इक्विटी पोर्टफ़ोलियो के ज़रिए असली कारोबारों के मालिक हैं. उन पर बेचने का कोई दबाव नहीं होता, क्योंकि उन्होंने किसी से पैसा उधार नहीं लिया होता जिसे वापस करना पड़े. हज़ारों किलोमीटर दूर शुरू हुआ कोई संघर्ष उनके कारोबार के मालिक होने की हक़ीक़त को नहीं बदल देता.

रिटेल निवेशक के लिए इससे निकलने वाला निष्कर्ष बिल्कुल साफ़ है, भले ही उस पर अमल करना अनुशासन मांगता हो. प्री-मार्केट का आंकड़ा सिर्फ़ डेरिवेटिव और मार्जिन लेंडिंग बाज़ार की हालत के बारे में जानकारी देता है. यह उन कारोबारों की असली क़ीमत का भरोसेमंद संकेत नहीं है जिनमें निवेश किया गया है. उसे बार-बार देखना सिर्फ़ बेचैनी बढ़ाने के अलावा कोई काम नहीं करता. पोर्टफ़ोलियो में मौजूद कंपनियां 2 मार्च को भी वैसे ही खुली होंगी, काम किया होगा और बंद हुई होंगी जैसे पहले होती थीं. जो युद्ध कल की क़ीमत में शामिल नहीं था, वह आज की क़ीमत में आ गया है, इसलिए कुछ समायोजन होना स्वाभाविक है. लेकिन 2,700 अंकों का एडजस्टमेंट और उसका एक छोटा हिस्सा-दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते. इतिहास बार-बार दिखाता है कि इनमें से सच के क़रीब कौन होता है.

कुल मिलाकर, सुबह की घबराहट लीवरेज्ड निवेशकों की होती है. आपके लिए उस इमरजेंसी को अपनी इमरजेंसी समझने की कोई ज़रूरत नहीं.

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