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कितने अजीबोगरीब हैं नए बिज़नस

अगर मुनाफ़ा नहीं मिल रहा, तो अकाउंटिंग के तरीक़े ही बदल दो. कुछ नए डिजिटल बिज़नस यही नहीं कह रहे...

अगर मुनाफ़ा नहीं मिल रहा, तो अकाउंटिंग के तरीक़े ही बदल दो. कुछ नए डिजिटल बिज़नस यही नहीं कह रहे...

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"मार्केट हमारा बिज़नस मॉडल पसंद नहीं करते." ये पुरानी शिकायत है और पहली बार ऐसे जुमले सन 2001 में डॉटकॉम क्रैश के बाद काफ़ी सुने गए. बिज़नस (पुरानी तरह के बिज़नस) करने वालों का कोई भी आंकड़ा बता देता था कि उस बिज़नस की ब्रांड वैल्यू की क़ीमत क्या होगी. आख़िर पुरानी तरह के बिज़नस में मुनाफ़ा हुआ करता था, और अब, नए इंटरनेट बिज़नस के पास ब्रांड वैल्यू और उसे देखने वाले हैं—क़रीब-क़रीब एक ही सी बात है, इसमें कोई फ़र्क़ नहीं. पर क्या ये सही है? बदक़िस्मती से, दो दशक और तीन मार्केट क्रैश के बाद, यही चूरन अब भी निवेशकों को बेचा जा रहा है, या शायद थोड़े से फेरबदल के साथ.

कुछ दिन पहले, मैंने एक वीडियो ट्विटर पर देखा, ये बिज़नस टीवी चैनल के प्रोग्राम का हिस्सा था. इस छोटे से वीडियो में, नई पीढ़ी की डिजिटल कंपनी पॉलिसीबाज़ार के फ़ाउंडर ने, कुछ बातें की थीं, और ज़रा सोचिए कि किस तरह से मार्केट इन कंपनियों की क़दर या उन्हें पसंद नहीं करते, कि उन्होंने अंतहीन घाटे में चल रही नई पीढ़ी की 'डिजिटल' कंपनियों और स्टील प्लांट स्थापित करने में तुलना करते हुए समझाया था कि जब आप स्टील प्लांट लगाते हैं, तो आप कैपिटल एक्सपेंडिचर करते हैं. और जब स्टील प्लांट काम करना शुरू करेगा, तो आपको मुनाफ़ा होगा. हालांकि, शिकायत करते हुए उन्होंने आगे कहा कि उनके जैसे बिज़नस में ब्रांड, 'प्लेटफ़ॉर्म' और उत्पाद पर बहुत ज़्यादा ख़र्च हुआ है, और वही सब P&L (यानी मुनाफ़े और नुक़सान) में जुड़ गया.

ऐसे बिज़नस को स्टील प्लांट की तरह लेना चाहिए या ट्रीट किया जाना चाहिए, यानी जिस तरह से शुरुआत में, स्टील प्लांट में सालों-साल ख़र्च होता रहता है, उस ख़र्च को कैपिटल समझा जाना चाहिए. तो ये तर्क कि एडवरटाइज़िंग, सेलरी, मार्केटिंग, या सिर्फ़ सामान बेचना और सर्विस को लेकर अगर कोई यूनिट नुक़सान में हो, उस के इन सभी ख़र्चों को कैपिटल एक्सपेंडिचर मान लेना चाहिए... पर सवाल है कि कब तक मानें? जब तक बिज़नस मुनाफ़ा न कमाने लगे? ये एक पुराना तर्क है इसमें कुछ भी नया नहीं. मैंने पहले कहा है कि ऐसे फ़ाउंडर जिनका बिज़नस मुनाफ़ा नहीं कमा सकता और जिनमें ग्रोथ हो सकती वो पिछले बीस साल से यही कहते आ रहे हैं. और वो कह रहे हैं कि हम मुनाफ़ा कमा ही नहीं सकते, इसलिए आपको हमारे मुताबिक़ अपने नियम बदल देने चाहिए, और तब हम अपनी क़िताबों में मुनाफ़ा दिखा पाएंगे.

स्टील प्लांट से तुलना को बेहूदी मिसाल न कहें तो क्या कहें. 115 साल पहले, जब पहला टाटा स्टील प्लांट बन रहा था, तो उस पर लगने वाला पैसा 'खाया' नहीं जा रहा था. उसे ऐसे संसाधन (resource) में बदला जा रहा था, जिसने रेवेन्यू और मुनाफ़े का ऐसा सिलसिला शुरु किया जो दशकों तक क़ायम रहा. एक नई पीढ़ी की डिजिटल कंपनी में ऐसा कुछ दूर-दूर तक नहीं होता, वो बस ख़र्च करती रहती हैं और मुनाफ़ा कमाना कभी नहीं सीखतीं.

कुछ लोग इनके अजीबोग़रीब तर्कों पर विश्वास कर लेंगे, मगर निवेशकों को ऐसा करने के बजाए इन्हें नज़रअंदाज़ करना चाहिए. इसके उलट, आप उन कंपनियों को देखिए जिन्होंने पिछले दशक में ऐसे बिज़नस खड़े किए हैं जो मुनाफ़े में चल रहे हैं. इसी से जुड़ी एक बात नंदन नीलकणि ने कही. वो इंफ़ोसिस की 40वीं-एनिवर्सरी के मौक़े पर नई पीढ़ी की कंपनियों के बारे में बोले. उन्होंने कहा, "मुझे जिस बात की चिंता है, वो ये कि क्या उन्हें एक संस्था खड़ी करनी है? इसमें मुश्किल हिस्सा है संस्था खड़ी करना है; ये एक मैराथन रेस है. आज हम (इंफ़ोसिस के संस्थापक) उतने ही आशावादी हैं, और उतनी ही मेहनत कर रहे हैं जितनी 40 साल पहले किया करते थे. क्या इन लोगों में लंबा खेल खेलने की ताक़त है? मैं इस बात को लेकर चिंतित हूं क्योंकि बहुत ज़्यादा पैसा होना एक अभिशाप है." कुछ लोगों को ये वैसी ही शिक़ायत लगेगी जैसी बुज़ुर्ग, युवाओं के बारे में किया करते हैं. हालांकि, नीलकणि आगे अपनी बात साफ़ करते हुए कहते हैं कि वो कंपनियों को आग में झोंकने के लिए पैसे देते रहने की बात समझ नहीं पाते. उन्होंने कहा कि "एक बार आप कैपिटल की इज़्ज़त करना, क़िफ़ायत से ख़र्च करना बंद कर देते हैं, तो आप अपना पैसा मैनेज करना बंद कर देते हैं, और तब आपका खेल ख़त्म हो जाता है."

कैपिटल की और क़िफ़ायत की इज़्ज़त कीजिए. आज ये ख़याल अजीब लग सकता है या पहले के मुक़ाबले ये सनक भरा लग सकता है, मगर ऐसी ख़ैरात (free feeding) की वजह से, ये कंपनियां बरसों तक ऐसी स्थिति में रहती हैं, जिसमें साफ़ तौर पर, ख़र्च करने का टारगेट होता है. एक सामान्य बिज़नस के माहौल में पुरानी हो चुकी वो कंपनियां जो लंबे समय से मुनाफ़े में चल रही होती हैं, वक़्त के साथ ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी और कम मुनाफ़े वाली हो जाती हैं. अब, दूसरी तरफ़ एक ऐसा बिज़नस खड़ा होता है, जो कभी मुनाफ़ा नहीं कमाते और ऐसा करने में पूरी तरह नाकाम लगते हैं, और ये बिज़नस बड़े और अक्षम दिखने लगते हैं. इस पूरी समस्या का हल उनके पास क्या है, अकाउंटिंग के नियम बदल दो! ऐसी बात पर तो निवेशकों को बिना ध्यान दिए बस मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाना चाहिए.

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