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Index Funds में इन्वेस्टमेंट का लॉजिक

इंडेक्स फ़ंड में निवेश का सवाल घूम-घूम कर वापस आता है और इसका जवाब बदलता रहता है

इंडेक्स फ़ंड में निवेश का सवाल घूम-घूम कर वापस आता है और इसका जवाब बदलता रहता है

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एक ख़ास तरह के मंझे हुए निवेशक, ख़ासतौर पर जो अमेरिका और यूरोप में चल रहे निवेश के तरीक़ों को पढ़ते हैं, अक्सर इंडेक्स इन्वेस्टिंग के बारे में पूछते हैं. क्या इंडेक्स इन्वेस्टिंग का समय अब आ गया है? इसमें 'अब' बहुत महत्वपूर्ण है. इसकी वजह है कि अगर आप एक विकसित मार्केट का अनुभव भारत में दोहराना चाहते हैं, तो बड़े पैमाने पर निवेशकों को इंडेक्स इन्वेस्टिंग में स्विच करना ही होगा.

इंडेक्स इन्वेस्टिंग का समय भारत में आ गया है या नहीं इस सवाल पर मुझे स्वीकार करना होगा कि मैं पक्के तौर पर इसका जवाब नहीं दे सकता. एक स्कूल या कॉलेज में डिबेट करने वाले छात्र की तरह मैं दोनों तरफ़ से बहस कर सकता हूं, और मुझे भरोसा है कि मैं - इसके पक्ष और विपक्ष - दोनों तरफ़ से ज़ोरदार बहस कर सकता हूं. पर, मुझे लगता है कि मार्केट की तमाम दूसरी चीज़ों की तरह इसके बारे में तभी पता चलेगा जब ऐसा होगा.

एक वक़्त था जब क़रीब-क़रीब सभी इक्विटी फ़ंड (मैं यहां 90 प्रतिशत जैसे आंकड़े की बात कर रहा हूं), इंडिक्स को साल-दर-साल लगातार पछाड़ते थे. उन दिनों, इसके अलावा कुछ सोचने की ज़रूरत ही नहीं थी कि एक्टिव तरीक़े से मैनेज किए जा रहे फ़ंड्स में उनके प्रदर्शन के आधार पर निवेश किया जाए या नहीं. पर अब, स्थिति पहले से ज़्यादा जटिल है, अब इंडेक्स फ़ंड में पैसा लगाना एक विकल्प होने के ज़्यादा नज़दीक आ गया आया है.

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हालांकि, ये वो सवाल है जिसे मैं हर साल एक बार दोहराता हूं, इसकी वजह है कि कुछ लोग मुझसे हर साल यही सवाल पूछते हैं. क्या वो वक़्त आ गया है जब एक भारतीय निवेशक को इंडेक्स इन्वेस्टिंग को सीरियसली लेना चाहिए? दूसरे शब्दों में, क्या पैसिव इन्वेस्टिंग निवेशकों की एक सोची-समझी पसंद होनी चाहिए? अक्सर पूछे जाने के लिए, ये सवाल अच्छा है क्योंकि इसका जवाब बदलते रहने वाला टार्गेट है. आज जो इसका सही जवाब है (और उसका कारण है), वो पांच साल पहले के जवाब से अलग होगा, और पांच साल बाद ये कुछ और होगा.

एक पल के लिए इंडेक्स फ़ंड की परिभाषा और उसके लॉजिक पर लौटते हैं. एक आम म्यूचुअल फ़ंड, मार्केट से बेहतर प्रदर्शन की कोशिश करता है, यानी, उसका लक्ष्य मार्केट के इंडेक्स से बेहतर रिटर्न देना होता है. इनमें से कुछ सफल रहते हैं, कुछ नहीं. इसके उलट, इंडेक्स फ़ंड का मक़सद किसी ख़ास इंडेक्स के प्रदर्शन को दोहराना होता है, यानी न उससे बेहतर करना, न उससे ख़राब करना. इसलिए जो इंडेक्स फ़ंड, BSE सेंसेक्स पर आधारित होता है उसमें वही 30 स्टॉक, ठीक उसी अनुपात में होने चाहिए जैसे सेंसेक्स में मौजद हैं. अब जो निवेशक इस फ़ंड्स में पैसे लगाएंगे उन्हें ठीक वैसा ही रिटर्न मिलेगा जो BSE सेंसेक्स का है.

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आप इस बात पर भी ग़ौर करें कि इंडेक्स फ़ंड, एक तरह से म्यूचुअल फ़ंड के होने का तर्क ही उलट कर रख देते हैं. फ़ंड मैनेजरों से उम्मीद की जाती है कि वो निवेशकों का पैसा इतने अच्छे से मैनेज करें कि जैसा ख़ुद निवेशक अपने-आप नहीं कर सकते. मगर इंडेक्स फ़ंड के आइडिया का आधार ही ये है कि फ़ंड मैनेजरों के पास ऐसा करने की क्षमता नहीं है या फिर एक अच्छे फ़ंड मैनेजर की तलाश करना बहुत फ़ायदे का सौदा नहीं है. इंडेक्स फ़ंड के पक्ष में एक ज़ोरदार बात उनका सस्ता होना है, यानी ख़र्च से बचा पैसा निवेशकों के रिटर्न में ही जुड़ जाएगा.

वहीं, पश्चिम के बाज़ारों में, इंडेक्स फ़ंड अपने ऊंचे ख़र्च के बावजूद काफ़ी समय से सफल इसलिए रहे हैं क्योंकि एक्टिव फ़ंड मैनेजर, इंडिक्स से बेहतर रिटर्न दे पाने में नाकाम रहे हैं. एक और फ़ैक्टर है जिसके बारे में ज़्यादा बात नहीं होती कि इंडेक्स फ़ंड निवेश की सलाह देने वालों को उनकी जवाबदेही से मुक्त कर देते हैं. ख़राब प्रदर्शन होने पर सलाह देने वाले की ग़लती नहीं ठहराई जाती, बल्कि ये इंडेक्स की ग़लती हो जाती है, दूसरे शब्दों में कहें, तो ये किसी की ग़लती नहीं होती. एक और फ़ैक्टर है जिसकी बात कम ही होती है, वो ये कि जॉन बोगल और उनकी स्थापित की हुई कंपनी वैनगार्ड ने पैसिव इन्वेस्टिंग में एक ऐतिहासिक रोल अदा किया और आप ये मान सकते हैं कि अगर वो नहीं होते, तो शायद पैसिव इन्वेस्टिंग शुरू ही नहीं होता.

अब सवाल है कि क्या भारत का कोई जॉन बोगल है, और होना चाहेगा? फ़ाइनेंशियल सेक्टर पर नज़र डालने पर तो ऐसा नहीं लगता.

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