Anand Kumar
जो भी भारतीय बिज़नस फ़ॉलो करता है वो अब तक बायजू (Byju) की खड़ी की हुई मुश्किलों के बारे में जानता होगा. मैं जानता हूं कि हेडलाइन कहती हैं, "बायजू मुश्किल में है". मगर एक कस्टमर, कर्मचारी और इसमें निवेश करने वालों या क़र्ज़ देने वालों के नज़रिए से, ये मुश्किल बायजू ने खड़ी की है. इसका उलटा नहीं हुआ है. जैसे-जैसे स्टार्टअप्स की माल गाड़ी पटरी से उतर रही है, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को नज़र आने लगा है कि बीते कुछ सालों में, स्टार्टअप्स के बड़े पैमाने पर फ़ेल होने की वजह क्या है. इसे सभ्य भाषा में 'कॉर्पोरेट गवर्नेंस फ़ेलियर' कहा जाता है. हालांकि, मुझे और आपको पता है कि इसका मायने क्या है. क्रिप्टो एक्सचेंज FTX और इसके फ़ाउंडर, SBF और थेरेनोस (Theranos) और एलिज़ाबेथ होम्स (Elizabeth Holmes) की कहानियां अब किसी से छिपी नहीं है, मगर इसी तरह की कई कहानियां छोटे स्तर पर भी मौजूद हैं.
पिछले ही हफ़्ते, ख़बर थी कि सॉफ़्टबैंक ने जिस 'यूनीकॉर्न' IRL को फ़ंडिंग की थी, और जो मैसेजिंग का दुनिया का सबसे शानदार प्लेटफ़ॉर्म बन गया था, उसे ये मानने पर मजबूर होना पड़ा है कि 95 प्रतिशत यूज़र बेस का उसका दावा झूठ था. यूएस कॉलेज फ़ंडिंग का स्टार्टअप जिसका नाम फ़्रैंक (Frank) है उसे जेपी मॉर्गन चेज़ ने अक्वायर कर लिया था, बाद में पता चला कि इसके 4 मिलियन रजिस्टर्ड यूज़र के दावे में से 3.6 मिलियन झूठे थे.
सबसे मज़ेदार क़िस्सा जो मुझे याद आ रहा है वो इलेक्ट्रिक ट्रक कंपनी निकोला के बारे में है—जिसमें जनरल मोटर्स ने निवेश किया था—इनका दावा था कि उन्होंने एक हैरतअंगेज़ हाइड्रोजन-इलेक्ट्रिक हाइब्रिड ट्रक बना लिया है. उन्होंने हाइवे पर दौड़ते हुए अपने ट्रक का वीडियो तक रिलीज़ किया था. बाद में उन्हें मानने के लिए मजबूर होना पड़ा कि उनके ट्रक अपने आप चल ही नहीं सकते. जब वीडियो शूट किया गया था, तब ट्रक एक पहाड़ी ढलान पर लुढ़क रहा था, और कैमरे को इस तरह से टेढ़ा रखा गया था कि लगे जैसे ट्रक समतल ज़मीन पर ख़ुद अपने इंजन की ताक़त से चल रहा है. ये सब, तब उजागर हुआ जब निकोला का IPO आ चुका था और एक समय तो उसका मार्केट कैप फ़ोर्ड मोटर्स से ज़्यादा था. अगर किसी फ़िल्म में ऐसा हुआ होता, तो मैं कहता कि ये कुछ ज़्यादा ही फ़िल्मी है और ऐसा संभव ही नहीं, मगर ये तो असल ज़िंदगी की बात है. आप एक नकली ट्रक को पहाड़ी ढलान पर चला सकते हैं और ऐसा करके उस कंपनी से ज़्यादा वैल्यू वाली कंपनी बन जाते हैं जो एक साल में 1.7 करोड़ गाड़ियां बना कर और बेच कर, 160+ बिलियन डॉलर का रेवेन्यू कमाती है.
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जब पैसा बहुत आसानी से मिलने लगे, तो उस काम में ऐसे लोग उतर ही आते हैं जिनका मक़सद सिर्फ़ आसान पैसे पर हाथ साफ़ करना होता है. इससे पॉल ग्राहम की कही बात याद आ गई. वो एक बेहद सफल स्टार्टअप एक्सेलरेटर वाई कॉम्बीनेटर के को-फ़ाउंडर हैं. गाहम की कंपनी वाईसी किस तरह से किसी स्टार्टअप का चुनाव करती है, इस पर उन्होंने लिखा था, "आप किसी स्टार्टअप को जितना जल्दी चुनते हैं, उतना ही ज़्यादा आप संस्थापक चुन रहे होते हैं. बाद की स्टेज के निवेशकों को प्रोडक्ट आज़माने को मिलता है और ग्रोथ के नंबर भी देख सकते हैं. जब वाईसी निवेश करती है, तब अक्सर न तो कोई प्रोडक्ट होता है न ही कोई नंबर. दूसरे सोचते हैं कि वाईसी के पास फ़्यूचर टेक्नोलॉजी की पहचान के लिए कोई ख़ास इनसाइट है. ज़्यादातर तो हमारे पास वही इनसाइट है जिसके बारे में सुकरात ने दावा किया था: हमें कम से कम पता था कि हमें कुछ नहीं पता. अच्छे संस्थापकों के चुनाव ने वाईसी को सफल बनाया. हमें लगता था कि एयरबीएनबी (Airbnb) एक ख़राब आइडिया था. हमने उसको फ़ंडिंग की क्योंकि हमें संस्थापक पसंद आए. ... तो जिनके कैरेक्टर पर हमें संदेह होता था, चाहे हमें लगे कि वो सफल होंगे, हम उन संस्थापकों को मना कर देते थे. हलांकि शुरुआत में हमने ऐसा ख़ुद की संतुष्टि के लिए किया, मगर वाईसी के लिए ये अप्रोच बहुत काम की साबित हुई."
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बिज़नस मॉडल्स और रेवेन्यू प्रोजेक्शन के बजाए, एक स्टार्टअप इन्वेस्टर 'कैरेक्टर' के बारे में बात क्यों कर रहा है? बजाए बिज़नस और इन्वेस्टमेंट के, क्या ये शब्द सलमान खान के गाने के साथ नहीं जुड़ा हुआ? वाईसी ने 4000 से ज़्यादा कंपनियों में शुरुआती निवेश किया है जिसकी कुल वैल्यू आधा ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा होगी, तो शायद पॉल ग्राहम की बात वज़न रखती है.
एक गहरे अर्थ में, सभी बिज़नस और इन्वेस्टमेंट अनालेसिस नंबरों के नहीं बल्कि लोगों के बारे में होते हैं. इस सब की असल बात ये है कि आइडिया और बिज़नस मॉडल कहीं कम मायने रखते हैं; असल में तो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन, बिज़नस चलाने की क्षमता, और, हां, कैरेक्टर कहीं ज़्यादा मायने रखता है. निवेशक और मीडिया, अलग-अलग तरह के स्टार्टअप के बिज़नस मॉडल की क़ाबिलियत पर कुछ ज़्यादा ही फ़ोकस करते हैं. हालांकि, सच्चाई ये है कि कोई भी बढ़िया बिज़नस ऐसा नहीं हुआ जिसका कोई यूनीक या दोहराया न जाने वाले वाला बिज़नस मॉडल हो—वो लोग ही थे जिन्होंने फ़र्क़ पैदा किया. अफ़सोस ये है कि स्टार्टअप का तथाकथित इकोसिस्टम इस तरह से विकसित हुआ है कि इसके फ़ायदे ग़लत लोगों को आकर्षित करने लगे हैं.
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