इंटरव्यू

“जो फ़ायदा चीन को मिलता था, अब भारत को मिल रहा है.”

Nippon India Large Cap Fund: फ़ंड मैनेजर शैलेश राज भान से हमारी बातचीत

“जो फ़ायदा चीन को मिलता था, अब भारत को मिल रहा है.”

ऐसे समय में जब लार्ज-कैप सेक्टर में एक्टिव फ़ंड्स के लिए अल्फ़ा जेनरेट करना मुश्किल हो रहा है, निप्पॉन इंडिया लार्ज कैप फ़ंड (Nippon India Large Cap Fund) अल्फ़ा जेनरेट कर रहा है. इसलिए, हमने इसके फ़ंड मैनेजर शैलेश राज भान (Sailesh Raj Bhan) से बात करने का फ़ैसला किया, जो निप्पॉन इंडिया में इक्विटी के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर भी हैं.

बातचीत के दौरान, उन्होंने बेहतर परफ़ॉर्मेंस की वजहों, और 2018-2020 के दौरान में फ़ंड में आई कमज़ोरी के बारे में खुलकर बात की. इतना ही नहीं, उन्होंने उन सेक्टर्स के बारे में भी बात की जिनसे ख़ुद उन्हें भी काफ़ी उम्मीदें हैं. इस बातचीत के दौरान, उन्होंने फ़िलहाल दबाव से गुज़र रही फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री पर भी अपनी राय दी.

मौजूदा वैल्यूएशन को देखते हुए आप मार्केट को किस तरह से देखते हैं? आप किन सेक्टर्स में अच्छे मौक़े देखते हैं और किस सेक्टर में तेज़ी या मंदी का रुख रखते हैं?
मोटे तौर पर मार्केट सितंबर और अक्टूबर 2021 के स्तर पर वापसी कर चुका है. अर्निंग्स में सुधार की उम्मीद से मार्केट में सुधार देखने को मिला है. पिछले कुछ सालों में आर्थिक विकास और मुनाफ़ा कुछ हद तक सुस्त रहा. हालांकि, कमोडिटी और तेल की क़ीमतों में गिरावट, महंगाई जैसी चुनौतियों में कमी के कारण अगले दो-तीन साल के लिए सब पॉज़िटिव लग रहा है. इन तीनों की वजह से हालात अच्छे लग रहे हैं, हालांकि वैश्विक जोख़िम अब भी बने हुए हैं

साथ ही, चीन को अब पॉज़िटिव तरीक़े से नहीं देखा जा रहा है. चीन विदेशी निवेशों से अब तक जो फ़ायदा चीन को मिलता था, अब भारत को मिल रहा है.

फ़िलहाल हमें फ़ार्मास्युटिकल, बैंकिंग और यूटिलिटी सेक्टर से उम्मीदें हैं. फ़ार्मास्युटिकल इंडस्ट्री के पास अच्छे वैल्यूएशन हैं, और मज़बूत बैंकों के पास अभी और बड़ा बनने का बेहतर रास्ता है.

भारत की एनर्जी क्रांति के चलते वैल्यू और डवलपमेंट के कारण यूटिलिटी सेक्टर भी बेहतर दिख रह है. इसलिए वहां भी ग्रोथ की काफ़ी संभावनाएं हैं. इंजीनियरिंग और चुनिंदा कंज़्यूमर स्टेपल, ये दो सेक्टर ऐसे हैं, जिन्हें हम डवलपमेंट के लिए अच्छा समझते हैं लेकिन अभी उनका वैल्यूएशन उतना अच्छा नहीं है.

फ़ार्मा फ़ंड्स के मैनेजर के तौर पर आपको क्या लगता है कि फ़ार्मा सेक्टर को क्या नुक़सान हो रहा है और आपको कब तक इनके बेहतर होने की उम्मीद है?
फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री को कोविड से पहले भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. हालांकि, हम फ़िलहाल इस सेक्टर में काफ़ी बदलाव होता देख रहे हैं. उदाहरण के लिए, ज़्यादातर कंपनियों का घरेलू मुनाफ़ा बढ़ रहा है. इसकी वजह है कि उनके प्रोडक्ट लंबे समय तक चलने वाले हैं, इसलिए भारतीय मार्केट पर ध्यान देना इन इंडस्ट्रीज़ के लिए बहुत फ़ायदेमंद हो सकता है. पहले, ज़्यादातर मुनाफ़ा अमेरिकी या यूरोपीय मार्केट से होता था.

हमारे पास 50 से ज़्यादा उम्र के लगभग 30 करोड़ लोग हैं, जिन्हें अपनी लाइफ़ की क्वालिटी में सुधार के लिए फ़ार्मा सॉल्यूशंस की ज़रूरत है. इसके अलावा, हमारे देश की बड़ी आबादी ऐसी है, जो पुरानी बीमारियों से पीड़ित है; हम मधुमेह से पीड़ित दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं. साथ ही, दिल के मरीज़ों की संख्या में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है. नतीजतन, ये वॉल्यूम ग्रोथ के लिए एक लंबे समय तक सफलता वाली मार्केट है.

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क्या आप अपने स्टॉक चुनने के प्रोसेस, पोर्टफ़ोलियो बनाने और मैनेज करने का तरीक़ा बता सकते हैं?
इक्विटी पूरी तरह से जोख़िम का काम है. इक्विटी से मिलने वाले रिवॉर्ड सही जोख़िम लेने का नतीजा होते हैं. इसलिए, हमारा जोर हमेशा सही जोख़िम लेने और ग्रोथ वाले बिज़नस को बेहतर क़ीमत पर ख़रीदने का रहा है. हम ग्रोथ के लिए ज़्यादा क़ीमत चुकाने से बचते हैं.

चार या पांच साल पहले, केवल कुछ स्टॉक अच्छा परफ़ॉर्म कर रहे थे, और मार्केट कितना भी पैसा देने को तैयार था. इसलिए, उस समय, हमने ऐसी इंडस्ट्री (इंजीनियरिंग, होटल, कॉर्पोरेट लेंडर्स) में एंट्री की, जो अनुकूल नहीं थे, ज़्यादा लोगों की पसंद नहीं थे और कम निवेश वाले थे. हालांकि, ये कंपनियां बहुत अच्छी क्वालिटी की थीं और इनका वैल्यूएशन अनुकूल था, लेकिन इनकी आर्थिक परिस्थितियां इनके ऑपरेशन के लिए ठीक नहीं थीं.

हम साइक्लिकल बिज़नस में भी निवेश करते हैं जिसकी मार्केट अनदेखी करता रहा है और ये बेहद कम क़ीमतों पर उपलब्ध होते हैं. इसलिए, जब साइकल घूमता है, तो हमें उन इक्विटी को होल्ड रखने पर प्रॉफ़िट होता है.

साथ ही, रिस्क मैनेजमेंट के नज़रिये से, हम साइक्लिकल मार्केट में भी अव्वल दर्जे की कंपनी ख़रीदना पसंद करते हैं, न कि कमज़ोर कंपनियों को. उदाहरण के लिए, जब बाज़ार पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइज़ (PSU) से बच रहे थे, तो हम भारत के बड़े PSU बैंकों पर काफ़ी ज़्यादा निर्भर थे, जिससे हल्की बैलेंस शीट वाले बैंकों से बचने में हमें काफ़ी मदद मिली.

निप्पॉन इंडिया लार्ज कैप फ़ंड ने पिछले साल अच्छा प्रदर्शन किया है. इसके क्या कारण थे?
इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन, होटल इंडस्ट्री और कॉर्पोरेट बैंक्स के साथसाथ चुनिंदा इंडस्ट्री में हमारे भरोसेमंद फैसलों के चलते परफ़ॉर्मेंस बेहतर हुआ है. 2016-17 में इस बात पर काफ़ी बहस हुई थी कि रिटेल बैंक और नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) बैंकिंग मार्केट पर कैसे कब्जा करेंगी. लेकिन हम बड़े कॉर्पोरेट बैंकों पर दांव लगा रहे थे, जो बेहद कम वैल्यूएशन पर मिल रहे थे.

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(जैसा कि पहले बताया गया है) यहां तक कि चुनिंदा PSU बैंकों पर हमारे कॉल्स भी क़ारगर रहे. मज़बूत लायबिलिटी फ्रे़ंचाइज़ी और पर्याप्त डिपॉज़िट वाले बड़े PSU बैंकों की क़ीमत बेहतर थी. हालांकि, मार्केट का कुछ और ही सोचना था. मार्केट ने छोटे कॉर्पोरेट बैंकों के मुक़ाबले भी डीप वैल्यू अपॉर्च्यूनिटी की पेशकश की, जिनकी क़ीमत बहुत ज़्यादा थी. PSU शेयरों की क़ीमतों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, वहीं, रिटेल बैंकों के शेयरों में पिछले तीन से चार सालों में मज़बूती आई है.

इसी तरह तंबाकू और होटल सेक्टर में निवेश के लिए, जहां कुछ बड़ी कंपनियों ने अच्छा परफ़ॉर्म किया. इंजीनियरिंग सेक्टर से भी फ़ंड को काफ़ी सपोर्ट मिला है. हमने 2014 में इस सेक्टर बड़ी कंपनियों को ख़रीदना शुरू किया था. यहां कुछ मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन थे, और हमने एक मुश्किल साइकल के दौरान ख़रीदारी की थी जब वैल्युएशन बहुत कम था.

क़ीमतों में मज़बूती आई, जो अब कई गुना ऊपर हैं. इसकी वजह मुख्य रूप से सेक्टर में दिलचस्पी बढ़ना और ग्रोथ है. एक्टिव फंड्स में अल्फ़ा जेनेरेट करने के लिए, आपको समय-समय पर उस तरह के समय पूर्व निवेश की ज़रूरत होती है जब वैल्यूएशन सहायक होता है.

निप्पॉन इंडिया लार्ज कैप फ़ंड के 2018 और 2020 की मंदी के दौरान ख़राब परफ़ॉर्म करने के क्या कारण थे?
हमारा गोल इंडेक्स को दोहराना या गले लगाना नहीं है. हमारा ध्यान हमारे जोख़िम स्ट्रक्चर के अंदर भरोसेमंद कॉल लेने पर है. हमारा मानना है कि अल्फा जेनरेट करने के लिए, हमें बेंचमार्क से हटना होगा. इसलिए, अगर आप पोर्टफ़ोलियो को देखें, तो हम 2018-19 में भारतीय ग्रोथ नैरेटिव से प्रॉफ़िट कमाने की स्थिति में थे, लेकिन महामारी आ गई और ग्रोथ धीमी हो गई. होटल जैसे साइक्लिकल बिज़नस बंद हो गए, इंजीनियरिंग कंपनियों ने ख़र्च कम कर दिए और इन सबका हम पर भी असर पड़ा.

सही जोख़िम के बिना, इक्विटी में कोई रिटर्न नहीं मिलता. इंडेक्सिंग हर चीज़ का समाधान नहीं है.

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आपका पोर्टफ़ोलियो सर्विस सेक्टर, खासकर हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर तेजी का रुख दर्शाता है.
हमने सात या आठ साल पहले कम वैल्युएशन पर इन शेयरों में निवेश किया था. ये सभी बिज़नस ने आज की दरों की तुलना मे एक तिहाई फ़ीस लेते थे. ये बड़ी कंपनियां थी, इनकी जगह कोई नहीं ले सकता था और ये रिप्लेसमेंट कॉस्ट से कम मूल्य के थे. यही हक़ीक़त है.

हालांकि, उस समय, ये एक बुरे साइकल में थे. ऐसा 2007-2012 के पीरियड में ओवर-कपेसिटी के कारण था, और इसके बाद भारत ने अगले छह साल तक मंदी देखी.

भारत की सबसे बड़ी होटल चेन रिप्लेसमेंट वैल्यू से नीचे बिज़नस कर रही थी. कोई व्यक्ति ₹12,000 करोड़ में दो सबसे बड़ी लिस्टेड होटल चेन का मालिक बन सकता था. भारत जैसे एक देश के बारे में सोचें जहां हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की बड़ी कंपनियों को ग्रोथ के लिए बड़े रनवे के साथ काफ़ी महत्व दिया जाता है. इस समय के आर्थिक माहौल के कारण नॉन-रेप्लिकेबल बिज़नस यानी जिनकी नक़ल नहीं की जा सकती, संकटपूर्ण वैल्यूएशन पर थे.

हाल ही में HDFC बैंक और HDFC मर्ज हुए हैं. अब आपके पास कंपनी में ज़्यादा हिस्सेदारी है. हालांकि, पिछले कुछ साल में बैंक स्टॉक का परफ़ॉर्मेंस ख़राब रहा है. क्या ये चिंता की बात है?
ख़ास स्थितियों पर टिप्पणी न करते हुए, जब किसी कंपनी में बड़ी घटनाएं घटती हैं, तो आमतौर पर निवेशकों के मन में कुछ चिंताएं होती हैं. लेकिन, जैसा कि पहले कहा गया है, हमारे लिए, ऐसे हर हालात में अल्फ़ा जेनरेट करने का एक मौक़ा होता है.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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