
International Mutual Funds: इंटरनेशनल म्यूचुअल फ़ंड्स से लगातार चार महीनों से निवेशकों का पलायन जारी रहने के बावजूद, 2023 के बाद से विदेशी बाज़ार, ख़ासतौर पर अमेरिका भारतीय शेयर बाज़ार को बड़े अंतर से पछाड़ रहा है. आपको ये बात अजीब लग सकती है पर आइए समझते हैं कि इंटरनेशनल फ़ंड किन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और ऐसे में आपको क्या करना चाहिए. कई मुश्किलों के बीच में इंटरनेशनल म्यूचुअल फ़ंड केवल एक नहीं, बल्कि कई मुसीबतों का सामना कर रहे हैं. सबसे पहले, RBI के परमिसिबल ओवरसीज रेमिटेंस पर ग़ौर कीजिए. दूसरा, इस साल के बजट के बाद से इंडेक्सेशन बेनेफ़िट ख़त्म हो गया है, जिससे सीधे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर निवेश करना टैक्स बचाने वाला हो गया. नतीजतन, निवेशकों ने अपने इंटरनेशनल फ़ंड निवेश को बड़ी तेज़ी से बाहर निकाला है. पांच साल में पहली बार, नेट फ़्लो कई महीनों से नेगेटिव बना हुआ है. आकर्षण कम होने के कारण, कई फ़ंड हाउस कोई नया अंतरराष्ट्रीय फ़ंड लॉन्च करने से परहेज़ कर रहे हैं. पिछली बार ऐसा फ़ंड नौ महीने पहले लॉन्च किया गया था. हद से ज़्यादा रिएक्शन? भले ही निवेशक, विदेशी निवेश की सीमा (foreign investment ceiling) के बारे में कुछ ख़ास नहीं कर सकते, लेकिन इंडेक्सेशन ख़त्म होने का अच्छा ख़ासा असर हुआ है. जहां इंडेक्सेशन बेनेफ़िट ख़त्म होने से इंटरनेशनल म्यूचुअल फ़ंड में निवेशकों पर टैक्स बढ़ गया है, वहीं, बाक़ी विदेशी निवेश के विकल्पों पर भी असर हुआ है. लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के मामले पर ग़ौर करें, तो इसके ज़रिये जहां आपको सीधे विदेशी स्टॉक या ETF ख़रीदने का मौका मिलता हो और आपको कैपिटल गेन्स टैक्स (capital gains tax) में कुछ रुपये बचाने
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