
बातचीत के दौरान, UTI एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) के इक्विटी प्रमुख अजय त्यागी ने एसेट मैनेजमेंट में अपने दो दशक लंबे करियर का अनुभव साझा किया. अपनी निवेश रणनीति पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वो क्यों पिछले 23 वर्षों से एक ही फ़ंड हाउस के साथ काम कर रहे हैं. इस ख़ास बातचीत के संपादित अंश....
साल 2000 में एक विश्लेषक के तौर पर आपने UTI AMC में अपना करियर कैंपस प्लेसमेंट के ज़रिये शुरू किया. क्या मार्केट्स में आपकी रूचि तब से ही थी जब आप पढ़ाई कर रहे थे?
अगर आप मेरे परिवार का बैकग्राउंड देखें, तो मुझसे पहले मेरे परिवार के किसी भी व्यक्ति ने फाइनेंस सेक्टर में काम नहीं किया है. तो ये मेरे लिए एक नया डोमेन था, और मुझे मार्केट्स की कोई समझ नहीं थी. लेकिन जब मैं कॉलेज में था, उस वक़्त इंडियन मार्केट्स ने विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करना शुरू कर दिया था और फाइनेंस सेक्टर से जुड़ी खबरों और ग्लैमर की हर तरफ भरमार थी. इंडियन इक्विटी ब्रोकर द्वारा चलाए जाने वाले पारंपरिक मार्केट्स को छोड़कर प्रोफ़ेशनल मार्केट्स में प्रवेश कर रही थी. कुछ विदेशी ब्रोकरेज, घरेलू प्राइवेट सेक्टर और म्यूचुअल फंड्स ने पहले ही लोगों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया था. उदारीकरण के बाद फाइनेंस मार्केट्स में आए इन बदलावों ने मुझे अपना ये सफ़र शुरू करने के लिए प्रेरित किया.
क्या आप हमें अपने शुरुआती दिनों के बारे में बता सकते हैं? और देश के सबसे बड़े फ़ंड हाउस के लिए स्टॉक एनालिसिस करने का अनुभव कैसा था?
आज हम जिस तरह से स्टॉक एनालिसिस करते हैं, इसमें और पहले के तरीक़े में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है. जैसा कि मैंने पहले कहा, साल 2000 में मेरा सफ़र शुरू होने से कम से कम तीन या चार साल पहले कई प्रोफ़ेशनल्स ने मार्केट्स में प्रवेश किया था. इस चीज़ का हमें ये फ़ायदा हुआ कि हमें अच्छे से पता था कि स्टॉक एनालिसिस के लिए किन तरीक़ों को अपनाना ज़रूरी है. बेशक, UTI ने पिछले 25 सालों में इन तरीक़ों में बार-बार ज़रूरी सुधार किये हैं. पहले हम वार्षिक बैलेंस शीट पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहते थे, और हम उन आंकड़ों को एक्सेल शीट में डालते थे और फिर उनका एनालिसिस करते थे.
पहले उतनी 'एनालिस्ट कॉल' नहीं होती थीं जितनी आपको आज देखने को मिलती है. मुझे याद है कि जब मैं इस फ़ील्ड में आया था, तब सबसे लोकप्रिय एनालिस्ट कॉल इंफ़ोसिस द्वारा तिमाही तौर पर दी जाती थी, जबकि भारत में ज़्यादातर कंपनियों द्वारा सिर्फ एक एनालिस्ट मीटिंग नरीमन पॉइंट (मुंबई में) में आयोजित की जाती थी. और शायद ही कुछ कंपनियां तिमाही टेलीकांफ्रेंस करती थीं, जो कि आज के दौर में काफ़ी सामान्य बात है.
इसलिए, मैं कहूंगा कि पहले के तरीक़े थोड़े अलग थे. जानकारी हासिल करना आज की तरह आसान नहीं था. लेकिन मुझे नहीं लगता कि आज के फ़्रेमवर्क और 24 साल पहले जो हुआ करता था उसमें कोई ख़ास फ़र्क़ है.
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आपने फ़ंड मैनेज करना कब शुरू किया? और एक एनालिस्ट के रूप में आपके अनुभव ने फ़ंड मैनेजमेंट में किस तरह आपकी मदद की है?
मैं पहले आपके दूसरे सवाल का ज़वाब दूंगा. मेरा मानना है कि किसी भी फ़ंड मैनेजर के लिए फ़ंड मैनेज करने से पहले कुछ वक़्त के लिए एनालिस्ट वाला काम करना ज़रूरी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि बेसिक फ्रेमवर्क आपको तभी अच्छे से समझ आता है जब एक एनालिस्ट के रूप में आप -- आकड़ों का एनालिसिस करते हैं, आप अलग-अलग तरीक़ों से ये जानने की कोशिश करते हैं कि किसी कंपनी की वैल्यू क्या है, और जब आप बैलेंस शीट का एनालिसिस करते हैं.
मेरा मानना है कि एक सफल निवेशक या फ़ंड मैनेजर बनने के लिए बुनियादी चीज़ों को जानना बेहद ज़रूरी है और इसके लिए एक एनालिस्ट बनना सबसे बेहतर ट्रेनिंग है. तो ये आपके दूसरे सवाल का जवाब हुआ.
आपका पहला सवाल था कि मैंने फ़ंड मैनेजमेंट कब शुरू किया. ये साल 2008 के फाइनेंशियल क्राइसिस के आसपास की बात है जब मैंने एक फ़ंड मैनेजर के रूप में काम करना शुरू किया.
आप दो दशकों से भी ज़्यादा वक़्त से UTI से जुड़े हैं. क्या कारण रहा कि आप एक ही फ़ंड हाउस से जुड़े रहे? और किस तरह आपके लिए आगे बढ़ने के दरवाज़े खुलते चले गए?
जहां तक बात है कि किस चीज़ ने मुझे UTI से जुड़े रहने के लिए मजबूर किया, इसका ज़वाब एक सवाल है जो मैं ख़ुद से हमेशा और आज भी पूछता हूं: "मुझे UTI छोड़कर कहीं और क्यों जाना चाहिए?"
मुझे बस ये महसूस हुआ कि चाहे मैं UTI में फ़ंड मैनेज करूं या किसी और फ़ंड हाउस में, मेरा काम अलग-अलग कंपनियों का एनालिसिस करना, मेरे पास मौजूद फ्रेमवर्क का पालन करना और सही फ़ैसले लेना ही रहेगा.
काम करने की आज़ादी की बात करें तो, सही संसाधन और सही टीम के साथ काम करने के मामले में UTI ने हमेशा भरपूर साथ दिया है. UTI में रहते हुए मुझे फोकस करने में मदद मिली है और मुझे ये भी एहसास हुआ है कि ऐसी कोई चीज़ नहीं है जो मैं यहां नहीं हासिल कर सकता और कहीं और कर सकता हूं. पिछले ढाई दशकों में कई बदलाव देखने को मिले. लेकिन एक लंबी कहानी को एक वाक्य में कहूं तो, हमें एहसास हुआ कि UTI सीखने और आगे बढ़ने के लिए सबसे अच्छा मंच है. और आज भी मैं इस बात पर कायम हूं. मैं हर सुबह ये सोचकर काम पर आता हूं कि मैं और मेरी टीम अपने अनुभव के ज़रिये अलग-अलग सेक्टर्स और बिज़नस के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करेंगे. यही सोच हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है.
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आप ख़ुद को एक निवेशक के रूप में कैसे देखते हैं? किस प्रकार का स्टॉक या मार्केट आपको आकर्षित करता है?
मेरी निवेश रणनीति बहुत ही सरल है. मैं केवल हाई-क्वालिटी स्टॉक्स ख़रीदने में विश्वास करता हूं जो मज़बूत इकोनॉमिक वैल्यू प्रदान करते हैं. मज़बूत इकोनॉमिक वैल्यू का मतलब है किसी भी बिज़नस की कॉस्ट ऑफ़ कैपिटल या लागत से ज़्यादा रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (RoCE) देने की क्षमता.
इकोनॉमिक वैल्यू को देखने का मेरा नज़रिया ये रहता है कि ये वैल्यू किसी अवधि या अंतराल में बढ़ रही हो न कि अचानक से कभी भी. यदि कोई भी बिज़नस एक अवधि के दौरान अच्छा RoCE दे रहा है, तो उसमें मज़बूत कैश फ्लो भी देखने को मिलेगा. इसका फ़ायदा ये है कि इन बिज़नस की बैलेंस शीट में कैश सरप्लस रहता है और उन्हें अपनी ग्रोथ के लिए उधार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है. इसलिए, किसी भी बिज़नस की मज़बूत RoCE और कैश-फ़्लो पैदा करने की क्षमता सबसे ज़रूरी चीज़ें हैं. मेरे लिए ये साफ़-सुथरे तरीक़े से काम करने का हिस्सा है.
मैं कभी भी ऐसी कंपनी में निवेश नहीं करूंगा जिसने पिछले 5-10 वर्षों में ख़राब RoCE दिया हो. ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जहां कोई कंपनी वर्तमान में बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही हो और जिसे लेकर मार्केट उत्साहित हो, लेकिन मेरी नज़र में ऐसे बदलाव मायने नहीं रखते और ये मेरी रणनीति का हिस्सा नहीं हैं. मैं लंबी अवधि के रिटर्न्स में स्थिरता को ज़्यादा महत्त्व देता हूं.
मेरे लिए दूसरी सबसे ज़रूरी बात ये है कि उस बिज़नस की लॉन्ग टर्म ग्रोथ का रास्ता कैसा है. हो सकता है कि कोई बिज़नस मज़बूत इकोनॉमिक वैल्यू प्रदान कर रहा हो, लेकिन फिर भी मैं इस चीज़ की पुष्टि करता हूं कि क्या ये बिज़नस अगले कई वर्षों तक इसी तरह इकोनॉमिक वैल्यू को बढ़ा पाएगा या नहीं.
कुल मिलाकर हमारी रणनीति इन्ही दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित रहती है. हमारा पोर्टफोलियो क्वालिटी और ग्रोथ दोनों पर आधारित होता है, और हम इन दोनों मापदंडों को लेकर एनालिसिस करते हैं. भले ही किसी इंडस्ट्री में ग्रोथ की मज़बूत संभावनाएं हों, लेकिन वह अच्छी RoCE देने के पैमाने पर खरी न उतरती हो तो हम उसे नहीं छूते हैं-- उदाहरण के लिए एविएशन और इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री. ये इंडस्ट्रीज हमारे क्वालिटी मापदंड पर खरी नहीं उतरती हैं.
इसी तरह, यदि किसी हाई क्वालिटी वाले बिज़नस में अलग-अलग कारणों से लॉन्ग टर्म ग्रोथ की संभावनाएं कम हैं, तो भी हम इसे अपने पोर्टफोलियो में शामिल नहीं करते हैं. इसलिए, मेरी पसंद के पोर्टफोलियो में ऐसे बिज़नस शामिल होते हैं जिनमें क्वालिटी और ग्रोथ दोनों एक साथ देने की क़ाबिलियत हो. यही मेरी निवेश रणनीति है.
कब और किस प्रकार का स्टॉक आपको सबसे ज़्यादा आकर्षित करता है?
मेरा फ्रेमवर्क क्वालिटी से शुरू होता है, ग्रोथ की ओर बढ़ता है और वैल्यूएशन पर समाप्त होता है. लेकिन सिर्फ वैल्यूएशन को देखकर हम कभी भी फ़ैसले नहीं लेते हैं. अगर कोई चीज़ सस्ते में कारोबार कर रही है, तो उत्साहित होने के बजाय हम उस पर शक करते हैं. हम हमेशा ख़ुद से ये सवाल पूछते हैं: "ऐसा क्यों है कि ये कंपनी/स्टॉक दशकों से सस्ती है?"
मैं किसी भी बिज़नस में उसकी क्वालिटी और ग्रोथ की संभावनाएं देखता हूं. वैल्यूएशन की बारी सबसे आख़िर में आती है. मैंने साल 2008 और 2012 के बीच का वो दौर देखा है जब पावर स्टॉक्स को लेकर काफ़ी खींचतान चल रही थी, अल्ट्रा-मेगा पावर प्लांट बनाने की चर्चा चल रही थी, और जब लोग भारत की ऊर्जा ज़रूरतों को काफ़ी सकारात्मक तरीक़े से देख रहे थे. लेकिन किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि क्या ये प्लांट इक्विटी पर ठीक-ठाक रिटर्न दे भी पाएंगे या नहीं.
जैसा कि हमें पता है, 2013 आते-आते इनमें से आधे से ज़्यादा पावर प्लांट कॉस्ट ऑफ़ कैपिटल की भी भरपाई न कर सके, कई प्लांट्स को स्ट्रक्चर में बदलाव करने पड़े, और कई तो बंद ही हो गए. कुछ उसी तरह का उत्साह मैं आजकल रिन्यूएबल्स को लेकर देख रहा हूं. लोगों को बस यही लगता है कि आने वाला दौर ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य "रिन्यूएबल्स" का है. मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि ये उभरता हुआ सेक्टर हैं जिसमें अगले कुछ वर्षों में बड़ा कैपिटल इन्वेस्टमेंट देखने को मिलेगा, लेकिन मैं ऐसे बिज़नस में तब तक निवेश करने से बचूंगा जब तक कि उनकी रिटर्न ऑन इक्विटी, कैश फ्लो और बैलेंस शीट को लेकर एक साफ़ तस्वीर नहीं बन जाती.
मैं फिर से अपनी निवेश रणनीति की सबसे बुनियादी चीज़ों के बारे बात करना चाहूंगा. हमें क्वालिटी से शुरुआत करनी चाहिए, फिर ग्रोथ को देखना चाहिए और अंत में वैल्यूएशन को देखना चाहिए. अगर मेरी नज़र किसी ऐसी कंपनी पर पड़ती है जो क्वालिटी और ग्रोथ के पैमाने पर तो खरी उतरती है लेकिन वैल्यूएशन के मामले में ज़्यादा आकर्षक नहीं है, तो मैं सबसे पहले एक अच्छे एंट्री पॉइंट का इंतज़ार करूंगा, फिर धीरे-धीरे एंट्री लेना शुरू करूंगा और फिर जैसे-जैसे उस बिज़नस में मेरा भरोसा बढ़ेगा वैसे-वैसे मैं वक़्त के साथ स्केल-अप करूंगा.
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हमने आपके फ्लेक्सी कैप फ़ंड पोर्टफोलियो पर नज़र डाली और पाया कि आपने 2016 में फ़ंड मैनेजमेंट शुरू करने के बाद अब भी कई पोजीशन बरक़रार रखी हैं. क्या आप कोई टारगेट प्राइस नहीं रखते जो आपको सेलिंग के लिए मज़बूर करे?
मैं कोई टारगेट प्राइस नहीं रखता हूं. यदि मैं टारगेट प्राइस रखता, तो मैंने टाइटन को 2012 या 2013 में ही सेल कर दिया होता, जो कि उस वक़्त हमें बाइंग प्राइस से 3x से 4x रिटर्न दे चुका था. और टारगेट प्राइस रखता तो मैंने 2013-2014 में हैवेल्स और इन्फो एज भी सेल कर दिया होता. ऐसा करने पर, मैं उस कंपाउंडिंग का फ़ायदा लेने से चूक जाता जो इन कंपनियों ने तब से इन वर्षों के दौरान दी है. इसलिए, हम किसी प्राइस टारगेट को ध्यान में रखकर निवेश नहीं करते हैं, ताकि हम एक अच्छे बिज़नस से गलत वक़्त पर बाहर निकलने से बच सकें.
तो हम किसी स्टॉक से कब बाहर निकलते हैं? किसी बिज़नस से बाहर निकलने का हमारा कारण हमारे एंट्री के कारण से बिल्कुल उलट है. जैसा कि मैंने पहले बताया है, हम एक बहुत ही सरल स्टॉक चयन प्रक्रिया अपनाते है -- क्वालिटी को लेकर किसी कंपनी के लॉन्ग टर्म ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर और लॉन्ग टर्म में कंपनी की हाई ग्रोथ रेट की कम्पाउंडिंग क्षमता के आधार पर. हम किसी कंपनी के साथ तब तक बने रहते हैं जब तक वो कंपनी क्वालिटी और ग्रोथ के हमारे मापदंडों पर बरक़रार रहती है. हम किसी कंपनी से तभी बाहर निकलते हैं जब इन दोनों मापदंडों में से किसी एक को लेकर भी कंपनी पर हमारा भरोसा कमजोर होता है.
उदाहरण के लिए, यदि किसी हाई-क्वालिटी वाले बिज़नस के ग्रोथ रेट में न सुधरने वाली गिरावट देखी जाती है, जैसे कि 10-11 फ़ीसदी, तो हम उस पर टिके रहना नहीं चाहेंगे और उस बिज़नस से बाहर निकल जाएंगे. इसी तरह, यदि प्राइसिंग पावर की कमी के कारण किसी कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ रहा है, तो इस वज़ह से उसके रिटर्न ऑन कैपिटल और कैश फ्लो में भी कमी दिखाई देगी. इस स्थिति में भी हम बिज़नस से बाहर निकल जाएंगे.
जुबिलेंट फूडवर्क्स, एवेन्यू सुपरमार्ट्स और इन्फो एज जैसे स्टॉक भी आपके पोर्टफोलियो में हैं, और मार्केट इन्हें बाई एट एनी प्राइस (BAAP) कैटेगरी में रखता है. ये स्टॉक्स ऐसे लेवल पर हैं जो उन्हें जोख़िम भरा बनाता है. क्या ये बात आपको चिंता में डालती है?
P/E पता करने के लिए नियर-टर्म अर्निंग्स पर मल्टीपल लगाया जाता है. ये डिस्काउंटेड कैश फ्लो एनालिसिस या इन्ट्रिंसिक वैल्यू एनालिसिस का एक शॉटहैंड या तरीक़ा है. लेकिन इसे आसानी से समझने के लिए, मान लें कि प्राइस-अर्निंग मल्टीपल केवल दो फैक्टर्स का एक डेरीवेटिव है: रिटर्न ऑन इक्विटी और ग्रोथ.
इसे इस तरह समझें: एक तरफ, आपके पास एक बहुराष्ट्रीय फास्ट-मूविंग कंस्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनी है जो 100 फ़ीसदी RoE देती है. दूसरी ओर, आपके पास एक घरेलू स्टील कंपनी है जो 10 फ़ीसदी RoE देती है. भले ही इन दोनों कंपनियों को 100 करोड़ का मुनाफ़ा हो, पर इनके कैश फ्लो में बहुत अंतर होगा.
FMCG कंपनी का कैश फ्लो हर साल बढ़ता रहेगा, जबकि स्टील कंपनी का कैश फ्लो नकारात्मक रहेगा. इस कारण स्टील कंपनी के मामले में कैश कन्वर्जन कम रहेगा. तो जाहिर सी बात है, आप FMCG के लिए जो क़ीमत चुकाने के लिए तैयार होंगे वह स्टील कंपनी की तुलना में कई गुना अधिक होगी. यदि मार्केट्स स्टील कंपनी को 10 का मल्टीपल देंगे, तो वे हर साल बड़े पैमाने पर कैश फ्लो की वज़ह से FMCG कंपनी को 50 का मल्टीपल देंगे.
दूसरा फैक्टर है ग्रोथ. यदि आपको कोई ऐसा स्टॉक मिलता है जो सेक्युलर ग्रोथ दिखा रहा है और जो हर साल 13-14 फ़ीसदी की दर से बढ़ रहा है, तो ये स्टॉक हर साल 7-8 फ़ीसदी की दर से बढ़ने वाले स्टॉक की तुलना में काफ़ी बड़े मल्टीपल पर कारोबार करेगा.
समस्या ये है कि प्राइस-अर्निंग मल्टीपल केवल अगले वर्ष और, ज़्यादा से ज़्यादा, अगले दो वर्षों को ध्यान में रखता है. ये बिज़नस की लॉन्ग टर्म कम्पाउंडिंग क्षमता को परखने से चूक जाता है. इसलिए, जब कभी आप P/E के आधार पर अच्छी ग्रोथ की क्षमता वाले एक अच्छे बिज़नस का एनालिसिस करते हैं, तो आप उसकी केवल अगले साल की कमाई या शायद दो साल बाद की कमाई का एनालिसिस कर रहे होते हैं.
हालांकि, आप अगले 10-15 वर्षों में इन अर्निंग्स की कम्पाउंडिंग का पता नहीं लगा पाते. और इससे बहुत बड़ा अंतर पैदा हो जाता है. जब तक RoE और ग्रोथ रेट मज़बूत रहेगी, एक स्टॉक जो पिछले 20 वर्षों से महंगा बना हुआ है वह अगले 20 वर्षों तक भी महंगा बना रह सकता है. मार्केट में ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं. इन कंपनियों की पहचान करना बहुत आसान है. ये स्टॉक्स उचित कारण से महंगे बने रहने के बावज़ूद भी निवेशकों को अच्छे रिटर्न दे रहे हैं.
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लेकिन ये हाई-क्वालिटी कंपनियां पिछले 1-3 साल की अवधि में कोई रिटर्न देने में नाकाम रहीं? आप ऐसी स्थिति से कैसे निपटते हैं जब ये कंपनियां लंबे समय तक ख़राब प्रदर्शन करती रहती हैं?
इस स्थिति से निपटने के लिए हम स्टॉक के प्राइस मूवमेंट को और बिज़नस को अलग-अलग तरीक़े से देखते हैं. हमारा ज़्यादा ध्यान बिज़नस के नतीजों पर रहता है. प्राइस मूवमेंट ऐसी चीज़ है जो हमारे नियंत्रण से बाहर होती है.
अपने पसंदीदा सेक्टर्स को लेकर मार्केट्स का अपना अनुमान होता है, जिसमें समय-समय पर बदलाव होता रहता है. हम कोशिश करते हैं इन बदलावों को लेकर शांत रहें और ज़्यादा उत्साहित न हों, और बिज़नस के नतीजों पर ही अपना ध्यान बनाए रखें.
हम हर तिमाही और हर छह महीने में मूल्यांकन करते रहते हैं कि क्या जिस सोच और उम्मीद के साथ हमने किसी बिज़नस में निवेश किया है वह अभी भी बरक़रार है; और क्या हम उस क्वालिटी और ग्रोथ फैक्टर की नियमित जांच कर रहे है जिसे ध्यान में रखकर हमने निवेश किया था. यदि ऐसा है, तो हम धैर्यपूर्वक निवेश में बने रहते हैं.
भले ही मार्केट्स आज निजी क्षेत्र के बैंकों को अनदेखा कर रहे हैं और PSU बैंकों को ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं, लेकिन इससे हमें कोई परेशानी नहीं है. यदि इन निजी क्षेत्र के बैंकों के नतीज़े उतने ही मज़बूत रहते हैं जितने पहले रहे हैं, तो हमें खुशी होगी क्योंकि आज हम इन स्टॉक्स को सस्ते में ख़रीद सकते हैं, जिसका मतलब है कि इन पर बहुत अच्छा रिटर्न मिल सकता है. इसलिए, हम प्राइस मूवमेंट को और बिज़नस को अलग-अलग नज़रिये से देखते हैं.
आप UTI फ्लेक्सी कैप फ़ंड की लोकप्रियता कैसे वापस लाएंगे?
लोकप्रियता तभी वापस लौटेगी जब हम धैर्य बनाए रखेंगे और बिना सोचे समझें फ़ैसले नहीं लेंगे. मैं आपके पिछले सवाल पर वापस जाना चाहूंगा. अगर मैं ये सोचने लगूं कि हमारा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है और इसलिए हमारी रैंकिंग नीचे जा रही है, और फिर मैं निराश होकर चीज़ों पर कार्रवाई करना शुरू कर दूं तो मैं गलतियां करना शुरू कर दूंगा.
हम सभी ने ये बात सुनी है कि एक महान खिलाड़ी वो है जो स्कोरबोर्ड नहीं देखता है बल्कि केवल अपने खेल पर ध्यान देता है. क्योंकि यदि आप स्कोरबोर्ड को देखना शुरू करते हैं, तो आप घबरा जाते हैं और बेवकूफ़ी भरे काम करने लगते हैं और अपने खेल पर ध्यान नहीं दे पाते. फ़ंड मैनेजर्स के मामले में भी ये बात लागू होती है. यदि आप अपने स्कोरबोर्ड को या अपनी रैंकिंग को देखना शुरू करते हैं, और यदि कुछ ऐसा है जो आपकी चिंता बढ़ा रहा है, तो आप गलतियां करना शुरू कर देते हैं.
हमने पिछले 15 वर्षों में कम से कम दो बार वैल्यू-आउटपरफ़ॉर्मेंस का दौर देखा है. मुझे याद है कि 2010 एक ऐसा समय था जब क्वालिटी ने बड़े पैमाने पर वैल्यू से कमतर प्रदर्शन किया था. 2017 एक और ऐसा वक़्त था जब क्वालिटी में भारी गिरावट आई. 2022 भी ऐसा ही एक और चरण रहा है. लेकिन हमने हमेशा जीत हासिल की है; और आपके अपने शब्दों में, हम केवल लॉन्ग टर्म के बारे में सोच कर, तर्कहीन चीजें न करके और स्कोरबोर्ड को न देखकर अपने फ़ंड की लोकप्रियता वापस लाने में हमेशा क़ामयाब रहते हैं.
हमें अपनी चुनी हुई कंपनियों के बारे में बहुत ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं है; वे अपना ख्याल ख़ुद रखेंगे. हमें अपनी भावनाओं पर क़ाबू रखना होगा. मुझे पोर्टफोलियो को अपनी भावनाओं से दूर रखना होगा. मेरी चुनी हुई कंपनियां जानती हैं कि उन्हें अपना ख्याल कैसे रखना है. वे अपने-अपने सेक्टर्स की लीडर और चैंपियन हैं. वे अपने-अपने सेक्टर्स की सबसे बढ़िया कंपनियां हैं; वे अपने बिज़नस को बढ़ाने और उसे फ़ायदेमंद रूप से आगे बढ़ाने के अनेक रास्ते ढूंढ लेंगे.
आप अपने CIO के कितने क़रीब रहकर काम करते हैं?
CIO का काम पूरी टीम को संभालना है. इक्विटी प्रमुख के रूप में, मैं CIO को रिपोर्ट करता हूं. इसलिए, हम हर दूसरे दिन अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करते हैं. हमारे पास अपने हरेक फ़ंड मैनेजर से बातचीत करने, मॉनिटरिंग करने और एनालिसिस करने के लिए एक मज़बूत ढांचा मौज़ूद है. हम हर तिमाही में ऐसा करते हैं. हम अपने सभी पोर्टफोलियो मैनेजर्स के पोर्टफोलियो की समीक्षा करने की कोशिश करते हैं. इन पोर्टफोलियो मैनेजर्स का नेतृत्व CIO करते हैं और मैं उन समीक्षाओं में उनके साथ शामिल होता हूं. हमारे फ्लेक्सी कैप फ़ंड के लिए CIO द्वारा मेरी समीक्षा भी की जाती है. वह हमारी फर्म में 'भीष्म पितामह' (केंद्रीय व्यक्ति) की भूमिका निभा रहे हैं क्योंकि वह अब फ़ंड मैनेजमेंट का काम नहीं करते हैं.
मैं बिना किसी हिचक के कहना चाहूंगा कि हम अपने साथी फ़ंड मैनेजर्स के पोर्टफोलियो में हस्तक्षेप नहीं करते हैं. हम उन्हें पूरी आज़ादी देते हैं. हम कभी भी उन्हें ये खरीदने या वो बेचने के लिए नहीं कहते. हम बस एक स्ट्रक्चर तैयार करते हैं, ताकि हमारे पोर्टफोलियो मैनेजर्स सही तरीक़े या प्रोसेस अपना सकें.
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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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