
केनरा रोबेको म्यूचुअल फ़ंड के इक्विटी प्रमुख, श्रीदत्त भांडवलदार ₹78,800 करोड़ से ज़्यादा एसेट्स वाली एक दर्जन स्कीमें मैनेज करते हैं.
इस इंटरव्यू में, उन्होंने अपनी निवेश रणनीति और केनरा रोबेको ब्लूचिप फ़ंड और केनरा रोबेको इमर्जिंग इक्विटीज़ फ़ंड के ख़राब प्रदर्शन के कारणों को साझा किया. यहां हम उनके साथ हुई बातचीत के अंश दे रहे हैं.
आप इंजीनियरिंग के छात्र थे. आप फ़ाइनेंशियल मार्केट की ओर कैसे आकर्षित हुए?
एक मिडिल क्लास मराठी परिवार से होने की वजह से, मैंने इंजीनियरिंग करने का फ़ैसला किया, क्योंकि इंजीनियरिंग और चिकित्सा, दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनकी ओर ज़्यादातर मिडिल क्लास मराठी परिवार जाना चाहते हैं. इंजीनियरिंग के सेकेंड ईयर में, टेक्नोलॉजी में मेरा मन नहीं लगा. हालांकि, मैंने इसे क़ामयाबी के पूरा किया और साथ ही, बिज़नस एडमिनिस्ट्रेशन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया. मैंने मुंबई में सिडेनहैम कॉलेज (Sydenham College) में एडमिशन लिया और मैनेजमेंट स्टडी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. मुझे पढ़ने का शौक़ है. उस मामले में, सिडेनहैम एक अलग तरह का कॉलेज था क्योंकि लेक्चर अटेंड करना ज़रूरी नहीं था, और मैंने उस बचे हुए समय का सही इस्तमाल लाइब्रेरी में किया. वहां, मैंने फ़ाइनेसिशल हिस्ट्री के बारे में पढ़ना शुरू किया. मेरा मन अर्थशास्त्र और मार्केट के बारे में पढ़ने में लगने लगा. ये ऐसा वक़्त था, जब मैंने इक्विटी में करियर बनाने का फ़ैसला किया. शुरुआत में, मैंने कैंपस से ही एक बैंक में काम किया, लेकिन 6 महीने के अंदर, इसे छोड़ दिया और एक ब्रोकरेज फ़र्म में शामिल हो गया. इस तरह फ़ाइनेंस की दुनिया में मेरा सफ़र शुरू हुआ.
अपना एमबीए पूरा करने के बाद, आपने अलग-अलग संगठनों के साथ एक विश्लेषक के तौर पर काम किया. सेल साइड (sale side) पर आपकी बड़ी सीख क्या रहीं?
जब मैंने एक विश्लेषक (analyst) के तौर पर काम किया तो मैंने तीन बड़ी बातें सीखीं.
सबसे पहली बात, फ़ाइनेंशियल मॉडलिंग अहमियत रखती है. अगर रुक कर इसके बारे में सोचें, तो प्रबंधन किए बिना भी, अगर आपके पास किसी ख़ास कंपनी के पिछले आंकड़े और पूरे फ़ाइनेंशियल मॉडल - बैलेंस शीट और P&L (प्रॉफ़िट एंड लॉस) दोनों हैं - तो ये आपको कंपनी के बारे में बहुत कुछ बताता है. बहुत से लोग नेरेटिव पर ज़्यादा ध्यान लगाते हैं. जबकि नेरेटिव, निकट भविष्य में काम करते हैं, नंबर बिज़नस की कठोर सच्चाई होते हैं और आपको बिज़नस में होने वाली चीजों के बारे में बहुत कुछ बता देते हैं.
दूसरा सबक़ है, बिज़नस की क्वालिटी के बारे में. मैंने सीखा कि आपको कंपनी की P&L ग्रोथ पर ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि P&L ग्रोथ, पूंजी दक्षता के साथ है या नहीं.
तीसरा सबक़, मैनेज करने या प्रबंधन की क्वालिटी से जुड़ा है, जैसे - अल्पसंख्यक शेयरधारकों के प्रति कौन निष्पक्ष रहता है.
आपने 2006 के बुल मार्केट के दौरान इक्विटी रिसर्च में अपना करियर शुरू किया और 2008 के फ़ाइनेंशियल क्राइसिस का अनुभव किया. आपके करियर के शुरुआती वर्षों में मुख्य निष्कर्ष क्या थे?
मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस दौरान प्रमोटरों के साथ, हम सभी कितने अतिआशावादी थे. वे (प्रमोटर) सबसे बड़े या वैश्विक खिलाड़ी बनना चाहते थे. इसलिए, भारत के सबसे बड़े निगमों से लेकर, हर कोई कंपनियों का टेकओवर करने लगा. जब भी बाज़ार अच्छा प्रदर्शन करता है, या अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन करती है, लोग सुरक्षा का मार्जिन छोड़ देते हैं. उस दौरान मुझे ये भी याद है कि अच्छे साइकल (चक्र) के दौरान, कमाई अच्छी हुई थी, और सब कुछ पॉज़िटिव था, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण परिणाम ये हुआ कि भारत के ज़्यादातर प्रमोटर और ज़्यादातर बड़े निगम अति आशावादी, क़रीब-क़रीब निडर हो गए, और वैश्विक कंपनियों और कुछ भी और हर चीज़ का टेकओवर करना शुरू कर दिया. ये बुरा हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बैंकिंग प्रणाली में एक बड़ा NPA साइकल शुरू हो गया.
चूंकि उस दौरान, मैं पूंजीगत वस्तुओं और बुनियादी ढांचे को कवर करता था, इसलिए मैं एक मिसाल के बारे में बताना चाहूंगा. कई खिलाड़ी, कोयला संयंत्र लगा रहे थे लेकिन उनके पास कोयले की आपूर्ति नहीं थी. इतने सारे बिजली संयंत्रों के लिए कोयला हासिल करना क़रीब-क़रीब नामुमकिन था. जब उन्हें रेग्युलेटर, मंत्रालय से पत्र मिल रहे थे, कम से कम ज़मीनी स्तर पर एक विश्लेषक के तौर पर, मुझे पता था कि कोल इंडिया के लिए इतने सारे संयंत्रों के लिए इतने कोयले का उत्पादन करना संभव नहीं था, जो हुआ भी. इससे सीखते हुए, जब चीज़ें इतनी आशावादी हो जाती हैं, तो एक पोर्टफ़ोलियो प्रबंधक के तौर पर, अपने पोर्टफ़ोलियो को देखना शुरू करें और अपने 40-50 बिज़नस में ही, चीजें ख़राब होने से पहले, सबसे कमज़ोर निवेश से बाहर निकल जाएं, क्योंकि ये कभी-कभी ठप्प हो जाते हैं.
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12 फ़ंड्स का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती की तरह लगता है. आप उनके बीच अपना समय कैसे बांटते हैं, और आप सह-फंड प्रबंधकों के साथ कितने जुड़े हुए हैं?
मैं 12 फ़ंड्स का सीधे दैनिक आधार पर प्रबंधन (manage) नहीं करता. कुछ हैं जो सीधे प्रबंधित किए जाते हैं, जबकि कुछ को मैं सह-फंड मैनेजर के रूप में प्रबंधित करता हूं. केनरा रोबेको में दो फ़ंड मैनेजर रखने का उद्देश्य सीधा है: निवेशकों को फ़ंड के भीतर की विचार प्रक्रिया और फ़ैसलों की जानकारी मिलनी चाहिए. इसलिए, जब फ़ंड मैनेजरों का व्यवहार पता होता है, तो फ़ैसला लेने में एक निरंतरता होती है, और सामने वाला व्यक्ति जानता है कि प्राथमिक फ़ंड मैनेजर क्या कर रहा है. जिसके लिए समय-समय पर समीक्षाओं में चर्चा की जाती है.
सीधे तौर पर मैं 12 में से चार फ़ंड्स का प्रबंधन करता हूं: ब्लूचिप, फ़्लेक्सी-कैप, मल्टी-कैप और फ़ोकस्ड फ़ंड. मेरी भूमिका, जैसा मैंने कहा, विचार प्रक्रिया की निरंतरता है - कि आप शैलियों या रणनीतियों को नहीं बदल रहे हैं. दूसरा, मेरी भूमिका ये तय करना है कि पोर्टफ़ोलियो में बहुत ज़्यादा जोख़िम लेने वाला कॉन्सनट्रेशन या लिक्विडिटी न हो. तीसरा, मेरी भूमिका पोर्टफ़ोलियो के नतीजों को लेकर समीक्षा की है, चाहे वो काम कर रहे हों या नहीं.
इक्विटी मैनेजमेंट के लिए आपकी इनवेस्टमेंट फ़िलॉसफ़ी और नज़रिया क्या है?
एक फ़ंड हाउस के रूप में, हमारी एक आसान फ़िलॉसफ़ी है: आख़िरकार बिज़नस पूंजी पैदा करते हैं. मोटे तौर पर, जो बिज़नस वक़्त के साथ धन पैदा करते हैं उनमें कुछ खासियतें होती हैं, विशेषताएं होती हैं: ए) वो स्केलेबल होते हैं, बी) वो ऐसे उत्पाद या सेवाएं देते हैं जो ग्राहकों को पसंद आते हैं, और सी) उनके पास क़ाबिल प्रबंधन होता है.
इससे उन्हें नक़दी पैदा करने की क़ाबिलियत मिलती है, और बिज़नस स्केलेबल होता है. ये बिज़नस बहुत ज़्यादा धन पैदा करते हैं क्योंकि, प्रभावी रूप से, वे ऐसे उत्पाद या सेवाएं बनाते हैं, जो उन्हें पूंजी-कुशल नतीजे हासिल करने लायक़ बनाते हैं. तो ये मुख्य विचार प्रक्रिया है, जिस पर आप ध्यान केंद्रित करते हैं। मूल रूप से, ध्यान बिज़नस पर है और स्टॉक (क़ीमतों) पर इतना नहीं है क्योंकि निकट अवधि में बाज़ार काफी तर्कहीन हो सकता है, लेकिन वक़्त के साथ, ये ज़्यादा से ज़्यादा तर्कसंगत हो जाता है. एक से तीन साल के बाद, आपको शायद ही ऐसे बिज़नस मिलेंगे, जिन्होंने ख़राब प्रदर्शन किया हो, लेकिन स्टॉक ने हक़ीक़त में अच्छा प्रदर्शन किया हो, ये काफ़ी दुर्लभ है.
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दूसरा तरीक़ा, पोर्टर के पांच फ़ोर्स वाले मॉडल (Porter's five forces model) के इस्तमाल से किसी भी बिज़नस को देखना है; आप जानते हैं कि कौन सा बिज़नस किस कैटेगरी में आता है. फिर बात प्रबंधन या मैनेजमेंट की आती है. प्रबंधन की क्षमता का परीक्षण P&L में किया जाता है, और प्रबंधन के इरादे का परीक्षण बैलेंस शीट में किया जाता है. जब हम हमारे यूनिवर्स में आने वाली किसी नई कंपनी का विश्लेषण (analysis) करते हैं, तो कई फ़ानेंशियल पैरामीटर (वित्तीय मानदंड) होते हैं जिन पर हम ग़ौर करते हैं. योग्यता का संबंध हमेशा प्रबंधन से तय होता है, जिसमें देखा जाता है कि कंपनी ने उद्योग में साथियों (peers) के मुक़ाबले कैसा प्रदर्शन किया है या कंपनी की लागत संरचना साथियों के मुक़ाबले कैसी है. आपके पास दुनिया की सारी क्षमताएं हो सकती हैं; पर अगर आपके पास इरादा ( intent) नहीं है, तो ये बेकार है. और यहीं पर बैलेंस शीट बहुत ज़रूरी हो जाती है. बैलेंस शीट और सालाना रिपोर्ट में, आपके इरादे का परीक्षण किया जाता है, जैसे कि आपके पास किस तरह की अकाउंटिंग प्रैक्टिस हैं, आपके पास किस तरह की एसेट क्वालिटी है, और वर्किंग कैपिटली या कार्यशील पूंजी चक्र के मामले में आप किस तरह का बिज़नस कर रहे हैं.
फिर आपकी अकाउंटिंग प्रैक्टिस, जैसे कि बोर्ड का गठन कैसे किया जाता है, बोर्ड में कौन है, स्वतंत्र निदेशक कैसे हैं, और संबंधित पार्टी का लेनदेन भी देखना चाहिए. तो ये सभी चीज़ें आपको प्रबंधन के इरादे के बारे में बताती हैं, जो मेरे ख़्याल से बहुत ज़रूरी है क्योंकि एक साल के नज़रिए से इरादे या मंशा का कोई मतलब नहीं है. हालांकि, जब आप तीन से पांच साल का नज़रिया रखते हैं या बिज़नस में हज़ारों करोड़ का निवेश शुरू करते हैं तो इरादा बेहद महत्वपूर्ण होता है.
और फिर आता है मूल्यांकन या वैलुएशन. भारत शायद दुनिया में सबसे ज्यादा मल्टीबैगर्स वाले बाज़ारों में से एक है. तो, आपको मूल्यांकन से निपटना होगा. ज़्यादा अंदरूनी नज़रिए (intrinsic perspective) से, आपको ख़ुद को ये देखने के लिए मजबूर करना होगा कि ये बिज़नस किस तरह से लंबी उम्र का है क्योंकि आपको आमतौर पर तीन चीज़ों के लिए मूल्यांकन गुणक (valuation multiples) मिलते हैं - निकट अवधि की आय वृद्धि (near-term earnings growth), बिज़नस की दीर्घायु (longevity of the business) और पूंजी दक्षता (capital efficiency). अगर आपके पास पूंजी दक्षता है और आपका बिज़नस अगले 30 या 40 सालों तक बढ़ेगा, तो आपको वो बिज़नस 15 P/E या 30 P/E पर नहीं मिलेगा. आपको थोड़ा ज़्यादा भुगतान करना होगा, लेकिन साथ ही, पब्लिक मनी मैनेजर के तौर से, हमें इस तथ्य के प्रति संवेदनशील होना होगा कि अगले दो से तीन सालों में कमाई ज़्यादा एक जैसी (homogeneous) होगी. इसलिए, जब आप वैल्यूएशन से निपटते हैं, न कि सापेक्ष वैल्यूएशन (relative valuations) या महंगे वैल्यूएशन के लिए सस्तेपन से, तो हम फिर से बिज़नस की लंबी अवधि, कमाई में वृद्धि और पूंजी दक्षता की आंतरिक प्रकृति पर ज़्यादा ध्यान देते हैं.
आपके सबसे बड़े फ़ंड (उभरते इक्विटी, ब्लूचिप और फ़्लेक्सीकैप) का प्रदर्शन 2020-21 के बाद गिर गया. क्या आप इसके कारण और सुधार की अपनी रणनीति बता सकते हैं?
प्रदर्शन हक़ीक़त में कैलेंडर साल 2022 के मध्य के बाद गिरा, और इसके ख़ासतौर से दो कारण थे. हमारा झुकाव विकास और क्वालिटी बनाम वैल्यू की ओर है, और वो शैली आज काम कर गई है, और उस तरफ़ हमारा एलोकेशन उम्मीद से कम है. इसके अलावा, पब्लिक सेक्टर के उपक्रमों (PSU), गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) और स्मॉल कैप के तहत कुछ शेयरों ने निकट अवधि में असंगत रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है, और हमने कम एलोकेशन किया, इसलिए ये मुख्य रूप से दो कारण हैं.
जब हम साफ़ तौर से से आगे देखते हैं, तो हमने शायद 10 साल में इस रणनीति को नहीं बदला है, और हम इसे अब भी नहीं बदल रहे हैं. हम अपनी ताक़त के क्षेत्र में ज़्यादा व्यक्तिगत स्टॉक विजेताओं को खोजने पर ध्यान लगा रहे हैं. पोर्टफ़ोलियो में हर परेशान को दूर हमेशा स्टॉक का चुनाव होता है. स्टॉक का चुनना हमेशा पोर्टफ़ोलियो मैनेजर के फ़ंड हाउस की निवेश रणनीति और विचार प्रक्रिया के प्रमुख झुकाव का एक काम होता है. किसी और के सेक्टर में जाकर खेलने की कोशिश करने और हक़ीक़त में वहां इस अवसर का एलोकेशन करने की कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आप इसे लेकर आश्वस्त नहीं होते हैं. इसलिए हम चुनाव को इस तरह से मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां हमें लगे कि हमें जीतने और प्रदर्शन को वापस लाने लायक़ है.
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