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स्टॉक्स के पूर्वानुमान का ‘खेल’

शॉर्ट टर्म में बाज़ार के बारे में अनुमान लगाना नामुमकिन है. फिर भी मीडिया यह भ्रम बनाए रखने में जुटा रहता है कि यह न सिर्फ़ मुमकिन है, बल्कि आम बात है

शेयर बाज़ार की भविष्यवाणियां शॉर्ट टर्म में क्यों फेल हो जाती हैं?Aditya Roy/AI-Generated Image

2006 के मध्य में दूरदर्शन के एक टीवी शो में, जिसमें मैं शामिल था, एक दर्शक ने फ़ोन करके पूछा कि शेयर एनालिस्ट 10 में से 7 बार ग़लत क्यों साबित होते हैं. उसने यह भी पूछा कि अगले हफ़्ते बाज़ार का क्या होगा, जिसने उसके पहले सवाल का जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद दे दिया, या यूं कहें कि साफ़ कर दिया कि उसका पहला सवाल ही बेमानी था.

शॉर्ट टर्म में बाज़ार का अनुमान लगाना नामुमकिन है. फिर भी हर तरह का मीडिया, ख़ासकर बिज़नेस टीवी चैनल, यह भ्रम बनाए रखने में जुटा रहता है कि यह न सिर्फ़ मुमकिन है, बल्कि आम बात है. यह भ्रम कैसे क़ायम रहता है, यह समझाने के लिए मैं आपको वॉल स्ट्रीट का एक पुराना मज़ेदार क़िस्सा सुनाता हूं कि किसी ने बड़े एनालिस्ट की अपनी छवि कैसे बनाई.

एक ब्रोकर ने हज़ार लोगों को चिट्ठी भेजी. आधे लोगों को लिखा कि फ़लां शेयर अगले हफ़्ते चढ़ेगा और बाक़ी आधे को लिखा कि यह गिरेगा. अगले हफ़्ते उसने फिर चिट्ठी लिखी, लेकिन सिर्फ़ उन पांच सौ लोगों को जिन्हें पिछली बार सही अनुमान वाली चिट्ठी मिली थी. इस बार भी आधे को स्टॉक के चढ़ने और आधे को गिरने की बात लिखी.

यही सिलसिला छह हफ़्ते तक चलाने के बाद उसके पास क़रीब 30 लोगों का एक ऐसा समूह बच गया, जिनकी नज़र में उसने लगातार छह हफ़्ते सही अनुमान लगाकर एक बेदाग़ छवि बना ली थी. और फिर, मेरा अनुमान है, उसने इन लोगों से किसी न किसी तरह फ़ायदा उठाया. आज इंटरनेट के ज़माने में यही खेल लाखों लोगों के साथ खेला जा सकता है.

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यह क़िस्सा भले ही महज़ एक मज़ाक़ हो, लेकिन इसी तर्ज़ पर आज का बिज़नेस मीडिया चलता है. होता यह है कि तमाम एक्सपर्ट तरह-तरह की बातें कहते रहते हैं. ज़्यादातर वे सच में बुद्धिमानी भरे अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं. अधिकतर वक़्त इनमें से ज़्यादातर ग़लत होते हैं, लेकिन कुछ सही भी निकल जाते हैं. कभी-कभी जब बाज़ार थोड़ा सामान्य हो तो ज़्यादा लोगों के अनुमान सही साबित होते हैं.

यह सारी गहमागहमी दर्शकों के मन में एक धुंधला-सा यक़ीन बनाए रखती है कि बाज़ार का अनुमान लगाना मुमकिन है, क्योंकि आख़िरकार कोई न कोई, किसी न किसी चीज़ के बारे में, कभी न कभी तो सही होता ही है. फिर निवेशक इसी यक़ीन के साथ शॉर्ट टर्म की सलाह लेने निकल पड़ते हैं.

जो निवेशक नुक़सान उठाता है, वह हमेशा यही सोचता है कि उसे सही सलाह नहीं मिली. वह कभी इस असली वजह तक नहीं पहुंच पाता कि अगर आप शॉर्ट टर्म में सौ प्रतिशत सही अनुमान चाहते हैं, तो ऐसी कोई 'सही सलाह' होती ही नहीं.

शॉर्ट टर्म निवेश में आपको ऐसी सलाह मिल सकती है जो एक प्रतिशत वक़्त में सौ प्रतिशत सही हो, या ऐसी सलाह जो सौ प्रतिशत वक़्त में एक प्रतिशत सही हो. यहां तक कि ऐसी सलाह भी मिल सकती है जो एक प्रतिशत वक़्त में एक प्रतिशत सही हो, बस इतना ही.

यह कुछ वैसा ही है जैसा अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था, "आप कुछ लोगों को हमेशा के लिए बेवकूफ़ बना सकते हैं, और सभी लोगों को कुछ वक़्त के लिए, लेकिन सभी लोगों को हमेशा के लिए बेवकूफ़ नहीं बना सकते."

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