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पोर्टफ़ोलियो में 100% इक्विटी रखना कब सही है?

जब इक्विटी हिस्सेदारी की बात आती है, तो निवेशक दो धड़ों में बंट जाते हैं

जब इक्विटी हिस्सेदारी की बात आती है, तो निवेशक दो धड़ों में बंट जाते हैं

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बचत करने वाले और निवेश करने वाले अक्सर दो अलग-अलग धड़ों में दिखाई देते हैं, जबकि बीच का संतुलित रास्ता काफ़ी खाली रहता है. बात हो रही है फ़िक्स्ड इनकम और इक्विटी निवेश के बीच एसेट एलोकेशन की. यह सिर्फ़ निवेश तक सीमित नहीं है. इंसानी व्यवहार में भी ऐसा ही दिखता है. जैसे फ़िटनेस को ही ले लीजिए. ज़्यादातर लोग बिल्कुल निष्क्रिय रहते हैं और दूसरी तरफ़ कुछ लोग पूरे समय जिम में दिखाई देते हैं. संतुलित रास्ता अपनाने वाले कम होते हैं.

अब बात करते हैं बचत और निवेश की. अच्छा हो या बुरा, भारत लंबे समय तक एक ‘फ़िक्स्ड इनकम देश’ रहा है. नियमित पाठकों ने देखा होगा कि मैंने कई बार लिखा है कि भारतीय बचतकर्ता फ़िक्स्ड इनकम पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करते हैं. पीढ़ियों से लोग अपनी पूरी बचत PPF, बैंक डिपॉज़िट, पोस्ट ऑफ़िस डिपॉज़िट जैसे साधनों में लगाते आए हैं. मैंने बार-बार यह कहा है कि लंबी अवधि की बचत और निवेश को इक्विटी या इक्विटी-आधारित म्यूचुअल फ़ंड में लगाना ज़रूरी है.

दिलचस्प बात यह है कि कुछ लोग, ज़्यादातर युवा, लेकिन सिर्फ़ वही नहीं, इक्विटी के विचार को कुछ ज़्यादा ही उत्साह से अपनाते हैं. शुरुआत में जो लोग शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करते हैं और अच्छा रिटर्न देखते हैं, वे अक्सर क़रीब-क़रीब 100 प्रतिशत इक्विटी में चले जाते हैं. निवेश में एक ही एसेट में 100 प्रतिशत जाना ठीक नहीं माना जाता. इससे समझदारी भरे निवेश के दो मूल सिद्धांत टूटते हैं: एसेट एलोकेशन और एसेट रीबैलेंसिंग.

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लेकिन क्या यह हर निवेशक पर लागू होता है? क्या 100 प्रतिशत इक्विटी में होना हर किसी के लिए ग़लत है? क्या इस सवाल को नए सिरे से देखने की ज़रूरत है? आखिर एसेट एलोकेशन क्यों ज़रूरी है, और उसे बनाए रखना क्यों अहम है? इसकी बुनियाद यह है कि इक्विटी और डेट, दोनों अलग तरह के एसेट हैं. सिर्फ़ अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को संतुलित भी करते हैं. ज़्यादा रिटर्न और सुरक्षा, इन दोनों ज़रूरतों को पूरा करने में दोनों की अलग भूमिका होती है.

इक्विटी निवेश आम तौर पर फ़िक्स्ड इनकम से ज़्यादा रिटर्न देता है, लेकिन उसमें उतार-चढ़ाव भी ज़्यादा होता है. कई बार यह तेज़ी से बढ़ता है और कई बार गिर भी जाता है. जब दोनों के बीच एक तय अनुपात रखा जाता है, तो अक्सर इक्विटी में बढ़त होने पर कुछ रक़म फ़िक्स्ड इनकम में शिफ़्ट की जाती है. और जब इक्विटी गिरती है, जो समय-समय पर होता ही है, तब फ़िक्स्ड इनकम वाला हिस्सा स्थिर रहता है. इसके और भी पहलू हैं, लेकिन मूल सिद्धांत यही हैं.

किसी भी व्यक्ति के पास बिल्कुल भी फ़िक्स्ड इनकम न हो, इसका कोई ठोस तर्क नहीं है. सवाल सिर्फ़ यह है कि किस तरह की फ़िक्स्ड इनकम हो. सिद्धांत के तौर पर देखा जाए तो इक्विटी और फ़िक्स्ड इनकम के बीच बार-बार ख़रीद-बिक्री करनी चाहिए. लेकिन यह न तो आसान है और न ही टैक्स के लिहाज़ से ठीक. अच्छी बात यह है कि जो निवेशक चीज़ों को सरल रखना चाहते हैं, और ऐसा हर किसी को करना चाहिए, उनके लिए यह काम कोई और कर सकता है. वह विकल्प है हाइब्रिड म्यूचुअल फ़ंड. इसमें एसेट एलोकेशन और रीबैलेंसिंग फ़ंड के भीतर अपने आप होती है, और हर बार टैक्स देने की ज़रूरत नहीं पड़ती. ऐसे कई विकल्प मौजूद हैं, जिनके बारे में वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर जानकारी मिल सकती है.

तो क्या सारे युवा इक्विटी निवेशक ग़लत हैं? ज़रूरी नहीं. जब कोई कमाना और निवेश करना शुरू करता है, तब उसके फ़ाइनेंशियल गोल पूरे होने में अभी समय होता है. निवेश की रक़म भी कम होती है और 100 प्रतिशत इक्विटी का जोखिम भी सीमित रहता है. अगर यह सब समझने के बाद कोई पूरी तरह इक्विटी में रहना चाहता है, तो शुरुआती दौर में यह स्वीकार्य हो सकता है. उम्र बढ़ने के साथ इक्विटी का आकर्षण अपने आप कम होता है. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. एसेट एलोकेशन और रीबैलेंसिंग पैसे मैनेज करने का अहम हिस्सा हैं और आम तौर पर इनका पालन होना चाहिए. कहें तो, लगभग हमेशा.

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