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मेरे एक दोस्त हैं जो निवेश पर बेहद दिलचस्प लिखते थे और आज भी लिखते हैं.
उन्हें "मूर्ख" शब्द बहुत पसंद है, लेकिन वो इसका इस्तेमाल उस आम तरीक़े से नहीं इस्तेमाल करते - जैसे कोई स्कूल टीचर करता है. वो इस शब्द को एक ख़ास अर्थ देते हैं, जिससे बाज़ार को समझना आसान हो जाता है. एक बार उन्होंने कहा था कि बाज़ार में मूर्खता के सबसे भरोसेमंद सप्लायर बैंक हैं. इस ख़ास अर्थ में "मूर्खता" को समझने से यह साफ़ हो जाता है कि बाज़ार जिस तरह बर्ताव करते हैं, वो क्यों करते हैं. तो यह मूर्खता आख़िर है क्या? इसे समझने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि पहले यह देखें कि मूर्खता में क्या नहीं आता.
हम सब कुशल बाज़ार परिकल्पना (Efficient Market Hypothesis) के बारे में सुन चुके हैं. यह कहती है कि वित्तीय बाज़ार "कुशल" होते हैं, यानी शेयरों (या दूसरी सिक्योरिटीज़) की क़ीमतें सभी उपलब्ध जानकारी को पहले से दर्शाती हैं और इसमें सभी निवेशकों की भविष्य के बारे में सामूहिक राय भी शामिल होती है. यह परिकल्पना तभी सही होगी जब सभी के पास जानकारी समान रूप से उपलब्ध हो और सभी तर्कसंगत उम्मीदें रखते हों.
मेरे हिसाब से यहां जिस मूर्खता की बात हो रही है, वो उन तमाम चीज़ों के उलट है जो बाज़ार को कुशल बनाती हैं. यह कुछ वैसे ही है जैसे फिजिक्स में गर्मी और ठंड. आप कह सकते हैं कि जानकारी का प्रवाह और तर्कसंगत उम्मीदें बाज़ार को कुशल बनाती हैं - या फिर यह भी कह सकते हैं कि मूर्खता का प्रवाह बाज़ार को अकुशल बनाए रखता है. तो क्या यह कोई समस्या है? बिल्कुल नहीं. यह अकुशलता ही तो शेयर बाज़ार को दिलचस्प और फ़ायदेमंद बनाती है. अगर बाज़ार सच में उतने कुशल होते जितना यह परिकल्पना कहती है, तो मूर्खता को पहचानने और उसका फ़ायदा उठाने वाले लोग कम कमा पाते.
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इसीलिए मूर्खता की अटूट और बेहिसाब सप्लाई सबसे बड़ी एसेट है. मूर्खता शेयर बाज़ार की जान है. इसके बिना हम कहीं नहीं होते. कंपनियां कितना अच्छा कर रही हैं या अर्थव्यवस्था कितनी रफ़्तार से बढ़ रही है - इसकी फ़िक्र छोड़िए. समझदार निवेशकों को असल में यह सोचना चाहिए कि मूर्खता की सप्लाई बनी रहेगी या नहीं. मुझे खुशी है कि पिछले रुझानों को देखते हुए इस मोर्चे पर डरने की कोई बात नहीं है.
काफ़ी समय पहले मैंने इस देश का एक लंबा दौरा किया और 17 शहरों में घूमा - हर जगह निवेशकों से मिला और बात की. ज़्यादातर लोगों में मूर्खता का स्तर निराशाजनक रूप से कम था, लेकिन हर शहर में कुछ ऐसे लोग ज़रूर मिले जिनमें काफ़ी संभावना नज़र आई. उन्हें देखकर भरोसा हुआ कि शेयर बाज़ार में मूर्खता की सप्लाई सुरक्षित हाथों में है.
बस कुछ उदाहरण काफ़ी हैं यह समझाने के लिए कि मेरा यह आशावाद बेबुनियाद नहीं है. एक अहम बात जो मैंने नोट की - मूर्खता के सबसे होनहार सप्लायर एक अलग ही कैलेंडर इस्तेमाल करते हैं. कुछ लोगों से मिला जो "लॉन्ग-टर्म निवेश" में लॉन्ग-टर्म का मतलब छह महीने समझते थे. कुछ के लिए यह तीन महीने था और कुछ के लिए तो महज़ एक महीना. यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं - इस देश में ऐसे लोगों की अच्छी-ख़ासी तादाद है. लेकिन लॉन्ग-टर्म की जो परिभाषा सुनकर सबसे ज़्यादा उम्मीद जगी, वो थी: "जब फ़ायदा हो तो शॉर्ट-टर्म, जब नुकसान हो तो लॉन्ग-टर्म."
अब मत पूछिए - मुझे भी नहीं पता इसका क्या मतलब है.
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