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बंदर, बकरियां और बाज़ार

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बंदर, बकरियां और बाज़ार: वैल्यूएशन के मूल सिद्धांतों पर एक सीखAnand Kumar/AI-Generated Image

एक गांव में एक दिन एक आदमी आया और बोला कि वो बंदर ख़रीदना चाहता है - सौ रुपये प्रति बंदर. गांव वालों ने आस-पास के सारे बंदर पकड़े और सौ-सौ रुपये में बेच दिए. थोड़े दिन बाद एक और आदमी आया और बोला कि वो दो सौ रुपये प्रति बंदर देगा.

लेकिन अब गांव में बंदर बचे ही नहीं थे. सारे बंदर पहले आदमी के पास थे. तो गांव वाले उसके पास गए और बोले कि वो बंदर वापस लेने को तैयार हैं और पैसे लौटा देंगे. लेकिन वो आदमी बेचने को राज़ी नहीं था. गाँव वालों ने दाम बढ़ाया - पहले 150, फिर 175, फिर 199 रुपये - पर वो टस से मस नहीं हुआ, जबकि साफ़ था कि उसे बंदरों की ज़रूरत नहीं थी. आख़िरकार, बस यह देखने के लिए कि वो बेचेगा या नहीं, उन्होंने दो सौ का ऑफ़र दिया - पर वो फिर भी नहीं माना.

गांव वाले हैरान थे. तभी एक ने सोचा कि ज़रूर कोई और आने वाला होगा जो और भी ज़्यादा पैसे देगा. इसी सोच के साथ उन्होंने तीन सौ रुपये प्रति बंदर का ऑफ़र दिया - और इस बार वो मान गया. ख़ुश होकर उन्होंने झटपट पैसे चुकाए, बंदर ले लिए और उसे जाने दिया. आदमी पैसे लेकर चला गया और शायद ख़ुशी-ख़ुशी जीते रहे. गांव वाले अगले ख़रीदार का इंतज़ार करने लगे. और इंतज़ार करते रहे. और करते रहे. लेकिन बंदर ख़रीदने कोई नहीं आया.

रुकिए! अगर आपने इस कहानी का निष्कर्ष समझ लिया है, तो आप ग़लत हैं - क्योंकि कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई. यह कहानी वो बंदर वाली कहानी नहीं है जो किसी चेन-फ़ॉरवर्ड ईमेल में घूमती रहती है. मेरे वर्ज़न में पास में एक और गांव था. वहां भी एक दिन एक आदमी आया, लेकिन उसने बकरियों के लिए एक हज़ार रुपये प्रति बकरी ऑफ़र किया. बकरियां क़ीमती थीं, पर एक हज़ार तो ज़्यादा था - तो गांव वालों ने बकरियां बेच दीं. यहां भी वही हुआ. दूसरा आदमी आया, दो हज़ार का ऑफ़र दिया. पहले ने मना किया, और आख़िरकार गांव वाले तीन हज़ार रुपये में बकरियां वापस ख़रीद बैठे. यहां भी दोनों आदमी ग़ायब हो गए और इतने पैसों में बकरी ख़रीदने कोई नहीं आया. फ़र्क़ यह था कि बकरियां, बंदर नहीं थीं. रोज़ दूध मिलता था, जो अच्छा और सेहतमंद था. सुना है गांधीजी को बकरी का दूध बहुत पसंद था. बकरी की मेंगनी खाद के काम आती थी - हालांकि यह मैं पक्के से नहीं कह सकता. और जब बकरी दूध देने लायक़ न रही, तो मटन भी मिला. कुल मिलाकर, यह पूरी तरह बर्बादी नहीं थी. लेकिन बंदर वालों की क़िस्मत इतनी अच्छी नहीं थी. ये कोई डीमैट बंदर थे नहीं - घर में रखने पड़ते थे. वो बहुत खाते थे, दिन भर चिल्लाते-चीखते थे और कभी-कभी काट भी लेते थे. आख़िरकार जब साफ़ हो गया कि बंदरों की कोई क़ीमत नहीं, तो लोगों ने उन्हें छोड़ दिया और अपना नुक़सान भूलने की कोशिश की. और यही है इस कहानी का सार. बाज़ार की ऊंचाइयों पर अच्छी कंपनियां भी महंगी होती हैं और बेकार कंपनियां भी. अगर आप यह सोचकर कि कोई और बड़ा मूर्ख आएगा, बेतुके दाम देने की ग़लती करने ही वाले हैं - तो कम से कम बकरी ख़रीदिए, बंदर नहीं.

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