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Mint की साथी गेस्ट कॉलमनिस्ट देविना मेहरा ने हाल ही में एक ऐसी बात कही जो ज़्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए. उन्होंने मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) की बढ़त को बड़ी बारीकी से ट्रैक किया है, और आंकड़े चौंकाने वाले हैं. कुल MTF बुक अप्रैल 2025 से अब तक क़रीब 59 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ ₹70,000 करोड़ से लगभग ₹1.1 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गई है. इससे भी ज़्यादा चिंताजनक यह है कि इन उधार के पैसे से ली गई पोज़िशन का एक बड़ा हिस्सा उन शेयरों में है जिनमें कारोबार बहुत कम होता है - यानी जहां MTF का बकाया, रोज़ाना के ट्रेडिंग वॉल्यूम से कई गुना ज़्यादा है.
मैं वहीं से आगे बढ़ना चाहता हूं जहां उन्होंने छोड़ा, क्योंकि मुझे लगता है कि MTF की यह कहानी एक बड़ी रेगुलेटरी कमज़ोरी की झलक देती है.
फ़ाइनेंशियल रेगुलेशन को इस तरह बनाया जाता है कि वो हर व्यक्ति को अलग-अलग सुरक्षा दे. हर निवेशक को चेतावनी मिलती है. हर क़र्ज़दार को मार्जिन की शर्तें माननी होती हैं. ये नियम एक-एक इंसान को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. इनके पीछे एक सीधी सोच होती है - अगर हर व्यक्ति अच्छी तरह सुरक्षित है, तो पूरा सिस्टम सुरक्षित है.
लेकिन यह सोच ग़लत है.
बाज़ार में संकट इसलिए नहीं आता कि कोई एक इंसान बहुत ज़्यादा जोख़िम लेता है. संकट तब आता है जब हज़ारों लोग एक साथ, एक जैसा जोख़िम लेते हैं. जब मार्जिन कॉल एक साथ आती हैं, तो हर व्यक्ति का अपने लिए सही फ़ैसला मिलकर पूरे सिस्टम के लिए तबाही बन जाता है. हर क़र्ज़दार मार्जिन पूरा करने के लिए बेचता है - बिल्कुल वैसा ही जैसा उसे करना चाहिए. लेकिन जब हज़ारों लोग एक साथ यही करते हैं, तो सिस्टम चरमरा जाता है.
एक उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए दस हज़ार निवेशकों में से हर एक ने MTF के ज़रिए किसी स्मॉल-कैप शेयर में ₹10 लाख लगाए हैं. बाज़ार 10 प्रतिशत गिरता है. ब्रोकर मार्जिन कॉल करते हैं. हर निवेशक बेचने लगता है. लेकिन मुश्किल यह है कि उस शेयर का रोज़ाना का ट्रेडिंग वॉल्यूम सिर्फ़ ₹50 करोड़ है, और एक साथ ₹1,000 करोड़ की बिकवाली का दबाव आ गया. क़ीमत धड़ाम से गिरती है. सर्किट ब्रेकर लगता है. निकलने का रास्ता बंद हो जाता है. हर निवेशक ने नियम के मुताबिक़ काम किया - फिर भी सिस्टम फ़ेल हो गया.
जिन लोगों की याददाश्त अच्छी है, वो जानते हैं कि 2008 के संकट को हर दिन इसी चीज़ ने और बदतर बनाया था. लेहमन ब्रदर्स डूबी. मॉर्टगेज समर्थित सिक्योरिटीज़ रखने वाले हर बैंक ने एक साथ बेचने की कोशिश की. कोई ख़रीदार नहीं मिला. क़ीमतें पहले थम गईं, फिर क्रैश हो गईं. तरीक़ा अलग था - तब मॉर्टगेज, अब इक्विटी MTF - लेकिन पैटर्न वही है.
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तो MTF इतनी बड़ी कैसे हो गई?
MTF एक सामान्य सुविधा है जो निवेशकों को अपनी मौजूदा सिक्योरिटीज़ के बदले उधार लेकर और ख़रीदारी करने की छूट देती है. इस प्रोडक्ट में ख़ुद कुछ ग़लत नहीं है. समस्या यह है कि इसे किस तरह और किन लोगों को बेचा जा रहा है.
व्यवस्था के हिसाब से ब्रोकर MTF लोन पर ब्याज कमाते हैं, जो आमतौर पर 14 से 25 प्रतिशत सालाना होता है. यह एक ऐसा इनसेंटिव स्ट्रक्चर है जो भारत की वित्तीय सेवाओं को थोड़ा भी जानने वाले किसी भी शख़्स को पहचाना-सा लगेगा. ब्रोकरों को एक ऐसा प्रोडक्ट मिल गया है जो बार-बार ब्याज की आमदनी देता है और उनकी मार्केटिंग मशीन सीधे उन रिटेल निवेशकों की तरफ़ मुड़ गई है जिन्हें लेवरेज्ड पोज़िशन में होना ही नहीं चाहिए.
एक पुराने कॉलम में मैंने लिखा था कि जब रात में बुरी ख़बर आती है - और आजकल यह हमेशा होता है - तो प्री-मार्केट में घबराहट क्यों फैलती है. जवाब था: लेवरेज्ड निवेशक, यानी वो लोग जिन्होंने उधार लेकर पोज़िशन ली है और जिनके लिए हर घंटे की देरी सचमुच एक मुसीबत है. वो तर्कहीन नहीं हैं - उनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए जल्दी से बेचना ही उनके लिए सही क़दम है.
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1 अप्रैल से लागू हुए RBI के नए नियमों में इस जोख़िम को आंशिक रूप से माना गया है. ये नियम उन बैंकों के लिए कोलेटरल की शर्तें कड़ी करते हैं जो ब्रोकरों की MTF बुक को फ़ंड करते हैं. अब बैंकों को MTF लोन के बदले 100 प्रतिशत कोलेटरल रखना होगा, जिसमें कम से कम 50 प्रतिशत कैश होना चाहिए. यह एक देर से आई स्वीकृति है कि पार्टी को बहुत लंबे समय तक चलने दिया गया.
लेकिन इसमें एक विडंबना है: अगर रेगुलेटरी सख़्ती ब्रोकरों को तेज़ी से MTF बुक घटाने पर मजबूर करे, तो यह ख़ुद एक मजबूरी में की जाने वाली बिकवाली की वजह बन सकती है. यानी इलाज ही बीमारी को और बढ़ा सकता है.
यह लेख पढ़ रहे आम निवेशक के लिए व्यावहारिक बात सीधी है. MTF एक ऐसी सुविधा है जिसे वो लोग आपको बेच रहे हैं जिनका फ़ायदा इसी में है कि आप इसका इस्तेमाल करें. अगर आप SIP और लॉन्ग-टर्म इक्विटी होल्डिंग के ज़रिए धीरे-धीरे वेल्थ बना रहे हैं, तो MTF आपके किसी काम की नहीं है.
₹1.1 लाख करोड़ के लेवरेज्ड पोज़िशन आपकी समस्या नहीं हैं. लेकिन जब ये पोज़िशन धीरे-धीरे खत्म होनी शुरू होंगी -और कभी न कभी ऐसा होगा ही - तब आपके पोर्टफ़ोलियो पर इसका असर ज़रूर पड़ेगा. आप 15-20 प्रतिशत की गिरावट देखेंगे, जिसका आपकी अपनी कंपनियों की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं होगा. यह उसी बाज़ार में रहने की क़ीमत है जहां झुंड में चलने की मानसिकता काम करती है. यह समझना कि बाज़ार क्यों गिर रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि आपको कुछ करना ही होगा.
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