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अक्षम होने के फ़ायदे

निवेश की दुनिया में थ्योरी और प्रक्रियाओं की अहम भूमिका है. लेकिन फिर व्यक्ति और उसकी काबिलियत या सहज समझ कहां फ़िट होती है? क्या ये भी सफल निवेश में बड़ी भूमिका निभाते हैं?

निवेश की दुनिया में थ्योरी और प्रक्रियाओं की अहम भूमिका है. लेकिन फिर व्यक्ति और उसकी काबिलियत या सहज समझ कहां फ़िट होती है? क्या ये भी सफल निवेश में बड़ी भूमिका निभाते हैं?Aditya Roy/AI-Generated Image

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मुझे लगता है दुनिया का हर स्टॉक निवेशक सहज रूप से एफ़िशिएंट मार्केट हाइपोथेसिस यानी EMH को नहीं मानता. इसीलिए तो हम निवेशक हैं, है ना? मेरा मतलब है, शेयरों में निवेश का पूरा मक़सद ही किसी दूसरे शख्स से ज़्यादा पैसा कमाना है, चाहे वो शख्स आपका चिड़चिड़ा क़लीग हो, आपका साला हो या बाज़ार खुद हो. शेयरों में निवेश, अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करके बेहतर करने की कोशिश है और यही इसकी बुनियाद है.

दुर्भाग्य से, हम किसी बात पर यक़ीन करना चाहते हैं तो वो सच नहीं हो जाती. कड़वी सच्चाई यह है कि EMH ने पिछले 60 सालों में अपनी सच्चाई के कई पक्के सबूत जमा किए हैं. अमेरिकी बाज़ारों में EMH का सबसे बड़ा सबूत यह है कि ज़्यादातर म्यूचुअल फ़ंड और हेज फ़ंड बाज़ार के ब्रॉड इंडेक्स को मात नहीं दे पाते. इसे आमतौर पर अहम और परिस्थितिजन्य सबूत के रूप में देखा जाता है, जो दिखाता है कि बाज़ार को मात देना मुमकिन नहीं है. बेशक, यह असल में किसी बिल्कुल अलग बात का सबूत भी हो सकता है. उदाहरण के लिए, यह इस बात का सबूत हो सकता है कि अमेरिकी फ़ंड मैनेजमेंट इंडस्ट्री इस तरह से बनी है कि ज़्यादातर फ़ंड मैनेजर नाक़ाबिल हैं. मेरे नज़रिए से, अमेरिकी फ़ंड मैनेजरों का ख़राब प्रदर्शन एक बिल्कुल अलग मुद्दा है.

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क्या इसका उल्टा सच है? अगर फ़ंड मैनेजरों का ख़राब प्रदर्शन न EMH के काम करने का सबूत है और न ही काम नहीं करने का, तो क्या फ़ंड मैनेजरों का अच्छा प्रदर्शन यह साबित करेगा कि EMH काम नहीं करती और बाज़ार को मात देना मुमकिन है? मुझे लगता है- हां. EMH किसी देश के कारोबार और शेयर बाज़ार के विकास और परिपक्वता के एक ख़ास चरण पर लागू होती है.

EMH के पीछे यह सोच है कि बाज़ार को आम तौर पर जो जानकारी पता है उसका इस्तेमाल फ़ायदा उठाने के लिए नहीं किया जा सकता. यह अहम है. मुझे लगता है भारत जैसे तेज़ी से बदलते बाज़ार में जानकारी के बारे में जागरूकता और उसे समझने का तरीक़ा अमेरिका से बुनियादी रूप से अलग है. भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव की रफ़्तार बहुत तेज़ है. सेक्टर, कंपनियां और कारोबारी फ़ायदे कुछ सालों में और कभी-कभी महीनों में बदल सकते हैं. ऐसे में, भले ही कोई जानकारी सैद्धांतिक रूप से सबको पता हो, उसकी अहमियत की समझ और फ़ायदा सबको एक जैसा नहीं होता.

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बुनियादी रूप से ज़रूरी जानकारियों का प्रवाह इतना तेज़ है कि भले ही ख़बर 'बाहर' आ गई हो, कुछ के लिए काम की हो सकती है और कुछ के लिए नहीं. ऐसे में, कुछ निवेशकों और इन्वेस्टमेंट मैनेजरों के लिए लगातार आगे रहना और बाज़ार को मात देना आसान है. क्या EMH सभी बाज़ारों पर लागू नहीं होती? नहीं होती, और यहां तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता Eugene Fama, जिन्होंने यह थ्योरी दुनिया के सामने रखी, भी बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसा नहीं सोचते. एक साथ के इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया 'क्या सभी शेयर बाज़ार समान रूप से असरदार हैं?', वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि उभरते बाज़ारों में, शायद इनसाइडर्स के पास घरेलू बाज़ारों से ज़्यादा जानकारी होती है, लेकिन शायद नहीं भी. किसी भी हाल में, उभरते बाज़ारों के बारे में जानने के लिए पर्याप्त डेटा नहीं है. और उतार-चढ़ाव इतना ज़्यादा है कि वैसे भी जानना नामुमक़िन होगा. जब लोग विकसित बाज़ारों में मनी मैनेजर्स का अध्ययन करते हैं, तो उन्हें कोई सबूत नहीं मिलता कि वो बाज़ार अक्षम हैं... और अमेरिका में इस बात के बहुत कम सबूत हैं कि वो अक्षम हैं. लेकिन मैंने कभी यह अतिवादी रुख़ नहीं अपनाया कि बाज़ार पूरी तरह एफ़िशिएंट हैं."

जैसे-जैसे निवेश की संस्थागत 'वैश्विक' शैली भारत में गहरी पैठ बना रही है, प्रक्रियाओं और थ्योरी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. इनकी एक भूमिका है, लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि व्यक्ति मायने रखते हैं और किसी व्यक्ति की क़ाबिलियत और सहज समझ निवेश की सफ़लता में गहरी भूमिका निभाती है.

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