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प्रक्रिया बनाम अनियमितता

ट्रेडर, मैथेमेटिशियन और लेखक नसीम तालेब का मानना है कि बाज़ार हमारी सोच से कहीं ज़्यादा रैंडम हैं. वहीं, मॉडल्स तथा इन्वेस्टमेंट थियरीज़ पर बढ़ती निर्भरता वित्तीय तबाही की आशंका और बढ़ा रही है.

ट्रेडर, मैथेमेटिशियन और लेखक नसीम तालेब का मानना है कि बाज़ार हमारी सोच से कहीं ज़्यादा रैंडम हैं. वहीं, मॉडल्स तथा इन्वेस्टमेंट थियरीज़ पर बढ़ती निर्भरता वित्तीय तबाही की आशंका और बढ़ा रही है.Aditya Roy/AI-Generated Image

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एक अमेरिकी पत्रिका के इंटरव्यू में यह बात छपी थी, "हमने इतने सारे अनुभव और सामान्य समझ को 'मॉडल्स' से बदल दिया, जो ज्योतिष से भी बदतर काम करते हैं." इस इंटरव्यू में नसीम तालेब नाम के एक शख़्स से पूछा गया है कि इन्वेस्टमेंट पोर्टफ़ोलियो मैनेज करने के तरीक़े में क्या ग़लत है. इसी इंटरव्यू में तालेब आगे कहते हैं, "किसी ऐसी चीज़ को मॉडल में फ़िट करने की कोशिश करना जो मॉडलाइज़ेशन से परे है, यही असली समस्या है. हमें मॉडल इसलिए पसंद हैं क्योंकि इनके लिए अनुभव की ज़रूरत नहीं पड़ती. कभी-कभी यह कहना ज़रूरी होता है कि कोई मॉडल न होना, एक ख़राब मॉडल से बेहतर है, जैसे किसी नीम-हक़ीम की सलाह से बेहतर है कि कोई दवा ही न ली जाए."

तालेब को आपने शायद 'द ब्लैक स्वान: द इम्पैक्ट ऑफ़ द हाइली इम्प्रोबेबल' किताब के लेखक के तौर पर जाना होगा. वे ख़ुद को अनियमितता (randomness) और ज्ञान के स्कॉलर बताते हैं. लेबनानी मूल के इस अमेरिकी ने वॉल स्ट्रीट पर दो दशक तक ट्रेडर के रूप में काम किया, लेकिन अब वे ख़ुद को 'स्कॉलर ऑफ़ रैंडमनेस' कहते हैं. तालेब का मुख्य विचार है 'ब्लैक स्वान', जो एक अचानक होने वाली ऐसी घटना का प्रतीक है जिसे कोई पहले से भांप न सके. उनका मानना है कि दुनिया का वित्तीय उद्योग, एकेडमिया की मिलीभगत से, उन गतिविधियों में विज्ञान और प्रोसेस का दिखावा करके अपनी रोज़ी-रोटी चला रहा है, जहां असल में ऐसा कुछ है ही नहीं. वॉल स्ट्रीट पर अपने सालों के दौरान उन्होंने देखा कि पोर्टफ़ोलियो मॉडल हक़ीक़त से कोसों दूर होते चले गए, फिर भी उनका इस्तेमाल बढ़ता रहा, जैसे कुछ ग़लत है ही नहीं. इसकी एक वजह यह भी है कि बिज़नेस स्कूलों ने अनुभव की जगह पोर्टफ़ोलियो थियरी पढ़ाना तेज़ कर दिया है. एक पूरी नई पीढ़ी यह सोचकर बड़ी हुई है कि यह सब विज्ञान ही होगा, क्योंकि यह विज्ञान जैसा दिखता है और विज्ञान होने का दावा करता है.

तालेब का मानना है कि मौजूदा वैश्विक वित्तीय संकट जैसी तबाही का सटीक वक़्त या स्वरूप भले ही अनुमान से परे हो, लेकिन यह तय है कि समय-समय पर कोई न कोई बड़ा धमाका होता रहेगा. इस इंटरव्यू में तालेब कहते हैं कि वित्तीय दुनिया में संकट कम आ रहे हैं, लेकिन जब आते हैं तो ज़्यादा गहरे होते हैं. एक बेहद दिलचस्प विचार जो वे रखते हैं, वह है कारोबारों की बढ़ती एकरूपता का ख़तरा. और इसे वे जैविक भाषा में समझाते हैं: पहले वित्तीय दुनिया में बहुत विविध इकोलॉजी थी, लेकिन आज अमेरिका का पूरा सिस्टम कुछ बड़े बैंकों के हाथ में है और सबका जोख़िम एक जैसा है.

यह विविधता की अहमियत पर एक दिलचस्प नज़रिया है. मुझे लगता है यही वजह है कि खेत और बागान पौधों की बीमारियों से तबाह हो जाते हैं, जबकि जंगल टिके रहते हैं. यही कारण है कि Windows PC पर कंप्यूटर वायरस का हमला होता है, लेकिन Linux और Mac पर नहीं. एक दबदबे वाला लेकिन विविधता से रहित सिस्टम ऊपर से शांत दिखता जाता है, लेकिन भीतर से जोख़िम बढ़ता रहता है. एक ऐसा विशाल वित्तीय उद्योग जिसमें सब एक जैसी घटिया थियरीज़ के आधार पर एक जैसे काम कर रहे हों, उसका नतीजा यह होगा: लंबे वक़्त तक सब ठीक-ठाक लगेगा और फिर एक ऐसा संकट आएगा जो तर्क से कहीं ज़्यादा गहरा और दूर तक फैला होगा.

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