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क्या फ़र्टिलाइज़र कंपनियां मुश्किलों से उबर पाएंगी?

फ़र्टिलाइज़र कंपनियों को मुश्किल में डालने वाले हालातों पर एक नज़र

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फ़र्टिलाइज़र इंडस्ट्री मुश्किल दौर से गुज़र रही है. FY24 में बड़ी कंपनियों के रेवेन्यू और प्रॉफ़िटेबिलिटी में भारी गिरावट दर्ज की गई. मिसाल के तौर पर, गुजरात स्टेट फ़र्टिलाइज़र्स ने इस साल अपने मुनाफ़े में 89 प्रतिशत की गिरावट देखी! इसके दो कारण थे:

1) ख़राब मानसूनः इस साल अनियमित बारिश ने फसल उत्पादन को प्रभावित किया, जिससे उर्वरक की मांग कम हुई और उद्योग की बिक्री में कमी आई.

2) सरकारी सब्सिडी में कमीः चूंकि FY23 के अंत में कच्चे माल की क़ीमतों में कमी आई थी, इसलिए सरकार ने अगले साल के लिए सब्सिडी रेट में कटौती की. हालांकि, कच्चे माल की क़ीमतें अस्थिर हो गईं और लागत बढ़ गई. नतीजा, ऊंची इनपुट कॉस्ट के साथ सब्सिडी सपोर्ट में कमी ने उद्योग के मुनाफ़े को कम कर दिया.

तो, इस इंडस्ट्री के लिए आने वाला समय कैसा रहेगा? इससे पहले कि हम इस पर विस्तार से चर्चा करें, आइए संक्षेप में समझें कि ये इंडस्ट्री किस तरह सब्सिडी पर निर्भर है.

फ़र्टिलाइज़र इंडस्ट्री के लिए सब्सिडी कैसे काम करती है?

सरकार उर्वरक की खुदरा क़ीमतों पर सीमा लगाकर क़ीमत पर नियंत्रण रखती है. ऐसा किसानों को कम क़ीमतों पर उर्वरक मुहैया कराने के लिए किया जाता है. इसकी भरपाई के लिए, उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी का भुगतान किया जाता है, जो उनके उत्पादन की लागत और उर्वरकों के बिक्री मूल्य के बीच का अंतर होता है.

यूरिया और गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए सब्सिडी की स्थिति अलग-अलग है. यूरिया उर्वरकों की बिक्री क़ीमत ₹5.6 प्रति किलोग्राम तय की गई है. इन उर्वरकों की उत्पादन लागत और तय बिक्री मूल्य के बीच का अंतर यूरिया निर्माताओं को दिया जाता है.

गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए, क़ीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है, जिसका अर्थ है कि कंपनियां ख़ुद ही बिक्री मूल्य तय करती हैं. लेकिन उन्हें दी जाने वाली सब्सिडी तय है. यही कारण है कि उन्हें जहां अपनी लागत जितना हो सके कम रखनी होती है, वहीं कई अन्य कंपनियों के मुक़ाबले प्रतिस्पर्धी मूल्य बनाए रखना होता है. इसके अलावा, सरकारी स्वामित्व वाली इफ्को (IFFCO) इन उर्वरकों में लगभग 40 फ़ीसदी बाज़ार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी उत्पादक है, इसलिए बाज़ार की क़ीमतों पर अप्रत्यक्ष सरकारी प्रभाव बना हुआ है.

उद्योग के रेग्युलेटरी ढांचे में कई और परत भी शामिल हैं. आप इसे हमारी दूसरी स्टोरी में विस्तार से पढ़ सकते हैं.

क्या फ़र्टिलाइज़र इंडस्ट्री के हालात सुधरेंगे?

बड़ा सवाल बना हुआ है; उद्योग के लिए आगे क्या है? उर्वरक कंपनियों को पटरी पर लाने के लिए, दो प्रमुख क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है, मानसून और सब्सिडी दरें (गैर-यूरिया खिलाड़ियों के लिए). अगर 2024 में मानसून अनिश्चित रहता है, तो उद्योग के लिए वॉल्यूम कम रहेगा.

सब्सिडी की बात करें, तो ये पूरी तरह से सरकार पर निर्भर है. सरकार वैश्विक क़ीमतों के आधार पर सब्सिडी एलोकेशन को बढ़ाने या घटाने का फ़ैसला करती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि स्थानीय क़ीमतें वैश्विक बाज़ार में क़ीमतों के साथ-साथ चलती हैं और इसका असर घरेलू उद्योग के आयात और कच्चे माल की लागत पर पड़ता है. उदाहरण के लिए, FY23 में, उर्वरक सब्सिडी में काफ़ी बढ़ोतरी की गई थी क्योंकि कच्चे माल की क़ीमतें वैश्विक बाज़ार के हिसाब से बढ़ रही थीं.

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इसलिए, उर्वरक कंपनियों की किस्मत को प्रभावित करने वाले दोनों ही कारक अप्रत्याशित हैं. लेकिन ये तय है कि अगर उद्योग में प्रतिकूल परिस्थितियां बनी रहीं, तो कंपनियों के संचालन में बाधा उत्पन्न होगी. फ़ाइनेंशियल ईयर 24 की चौथी तिमाही में, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर्स के प्रबंधन ने कहा कि खरीफ सीजन (जून-सितंबर 2024) के लिए घोषित सब्सिडी से कोई राहत नहीं मिलेगी, जिससे उर्वरक आयात और विनिर्माण अव्यवहारिक हो जाएगा.

दक्षता के मामले में किस स्थिति में हैं कंपनियां?

कंपनी 5 साल का औसत EBITDA मार्जिन (%) 5 साल का औसत ऑपरेटिंग मार्जिन (%) 5 साल का मीडियन ROCE (%)
फ़र्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर 12.3 5.2 46.5
कोरोमंडल 11.8 10 32.1
चंबल फ़र्टिलाइजर्स 13.3 9.7 18.8
राष्ट्रीय केमिकल्स 6.5 3.4 11.6
गुजरात नर्मदा वैली फ़र्टिलाइजर्स 16.5 12.2 16.2
गुजरात स्टेट फ़र्टिलाइजर्स 9.1 6.6 7.6
फ़ाइनेंशियल ईयर 20-24 का डेटा

हालात को और खराब करने के लिए, सरकार के नियम और सख्त होते जा रहे हैं. सरकार ने हाल ही में उर्वरक कंपनियों के मुनाफ़े को सीमित करने के लिए मानदंड पेश किए हैं. उन्होंने उद्योग के लिए अधिकतम सालाना प्रॉप़िट मार्जिन इस प्रकार तय किया है:

  • इम्पोर्टर्स के लिए 8 फ़ीसदी
  • मैन्यूफैक्चर्स के लिए 10 फ़ीसदी
  • इंटिग्रेटेड मैन्यूफैक्चरर्स के लिए 12 फ़ीसदी

हमारी राय

चूंकि इस इंडस्ट्री को सख्ती के साथ रेग्युलेट किया जाता है, इसलिए कई खिलाड़ी अप्रत्याशित रूप से क्रॉप प्रोटेक्शन और कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरिंग जैसे अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों जैसे कम रेग्युलेटेड क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

भले ही, उद्योग में मौजूदा मंदी कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये स्पष्ट हो गया है कि केवल सबसे योग्य कंपनी ही आगे बनी रहेगी, यानी वे कंपनियां जिनका अपनी प्रोडक्शन कॉस्ट और दक्षता पर बेहतर नियंत्रण हो.

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