
किसी भी बिज़नस के लिए एक साल का समय बहुत लंबा होता है. ब्रोकरेज कंपनी एंजेल वन पर ही ग़ौर कीजिए, जो कभी निवेशकों की आंखों का तारा बनी हुई थी, लेकिन बीते साल उसे बड़ा झटका लगा है. शेयर में 26 फ़ीसदी की गिरावट आ चुकी है, और इसका P/E रेशियो अब अपने पांच साल के औसत 19 गुना से नीचे है. इसका कारण SEBI द्वारा बढ़ाई गई नियामकीय जांच है.
हम यहां बता रहे हैं कि अभी तक क्या हुआ और ये आकलन भी कर रहे हैं कि क्या कंपनी के इस हालात से उबरने के उपायों और इसके कम वैल्यूएशन के कारण निवेशकों के लिए कोई मौक़ा है.
एंजल वन रेग्युलेटर की तरफ़ से दबाव में है
एंजल वन हमेशा से ही मुख्य रूप से ब्रोकिंग और संबंधित सेवाओं से रेवेन्यू मिलता रहा है. पिछले पांच साल और हाल में तीसरी तिमाही में इसके बिज़नस पर क़रीब से नज़र डालने से पता चलता है कि रेग्युलेटरी बदलावों ने मुख्य परिचालनों पर ख़ासा प्रभाव डाला है.
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'ट्रू टू लेबल' फ़्रेमवर्क:
जुलाई 2024 में SEBI के "ट्रू-टू-लेबल" ढांचे से सबसे बड़ा झटका लगा, जिसने एक्सचेंज शुल्क से जुड़े मानक तय किए और अतिरिक्त शुल्क समाप्त कर दिए जो ब्रोकर पहले विभिन्न मदों के तहत वसूलते थे. एंजेल वन की बात करें तो इस बदलाव के चलते रातोंरात उसे रेवेन्यू में 8 फ़ीसदी का झटका लगा.
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F&O को झटका:
इसके अलावा, SEBI ने डेरिवेटिव (F&O) सेगमेंट के प्रति रिटेल निवेशकों की सनक पर लगाम कसने के लिए सख्त कार्रवाई की थी, जिसका एंजेल वन के ब्रोकिंग रेवेन्यू में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा योगदान है. मार्जिन पर सख्ती और गिरवी रखे से जुड़े मैकेनिज्म सहित नई बंदिशों के चलते ट्रेडिंग की गतिविधियां कम हो गई हैं.
NSE पर F&O से जुड़ा एवरेज डेली टर्नओवर 2024 में मात्र 3 फ़ीसदी बढ़ा, जबकि 2023 में इसमें 100 फ़ीसदी की ग्रोथ रही थी. इसका कंपनी के ऑर्डर वॉल्यूम पर सीधे असर पड़ा है. फ़ाइनेंशियल ईयर 25 की तीसरी तिमाही में, इसका एवरेज डेली टर्नओवर 13 फ़ीसदी गिरा है, जो चार वर्षों में पहली बड़ी गिरावट थी.
- वित्तीय स्थिति पर प्रभाव: इसका असर कंपनी की हालिया अर्निंग्स में दिखाई दे रहा है. फ़ाइनेंशियल ईयर 2025 की तीसरी तिमाही में कंपनी का कर के बाद का मुनाफ़ा सालाना आधार पर सिर्फ़ 8 फ़ीसदी बढ़ा, जबकि पिछली तीन तिमाहियों में इसकी ग्रोथ रेट 25 फ़ीसदी थी. एक साल पहले, इसमें 16 फ़ीसदी की अच्छी ग्रोथ देखने को मिली. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में तीसरी तिमाही में गिरावट और ज़्यादा 34 फ़ीसदी रही थी.
एंजेल वन का सेग्मेंटवाइज़ रेवेन्यू
ब्रोकिंग रेवेन्यू का 80% F&O सेग्मेंट से आता है
| बिज़नस सेग्मेंट | FY21 (%) | FY22 (%) | FY23 (%) | FY24 (%) | Q3 FY'25 (%) |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. ग्रॉस ब्रोकिंग | 70 | 68 | 69 | 68 | 65 |
| - F&O | 51 | 71 | 83 | 84 | 81 |
| - कैश | 40 | 24 | 12 | 11 | 12 |
| - कमोडिटी | 8 | 4 | 4 | 5 | 7 |
| - करेंसी | 1 | 1 | 1 | 0 | 0 |
| 2. इंटरेस्ट | 15 | 16 | 17 | 18 | 28 |
| 3. डिपॉज़िटरी | 7 | 7 | 3 | 4 | 4 |
| 4. एंसिलर ट्रांजेक्शन | 4 | 6 | 9 | 8 | 0 |
| 5. डिस्ट्रीब्यूशन | 3 | 2 | 1 | 1 | 2 |
| 6. अदर इनकम | 1 | 1 | 1 | 1 | 1 |
| नोट: सेग्मेंट रेवेन्यू को कुल रेवेन्यू के % के रूप में दिखाया गया है | |||||
ब्रोकिंग रेवेन्यू पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को पहचानते हुए, एंजेल वन अब नए क्षेत्रों में विस्तार कर रही है, जिसमें एसेट मैनेजमेंट, जहां ये पैसिव इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट और ETF लॉन्च करने की योजना बना रही है; वेल्थ मैनेजमेंट, जहां ये व्यक्तिगत एडवाइज़री सर्विसेज़ के साथ हाई नेटवर्थ वाले क्लाइंट्स को लक्षित कर रही है; क्रेडिट प्रोडक्ट्स, NBFC के साथ साझेदारी में असुरक्षित पर्सनल लोन की पेशकश और इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यशन भी शामिल है.
लेकिन क्या ये नए बदलाव फ़ायदेमंद होंगे?
AMC बनाना एक सुस्त प्रक्रिया है. 2023 में लॉन्च होने के बावजूद, ज़ीरोधा और हेलिओस म्यूचुअल फ़ंड ने क्रमशः ₹4,000 करोड़ और ₹3,000 करोड़ का AMC जमा किया है. भले ही एंजल वन ने गति पकड़ी हो, लेकिन इसका फ़ायदा मामूली हो सकता है. असल में, HDFC AMC जैसे शीर्ष कंपनियां अपने AUM का केवल 0.4 फ़ीसदी फ़ायदे के रूप में कमाते हैं.
इसी तरह, पेटीएम (4.2 करोड़ रजिस्टर्ड मर्चेंट्स) और फोनपे जैसी दिग्गज कंपनियां डिजिटल फ़ाइनेंशियल मार्केट पर हावी हैं, जो एंजल वन के लिए क्रेडिट प्रोडक्ट्स में विस्तार करने के लिए एक कठिन चुनौती पेश करती हैं.
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आगे का सफ़र
परिचालन में डायवर्सिफ़िकेशन लाने के अपने प्रयासों के बावजूद, एंजेल वन का भविष्य फिलहाल रेग्युलेटर से जुड़ी चुनौतियों और घटते ट्रेडिंग वॉल्यूम से घिरा हुआ है. एसेट मैनेजमेंट, वेल्थ सर्विसेज़ और क्रेडिट प्रोडक्ट्स में विस्तार करने के कंपनी के कदम से ब्रोकिंग रेवेन्यू पर निर्भरता कम हो सकती है, लेकिन इसके लिए अभी भी एक लंबा सफ़र तय करना होगा.
इसके अलावा, अभी रेग्युलेटर की तरफ़ से और कदम उठाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, जो कंपनी की अर्निंग्स को और ज़्यादा गिरावट के लिए असुरक्षित बनाता है. निवेशकों को याद रखना चाहिए कि हर सस्ता स्टॉक अच्छा सौदा नहीं होता है.
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