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सीमाओं के पार, नियमों से परे

विदेशी शेयरों में निवेश का मतलब है बढ़िया कारोबार का मालिक बनना, न कि सिर्फ़ घरेलू बाज़ार की गिरावट से बचना

विदेशी शेयर: घरेलू बाजारों से आगे बढ़ना क्यों एक स्मार्ट कदम हैAditya Roy/AI-Generated Image

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हाल ही में एक पाठक ने मुझसे पूछा कि किसी को अपने इक्विटी पोर्टफ़ोलियो का कितना प्रतिशत विदेशी शेयरों में निवेश करना चाहिए. ये एक आम सवाल है, और कई निवेशक एक सीधे-सादे नंबर की उम्मीद करते हैं-शायद 20 या 30 प्रतिशत-जिसे वे अपने पोर्टफ़ोलियो पर लागू करें और चैन की नींद सो सकें. लेकिन ज़रा गहराई से सोचने पर मुझे एहसास हुआ कि डेट और इक्विटी के एलोकेशन को लेकर तो तमाम गाइडलाइनें मौजूद हैं, पर विदेशी शेयरों में कितना निवेश किया जाए इसका कोई एक तयशुदा सिद्धांत नहीं है.

डेट बनाम इक्विटी एलोकेशन पर बात करते हुए, हम अलग-अलग ख़ूबियों वाली, अलग-अलग एसेट क्लास पर फ़ैसले लेते हैं. डेट एक तयशुदा और आमतौर पर कम उतार-चढ़ाव वाला एक कॉन्ट्रैक्ट होता है. इक्विटी के सभी जोखिमों और संभावित फ़ायदों के साथ स्वामित्व की बात होती है. इसमें अंतर साफ़ होता है, और एलोकेशन के रूल आसानी से समझ में आते हैं.

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लेकिन भारतीय बनाम अमेरिकी बनाम जापानी इक्विटी का क्या? ध्यान दें कि वे सभी एक ही एसेट क्लास या परिसंपत्ति वर्ग हैं. इक्विटी इक्विटी है, चाहे किसी भी देश के स्टॉक एक्सचेंज पर ट्रेड की जाए. सैद्धांतिक तौर पर, ऐसी कोई वजह नहीं कि भारतीय निवेशक को अपने इक्विटी पोर्टफ़ोलियो का 100 प्रतिशत अमेरिकी स्टॉक, जापानी, यूरोपीय या इनमें से किसी भी कॉम्बिनेशन में क्यों नहीं लगाना चाहिए. यही बात उन देशों के निवेशकों पर भी लागू होती है जो भारतीय इक्विटी में निवेश करने पर सोच-विचार कर रहे हैं.

उन लोगों को ये बात समझने में कुछ परेशानी महसूस कर सकती है जो लगातार निवेश की "घरेलू पूर्वाग्रह" वाली सलाह की डायट पर रहे हैं. लेकिन ज़रा सोचिए: अगर कोई कंपनी मज़बूत बुनियाद और ग्रोथ की संभावनाओं वाला एक अच्छा निवेश है, तो वो दुनिया के किस हिस्से में है, ये बात सिर्फ़ एक और डिटेल से ज़्यादा मायने क्यों रखे? जब आप शेयर ख़रीदते हैं, तो आप किसी बिज़नस का स्वामित्व ख़रीदते हैं, न कि उस देश का एक टुकड़ा.

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बेशक़, वास्तविकता इस विशुद्ध सैद्धांतिक सोच को काफ़ी जटिल बना देती है. भारत सहित ज़्यादातर देशों में रेग्युलेशन की बाधाएं मौजूद हैं, जहां रिटेल निवेशकों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विकल्प, अपने प्रकार या आकार में सीमित हैं. हमारे टैक्स क़ानून विदेशी निवेशों को अलग और कम अनुकूल तरीक़े से देखते हैं. और फिर एक्सचेंज रेट की अनिश्चितता वापस रुपए में बदलने पर मुनाफ़े (सकारात्मक या नकारात्मक) पर बड़ा असर कर सकती है.

एक और बात इन व्यावहारिक रुकावटों को और बढ़ाती है. सरहदों के पार निवेश को लेकर क़ानूनी मदद काफ़ी चुनौती भरी होती है. अगर किसी विदेशी ज़मीन में आपके निवेश के साथ कुछ ग़लत हो जाता है, तो अंजाने लीगल सिस्टम से जूझने में बड़ी मुश्किल पेश आती है, यानी इसमें बुनियादी पैमाने भी बदल जाते हैं और ये बेहद ख़र्चीली भी होता है.

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ये ऐसा दौर है जिसमें भू-राजनीतिक स्थिरता को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता. ट्रेड वॉर, प्रतिबंध और कूटनीतिक झगड़े किसी निवेश के अच्छे फ़ैसले को रातों-रात ज़ब्त की गई संपत्ति में बदल सकते हैं. किसी ऐसे व्यक्ति से पूछें जिसने यूक्रेन संघर्ष से ठीक पहले रूस में निवेश किया था, या उन पश्चिमी कंपनियों से जिनके चीन के कामकाज अचानक जांच के दायरे में आ गए.

जानकारियों की मुश्किलें एक और चुनौती पेश करती है. हमारी हाइपर-कनेक्टेड दुनिया के बावजूद, स्थानीय निवेशकों के पास अभी भी बारीकियों और सांस्कृतिक संदर्भों की समझ होती है जो क्वार्टर्ली रिपोर्टों या प्रेस रिलीज़ में आसानी से नहीं मिला करतीं. किसी इंडस्ट्री को थोड़ा-बहुत जानने वाला एक अंजान शख़्स भी ऐसी जानकारी दे सकता है जो हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा एक विदेशी निवेशक कभी नहीं जान पाएगा.

लेकिन इन वास्तविक जटिलताओं के बावजूद, निवेशकों को ज्योग्राफ़िकल एलोकेशन को उसी साफ़ सोच वाले तर्क के साथ अपनाना चाहिए, जैसा कि वे (उम्मीद है) दूसरे निवेश के फ़ैसलों के लिए करते हैं. सवाल ये नहीं होना चाहिए कि "मुझे विदेश में कितना प्रतिशत निवेश करना चाहिए?" बल्कि ये होना चाहिए कि "मेरी बाधाओं को देखते हुए मुझे सबसे अच्छे निवेश के मौक़े कहां मिल सकते हैं?"

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कुछ निवेशक ये नतीजा निकाल सकते हैं कि विदेशी निवेश की जटिलताएं मुनाफ़े से कहीं ज़्यादा हैं. दूसरे लोग किन्हीं ख़ास बाज़ारों में बड़े निवेश के मौक़े देख सकते हैं. टेक को लेकर उत्साह रखने वाले अमेरिकी मार्केट में ज़्यादा संभावनाएं देख सकते हैं, जबकि मैन्युफ़ैक्चरिंग को लेकर उत्साहित व्यक्ति बढ़ती उत्पादन क्षमताओं वाले क्षेत्रों को पसंद कर सकते हैं.

ये समझना ज़रूरी है कि इस मामले में कोई जादुई आंकड़ा या एक ही नियम लागू नहीं होता जो सबके लिए एक जैसा या फिर सही हो. अपने देश की सीमाओं के पार इक्विटी एलोकेशन आपकी ख़ास परिस्थितियों, समझ, लक्ष्यों और जोखिम सहने की क्षमता पर किया गया एक व्यक्तिगत फ़ैसला है.

इसलिए अगर कोई आपको विश्वास के साथ कहता है कि आपको अपने पोर्टफ़ोलियो का ठीक 25 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय इक्विटी में रखना चाहिए, तो याद रखें, डेट और इक्विटी के बीच के साफ़ नज़र आने वाले अंतर के उलट, इस "नियम" का सैद्धांतिक आधार बहुत कम है. ये कुछ लोगों के लिए व्यावहारिक सलाह हो सकती है, लेकिन ये सार्वभौमिक सत्य या सबके लिए एक ही सच जैसी चीज़ नहीं है. जीवन की तरह निवेश में भी सबसे महत्वपूर्ण सीमाएं अक्सर हमारे मन में बनती हैं.

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