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यही बैलेंस है सही

क्यों निवेश की सही अप्रोच छुपी है इक्विटी (Equity) और डेट (debt) निवेशों की अति के बीच

क्यों निवेश की सही अप्रोच छुपी है इक्विटी (Equity) और डेट (debt) निवेशों की अति के बीचAnand Kumar

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6:15

कई साल से मैं भारतीय निवेश के चरित्र की एक ख़ासियत देखता रहा हूं और उस पर लिखता रहा हूं - हमारे देश में फ़िक्स्ड-इनकम निवेशों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर रहता है. देख कर अचरज होता है कि ये स्वभाव हमारे फ़ाइनेंशियल DNA में इतनी गहराई से जड़ें जमाएं हुए है.

आप भारत के किसी भी मध्यम वर्गीय घर में जाएं, और आपको एहतियात से सहेज कर रखे PPF अकाउंट, पोस्ट ऑफ़िस स्कीम और बैंक डिपॉज़िट के सर्टिफ़िकेट मिल जाएंगे. फ़िक्स़्ड इनकम के इन तरीक़ों को असली बचत के तौर पर ठीक वैसे ही स्वीकारा जाता है, जैसे पारिवारिक परंपराएं. जहां हमेशा मैंने लंबे समय के दौरान पैसा बनाने के लिए इक्विटी निवेश की अहमियत पर ज़ोर दिया है, ख़ासतौर से इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए, वहीं ये फ़िक्स्ड इनकम की मानसिकता हमारे निवेश परिदृश्य पर हावी रही है.

मगर, हाल के सालों में इसमें बड़ा बदलाव देखने को मिला है. आसानी से उपलब्ध जानकारी और इस्तेमाल में बेहद आसान ट्रेडिंग प्लेटफ़ॉर्मों से लैस युवा निवेशक, इक्विटी निवेश की ओर तेज़ी से खिंचे आ रहे हैं. जहां अति-रूढ़िवादी निवेश के तरीक़ों में बदलाव एक अच्छी ख़बर है, वहीं पेंडुलम के बहुत दूर तक झूल जाने का डर भी है. दरअसल, कई युवा निवेशक अब अपने पोर्टफ़ोलियो का शत प्रतिशत इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में रख रहे हैं. ये ऐसी रणनीति है जो काफ़ी रिस्क लिए हुए है.

मार्केट में होने वाली हाल की उठा-पटक इसी रिस्क की बात याद दिला रही है. सितंबर के अंत से, भारतीय शेयर बाज़ार में क़रीब 10 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जिससे निवेशकों में चिंता है. हालांकि गिरावट रुक गई है और उलटफेर के संकेत भी हैं, लेकिन ये उतार-चढ़ाव निवेश के एक बुनियादी सिद्धांत को दिखाता है कि सही एसेट एलोकेशन के ज़रिए डाइवर्सिफ़ाई करना कितनी अहमियत रखता है.

आपके निवेश की सफलता निर्भर करती है निवेश को लेकर आपकी सोच पर, एसेट एलोकेशन पर, और रीबैलेंसिंग को समझने और नियम से उस पर अमल करने पर. एसेट एलोकेश करते समय इक्विटी और फ़िक्स्ड इनकम के बीच निवेश को उस अनुपात में बांटना शामिल है, जो किसी की रिस्क सहने की क्षमताा और पैसों से जुड़े लक्ष्यों के साथ मेल खाता हो. जहां इक्विटी ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाली होती है मगर ऊंचे रिटर्न देती है, वहीं फ़िक्स्ड-इनकम निवेश में स्थिरता लाता है और अनुमानित रिटर्न देता है. कला, इस इन दोनों एसेट क्लास के बीच सही बैलेंस खोजने में है.

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आइए एक बार फिर से बुनियादी बातों पर लौटें. जब हम निवेश से रिटर्न पाने के बारे में सोचते हैं तो तीन बुनियादी तरीक़े सामने आते हैं: पैसे उधार देकर ब्याज कमाना, शेयरों के ज़रिए बिज़नस में भागीदारी लेना और अचल संपत्ति या सोने के दामों में होने वाले इज़ाफ़े से फ़ायदा उठाना. एक अच्छी तरह से बनाए गए पोर्टफ़ोलियो में आमतौर पर इन सभी को शामिल किया जाता है, जिसमें फ़िक्स्ड इनकम मज़बूती बढ़ाने का काम करती है.

इक्विटी और डेट के बीच एक तय प्रतिशत का संतुलन बनाए रखने की ख़ूबसूरती इसके अनुशासन को बनाए रखने में है. जब इक्विटी मार्केट में उछाल आता है, तो समय-समय पर री-बैलेंस करने से कुछ फ़ायदे फ़िक्स्ड इनकम वाले निवेशों में ट्रांसफ़र हो जाते हैं, जिससे मुनाफ़ा सुरक्षित हो जाता है. इसके उलट, मार्केट में गिरावट के दौरान, री-बैलेंस करना सस्ते में इक्विटी ख़रीदने के लिए प्रोत्साहित करता है. ये सुलझा हुआ नज़रिया भावनाओं में बह कर फ़ैसले लेने से बचाता है, क्योंकि अक्सर भावुक फ़ैसले ही निवेश की सफलता के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं.

हर पोर्टफ़ोलियो में फ़िक्स्ड-इनकम निवेश को शामिल करने का तर्क मज़बूत है. अग्रेसिव निवेशकों के लिए भी, मार्केट में उतार-चढ़ाव के दौरान कुछ फ़िक्स्ड-इनकम एलोकेशन, एक ज़रूरी शॉक एब्ज़ॉर्बर है. हाइब्रिड म्यूचुअल फ़ंड इस बैलेंस को बनाए रखने का एक आसान तरीक़ा हैं, जो इक्विटी और डेट के एलोकेशन को ऑटोमैटिक तरीक़े से मैनेज करते हैं. फ़िक्स्ड-इनकम के निवेशों में PPF अपनी अपील बनाए रखता है. इसके लंबे लॉक-इन पीरियड के बावजूद, निवेश पर टैक्स की बचत, टैक्स-फ़्री रिटर्न और सरकारी समर्थन इसे किसी भी पोर्टफ़ोलियो के फ़िक्स्ड-इनकम वाले हिस्से के लिए आकर्षक बना देता है.

हाल ही में बाज़ार की गिरावट ने निवेश के इन पुराने सिद्धांतों को और मज़बूती दी है. शॉर्ट-टर्म मार्केट के बड़े उतार-चढ़ावों से परेशान होने के बजाय, निवेशकों को इस मार्केट साइकिल में सही एसेट एलोकेशन बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए. जहां बुल रन के दौरान इक्विटी मार्केट का आकर्षण समझ में आता है, वहीं लंबे समय के दौरान पैसा बनाने में फ़िक्स्ड-इनकम निवेश की भूमिका को भी कम नहीं आंका जा सकता.

विडंबना ये है कि मैंने इस लेख की शुरुआत इस बात की शिकायत से की थी कि कैसे भारतीय अपने निवेश के साथ बहुत रूढ़िवादी हैं, और अब मैं उन्हीं फ़िक्स्ड-इनकम के विकल्पों की वकालत कर रहा हूं जिनकी मैं इतनी आलोचना कर रहा था! लेकिन नहीं, यहां कोई विरोधाभास नहीं है - इसकी चाभी बैलेंस क़ायम रखने में है. हां, मैं अब भी मानता हूं कि इक्विटी निवेश लंबे समय में संपत्ति खड़ी करने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन अब मेरी चिंता बहुत कम इक्विटी होने से हटकर, कुछ मामलों में, बहुत ज़्यादा इक्विटी के होने की हो गई है.

जैसा कि अक्सर होता है, सच्चाई दो अतियों के बीच कहीं होती है. जो फ़िक्स्ड इनकम निवेश संपत्ति बनाने में कुछ रोक लगाते दिखाई देते हैं, वही हर पोर्टफ़ोलियो में स्थिरता भी लाते हैं जो बेहद ज़रूरी है. बात ये नहीं थी कि फ़िक्स्ड इनकम से पूरी तरह बचा जाए - बात ये थी कि उस सही बैलेंस को तलाशा जाए, जहां फ़िक्स्ड इनकम और इक्विटी दोनों आपके लिए लंबे समय तक बनी रहने वाली संपत्ति खड़ी करने के लिए एक साथ काम करें.

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