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शुरुआत विदेशी स्टॉक्स के साथ

अगर आप निवेश की शुरुआत विदेशी स्टॉक्स के साथ कर रहे हैं और सोच में हैं कि ये कैसे किया जाए, तो इनके बीच फ़र्क़ पर ध्यान देने के बजाए, डोमेस्टिक और फ़ॉरन इन्वेस्टिंग की समानताओं पर ग़ौर करना कहीं बेहतर होगा।

अगर आप निवेश की शुरुआत विदेशी स्टॉक्स के साथ कर रहे हैं और सोच में हैं कि ये कैसे किया जाए, तो इनके बीच फ़र्क़ पर ध्यान देने के बजाए, डोमेस्टिक और फ़ॉरन इन्वेस्टिंग की समानताओं पर ग़ौर करना कहीं बेहतर होगा।

पिछले दो दशकों के दौरान, जब से भारतीय निवेशकों को विदेश में निवेश की अनुमति मिली है, उनके पास निवेश के कई विकल्प खुल गए हैं। आप सीधे ब्रोकर से स्टॉक ख़रीद कर इनमें निवेश कर सकते हैं, या एक्सचेंज में ट्रेड करने वाले फ़ंड ले सकते हैं, या ब्रोकर के ज़रिए इन्हें लिया जा सकता है, और म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए भी आप विदेशी स्टॉक्स में निवेश कर सकते हैं। म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए विदेशी निवेश, उन्हीं आम भारतीय म्यूचुअल फ़ंड्स से होता है जिन्हें भारतीय म्यूचुअल फ़ंड कंपनियां चलाती हैं और ये बाक़ी के फ़ंड्स की तरह ही आपके लिए उपलब्ध हैं। इनके ब्रोकर, पारंपरिक ब्रोकर हो सकते हैं (जो दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं) या फिर वेब एप या मोबाईल एप भी हो सकते हैं। ब्रोकर आपको रिसर्च भी मुहैया करा सकते हैं या हो सकता है उनकी सेवाएं सिर्फ़ लेन-देन तक ही सीमित हों।

अपने स्वरूप में, ये ठीक वैसा ही है जैसे आपके लिए भारतीय इक्विटी में निवेश के विकल्प होते हैं। इनमें निवेश के तौर-तरीक़े में कोई फ़र्क नहीं है। मगर हां, इनका क़ानूनी दायरा अलग है और टैक्स धरेलू स्टॉक्स से कहीं ज़्यादा है। आप किस तरह से इनमें निवेश करते हैं उसका फ़र्क़ भी इन दोनों बातों पर पड़ सकता है।

अब रही बात कि आप कहां निवेश करें, और यही असली कहानी भी है। इस इंटरनेट के दौर में-भारतीय हों या विदेशी-स्टॉक्स पर रिसर्च करना काफ़ी आसान मालुम पड़ता है। आप फ़ाईनांस की कोई भी वेबसाईट खोलें, अगर आप AMZ टाईप करते हैं तो आपको अमेज़न पर टनों के हिसाब से जानकारी मिल जाएगी, और अगर आप INFY टाईप करते हैं तो उतने ही टन जानकारी आपको इन्फ़ोसेस पर भी मिल जाएगी। आपको इनमें कोई फ़र्क ही नज़र नहीं आएगा।

मैं इससे असहमत नहीं हूं। हालांकि, मैं इस बात से असहमत हूं कि-बात चाहे भारतीय स्टॉक्स की हो या विदेशी स्टॉक्स की-जानकारी इकठ्ठा करने की सरलता को निवेश के सही फ़ैसले लेने की सरलता समझ लिया जाए। ठीक वैसे ही जैसे घरेलू इक्विटी निवेश में असल फ़र्क़ ही इस बात का है कि आपने अपने निवेश के फ़ैसलों के लिए कितना काम किया है।

इससे मुझे एक बातचीत याद आ गई, जो वॉरेन बफ़ेट और एक शेयर-होल्डर के बीच उनकी कंपनी की AGM के दौरान कुछ साल पहले हुई थी। स्टॉक बनाम फ़ंड में निवेश करने के सवाल पर बफ़ेट ने कहा कि कुछ पेशेवर निवेशक होते हैं, और कुछ लोग शौक़िया निवेश करते हैं। पहले क़िस्म के लोगों को बहुत सा काम और रिसर्च करना पड़ता है, जिसके लिए कई शौक़िया निवेशकों के पास न तो वक़्त होता है और न ही दिलचस्पी। उनका कहना था कि ज़्यादातर लोगों की असल मुश्किल ये होती है कि “आप पेशेवर की तरह व्यवहार करने की कोशिश करते हैं जबकि इस खेल में पेशेवर होने के लिए ज़रूरी वक़्त नहीं देते।”

मैं एक पल के लिए भी ये नहीं सुझा रहा कि कोई व्यक्ति सीधे स्टॉक के निवेश में सफल नहीं हो सकता। कई निवेशक अपने निवेश में बहुत बेहतर नतीजे हासिल करते हैं, और भारतीय स्टॉक्स के लिए वैल्यू रिसर्च की प्रीमियम स्टॉक एडवाईज़र सर्विस मौजूद है जो लोगों को स्टॉक के निवेश में मदद करती है। मगर, एक शुरुआती निवेशक के लिए इसकी संभावना कम ही होती है। और उससे भी बड़ी मुश्किल है कि ऐसे चंद लोगों ने सफलता का स्वाद कई हार के बाद चखा होगा, और अपनी हर हार में, उन्होंने नुकसान भी उठाया होगा। हममें से ज़्यादातर लोग, जिनका गोल अपनी बचत पर ज़्यादा रिटर्न पाने तक सीमित है, उनके लिए ये नुकसान उठा कर सीखने की बात एक घाटे का सौदा बन जाती है।

इक्विटी-आधारित म्यूचुअल फ़ंड इस मुश्किल को काफ़ी आसानी से सुलझा देते हैं। म्यूचुअल फ़ंड के ज़रिए इक्विटी में निवेश करने के कई फ़ायदे हैं और ये भारतीय और विदेशी सभी तरह के इक्विटी निवेश में मिलते हैं। अनुशासित तरीक़े से डाईवर्सिफ़िकेशन हो जाना एक बड़ा फ़ायदा है। फ़ंड मैनेजर, संस्थागत ढांचे के दायरे में काम करते हैं और उन्हीं नियमों के तहत उन्हें निवेश करना होता है। मिसाल के तौर पर, किसी फ़ंड में विदेशी निवेश के लिए नियम हो सकते हैं कि - कम-से-कम 15 या 20 स्टॉक्स में निवेश होने चाहिए और ये कुल पोर्टफ़ोलियो का X प्रतिशत ही होना चाहिए। ऐसे नियम तय कर देते हैं कि पोर्टफ़ोलियो डाईवर्सिफ़ाईड भी रहे और किसी झटके से सुरक्षित भी रह सके, जो एक ही स्टॉक, सेक्टर या क़िस्म के स्टॉक्स में बने रहने से लग सकता है। कोई एक शख़्स, जो ख़ुद ही स्टॉक्स में निवेश करता हो, उसे इस सब की जानकारी भी हो और उसमें अनुशासन भी हो, ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलेगा।

विदेशी इक्विटी निवेश, आपके पोर्टफ़ोलियो में एक अहम क़िस्म का डाईवर्सिफ़िकेशन लाता है। हालांकि, निवेश के फ़ैसलों को लेने के तरीक़े और उनका तर्क एक से ही होते हैं पर शुरुआत करने वालों के लिए, सबसे सही तरीक़ा वही रहेगा जो डोमेस्टिक निवेश करने के लिए सही है।

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