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जिससे सब डरते हैं दौलत उसी से बनती है

तमाम शोर-शराबे के बावजूद, ज़्यादातर बचत करने वाले इक्विटी को ग़लत समझते हैं

बचतकर्ताओं द्वारा इक्विटी को गलत क्यों समझा जाता हैAditya Roy/AI-Generated Image

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कुछ समय पहले किसी ने मुझसे पूछा कि भारत में सबसे कमतर आंका गया इन्वेस्टमेंट एसेट कौन सा है? ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब आपकी सोच पर निर्भर करता है. अलग-अलग नज़रिए से देखें तो हर कोई अलग-अलग एसेट क्लास के पक्ष में तर्क दे सकता है. लेकिन अगर हम थोड़ा पीछे हटकर भारत के पूरे बचत परिदृश्य पर एक नज़र डालें - तो जवाब एक ही होगा: इक्विटी, और इसके विस्तार के तौर पर इक्विटी-बेस्ड म्यूचुअल फ़ंड.

शुरुआत में ये बात उलटी लग सकती है, शायद तर्कहीन भी. आख़िर इक्विटी मार्केट तो निवेश की दुनिया में काफ़ी चर्चा में रहता है. बिज़नस अख़बार, टीवी चैनल और सोशल मीडिया शेयर बाज़ार की ख़बरों, विश्लेषणों और टिप्स से भरे रहते हैं. निवेशक चर्चा करते हैं, एक्सपर्ट भविष्यवाणियां करते हैं और सबको लगता है कि इक्विटी तो हर तरफ़ है.

लेकिन यही बात इस कॉलम को लगातार पढ़ने वालों को शायद नोटिस नहीं करेंगे. ये पूरी हलचल निवेश के दायरे के भीतर है. आप और मैं इस शोरगुल में जीते हैं, लेकिन भारत के ज़्यादातर लोग इस आवाज़ को सुनते ही नहीं. भारत की आम बचत की संस्कृति में बैंक एफ़डी, पीपीएफ़ और सरकार की गारंटीड स्कीमें इक्विटी से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय हैं. एक औसत भारतीय आज भी इक्विटी को शक की नज़र से देखता है - जैसे ये कोई सट्टेबाज़ी हो, न कि वैध और कारगर दौलत बनाने का तरीक़ा.

इक्विटी को कमतर आंके जाने की बात कहना सिर्फ़ इसकी लोकप्रियता के कम होने की बात नहीं है. असल में, कमतर आंके जाने का मतलब होता है - उस अंतर को समझना जो किसी एसेट की सोची गई वैल्यू और वास्तविक क्षमता के बीच होता है. इस पैमाने पर देखें तो इक्विटी का कोई मुक़ाबला ही नहीं है.

कारण भी साफ़ है - इक्विटी ही एकमात्र ऐसी एसेट क्लास है जो अर्थव्यवस्था की तरक़्क़ी और महंगाई के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल सकती है. जब आप किसी कंपनी के शेयर ख़रीदते हैं, तो आप एक ऐसे बिज़नस में हिस्सा ले रहे होते हैं जो अपने रेवेन्यू को बढ़ा सकता है, मुनाफ़ा बढ़ा सकता है, और समय के साथ अपना स्केल भी. भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है - और जो कंपनियां उपभोक्ताओं की बदलती ज़रूरतों और तकनीकी बदलावों के साथ बदल रही हैं - उनमें हिस्सेदारी लेना, ग्रोथ में हिस्सा लेना है.

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पिछले दो दशकों में भारत की नॉमिनल जीडीपी सालाना 10-12% की दर से बढ़ी है. इसी दौरान, जो इक्विटी पोर्टफ़ोलियो ठीक से मैनेज किए गए, उन्होंने इसी स्तर या उससे भी बेहतर रिटर्न दिए हैं. ये कोई संयोग नहीं है - ये उस बुनियादी कड़ी को दिखाता है जो आर्थिक विकास और कॉरपोरेट मुनाफ़े (और इस तरह शेयर की क़ीमतों) के बीच है.

अब इसकी तुलना उन स्कीमों से कीजिए जो ज़्यादातर भारतीयों की पहली पसंद हैं. बैंक एफ़डी में गारंटीड रिटर्न भले मिले, लेकिन आज की 6–7% की दर महंगाई को मुश्किल से कवर कर पाती है. टैक्स के बाद तो कई बार वास्तविक रिटर्न निगेटिव होता है. पीपीएफ़ जैसी स्कीमें टैक्स में राहत ज़रूर देती हैं, लेकिन उनका लॉक-इन और सीमित रिटर्न उन्हें प्रमुख वैल्थ-बिल्डिंग टूल बनने से रोकता है.

दिक्कत ये है कि ये गारंटीड लेकिन सीमित रिटर्न की चाह, जोखिम को लेकर ग़लतफहमी से पैदा होती है. ज़्यादातर लोग इक्विटी के रोज़ाना उतार-चढ़ाव को जोखिम समझते हैं, जबकि असली जोखिम ये है कि आपकी दौलत समय के साथ बढ़े ही नहीं और आपकी ख़रीदने की क्षमता घटती जाए. इस भ्रम को मीडिया भी और बढ़ाता है - जहां हर रोज़ की मार्केट हलचल, ट्रेडिंग रणनीतियों और क्विक प्रॉफ़िट्स पर ज़ोर रहता है. इससे ये छवि बनती है कि इक्विटी सिर्फ़ टाइमिंग और सट्टा है. असली बात - कि इक्विटी एक लॉन्ग टर्म वेल्थ-बिल्डिंग टूल है - उस शोर में खो जाती है.

जब एक्सपर्ट्स अलग-अलग इक्विटी रणनीतियों के सूक्ष्म अंतर पर बहस करते हैं, या ये तय करते हैं कि मार्केट महंगा है या सस्ता - तब करोड़ों आम भारतीय पूरी तरह इस सोच से बाहर रहते हैं कि इक्विटी उनके लिए भी है. भारत जब तेज़ी से विकास कर रहा है, तब देश की ग्रोथ स्टोरी से पूरी तरह कटे रहना - ये एक चूक है.

इसका मतलब ये नहीं कि सब लोग एफ़डी छोड़कर इक्विटी में कूद पड़ें. हर पोर्टफ़ोलियो में संतुलन ज़रूरी होता है - शॉर्ट टर्म ज़रूरतों और इमरजेंसी फ़ंड के लिए गारंटीड रिटर्न वाली जगहें बनी रहनी चाहिए. लेकिन अगर लक्ष्य है लॉन्ग टर्म वेल्थ बनाना, तो इक्विटी का ट्रैक रिकॉर्ड आज भी सबसे मज़बूत है.

असल मायनों में इक्विटी को कमतर आंकने की बात कहना रिटर्न की बात नहीं है - ये इस बात की तरफ़ इशारा है कि देश के करोड़ों लोग आज भी इस एसेट की असली ताक़त को नहीं पहचानते - और इसीलिए, इसकी पूरी क्षमता से दूर हैं.

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