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मार्केट की हेराफेरी से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं

असली निवेशक को हालिया स्कैंडलों को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए

असली निवेशक को हालिया स्कैंडलों को लेकर परेशान नहीं होना चाहिएAditya Roy/AI-Generated Image

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एक मशहूर टीवी एक्सपर्ट द्वारा स्टॉक पंप-एंड-डंप स्कीम चलाने का मामला सामने आने के बाद जैसी उम्मीद थी, लोगों में ग़ुस्सा साफ़ दिखा. सोशल मीडिया पर भी बड़ी मौजूदगी वाले इस टीवी सेलेब्रिटी पर सेबी ने क्लासिक हेराफेरी की स्कीम चलाने का आरोप लगाया है. उसने कथित रूप से पहले शेयर ख़रीदे, फिर टीवी पर उनकी सिफ़ारिश की और जब दाम बढ़ गए तो बेच दिए - और इस पूरे खेल से उन्होंने ₹11.37 करोड़ कमा लिए.

इसमें जोड़ दीजिए बीएसई पर लगाया गया ₹25 लाख का जुर्माना, जो उसने कुछ यूज़र्स को कॉर्पोरेट घोषणाओं की पहले ही जानकारी देकर नियमों का उल्लंघन किया. बाहर से देखने पर लगता है कि ये सब भारतीय बाज़ार की साख पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है.

लेकिन असल में, ये उल्टा है. ये घटनाएं दिखाती हैं कि भारत का शेयर बाज़ार कितनी सख़्ती से रेगुलेट होता है, और ये कि चाहे हेराफेरी कितनी भी चालाकी से की जाए, ज़्यादा देर तक नहीं चलती.

अब संजीव भसीन का मामला देखिए. सेबी की जांच की शुरुआत 2023 के अंत में हुई और इसने जनवरी 2020 से जून 2024 तक का साढ़े चार साल का डेटा खंगाला. ये महज़ अफ़वाहों पर आधारित कार्रवाई नहीं थी. सेबी ने पूरा मामला विस्तार से जांचा, ट्रेडिंग पैटर्न की स्टडी की, पैसों का फ़्लो ट्रैक किया और 149 पेज की एक रिपोर्ट जारी की - जिसे आप चाहें तो एक फ़ाइनेंशियल थ्रिलर की तरह भी पढ़ सकते हैं. दोषियों को मार्केट से बाहर कर दिया गया, उनकी कमाई ज़ब्त कर ली गई और संपत्तियां फ्रीज़ कर दी गईं. सिस्टम ने ठीक वही किया जो उसे करना चाहिए था.

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बीएसई वाला मामला भी यही कहानी कहता है. फ़रवरी 2021 से सितंबर 2022 तक की नियमित जांच में सेबी को पता चला कि बीएसई के सिस्टम आर्किटेक्चर के ज़रिए उसकी लिस्टिंग टीम और कुछ पेड सब्सक्राइबर कॉर्पोरेट घोषणाएं सार्वजनिक होने से पहले देख पा रहे थे. बीएसई ने इसे टेक्निकल ग़लती बताकर हल्का दिखाने की कोशिश की, लेकिन सेबी ने इसे गंभीर माना और जुर्माना लगाते हुए सुधारात्मक क़दम उठाने की मांग की. हालांकि, मैं ये ज़रूर कहना चाहूंगा कि जुर्माना और बड़ा होना चाहिए था.

इन दोनों मामलों से एक बात साफ़ होती है: जानकारियां मिलने में असमानता की मौजूदगी और हेराफेरी की कोशिशें भले ही होती हों, लेकिन अब उन्हें ज़्यादा दिनों तक छुपा पाना मुश्किल हो गया है. इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग, निगरानी के एडवांस सिस्टम और एक्टिव रेगुलेशन के चलते गड़बड़ियां अब जल्दी पकड़ में आ जाती हैं. जो पहले दशकों तक छुपा रह जाता था, अब चंद महीनों या सालों में सामने आ जाता है.

लेकिन आम निवेशकों के लिए सबसे अहम बात ये है कि ये स्कीमें पूरी तरह से शॉर्ट टर्म ट्रेडिंग और तेज़ मुनाफ़े के लालच में फंसे लोगों को निशाना बनाती हैं. जो लोग टीवी की सिफ़ारिशों और सोशल मीडिया पर फैले ‘हॉट टिप्स’ के आधार पर पोर्टफ़ोलियो बनाते हैं -असली ख़तरा उन्हीं के लिए है.

अगर आप वही कर रहे हैं जो समझदार निवेशक हमेशा करते आए हैं - यानी कंपनियों की स्टडी करना, उनके बिज़नस को समझना और मीडियम से लॉन्ग टर्म के लिए निवेश करना - तो मार्केट में होने वाली हेराफेरियों का आप पर कोई असर नहीं पड़ता. पंप-एंड-डंप जैसी स्कीमें आम तौर पर उन्हीं शेयरों में चलती हैं जो उतार-चढ़ाव और सट्टे पर आधारित होते हैं - न कि उन कंपनियों में जो मज़बूत बुनियाद पर खड़ी होती हैं.

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ज़रा सोचिए - अगर आप किसी कंपनी में इसलिए निवेश कर रहे हैं कि उसका बिज़नस अगले 5 से 10 सालों में बढ़ेगा, तो इस बात से क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कोई टीवी एक्सपर्ट कुछ दिन के लिए उसके शेयर का दाम बढ़ा देता है? इन घोटालों से असली नुक़सान मार्केट को नहीं, बल्कि निवेश पर लोगों के भरोसे का होता है. हर बार जब ऐसा कोई मामला सामने आता है, तो इससे आम लोगों को लगता है कि निवेश करना एक नूरा कुश्ती है - जिसमें जीत सिर्फ़ चालाक लोगों की होती है. ये धारणा लोगों को शेयर बाज़ार से पूरी तरह दूर कर देती है, और इसका नुक़सान किसी एक स्कीम से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है.

तो समझदार निवेशकों को इन मामलों से क्या सीख लेनी चाहिए?

पहला, टीवी, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर दिए जाने वाले टिप्स और तेज़ मुनाफे़ के वादों से बचिए.

दूसरा, मूल बातों पर टिके रहिए - अपने इन्वेस्टमेंट को डाइवर्सिफ़ाई कीजिए, अच्छी कंपनियों को सही दाम पर ख़रीदिए और उन्हें लंबे समय तक होल्ड कीजिए.

तीसरा, ये मत भूलिए कि ऐसे हेरफेर के ख़िलाफ़ सेबी की कार्रवाई से बाज़ार असुरक्षित नहीं, बल्कि और सुरक्षित होता है.

लंबी अवधि में संपत्ति खड़ी करने की सोच रखने वाले निवेशकों के लिए ये सब थोड़े वक़्त का शोर-शराबा भर है. अच्छे निवेश की बुनियादी बातें - रिसर्च, डाइवर्सिफ़िकेशन और अनुशासन - आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी हमेशा रही हैं.

शांत कंपाउंडिंग की शुरुआत यहीं से होती है

वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र से जुड़ें और ऐसा म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो बनाएं, जो टीवी पर मचे शोर के बीच बिना किसी कमीशन के बढ़ता रहे.

हाइप को छोड़ें और बिज़नस का हिस्सा बनें 

वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र से जुड़ें — गहरी और ठोस रिसर्च पर आधारित स्टॉक्स में निवेश करें और किसी 'पंप-एंड-डंप' स्कीम की हेडलाइन बनने से पहले ही निवेश से बाहर होने का पता लगाएं.

ये भी पढ़ेंः फ़िनफ़्लूएंसरों पर SEBI के एक्शन के निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


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