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सारांश: पैसिव निवेश अब चुपचाप भारत के समझदार निवेशकों के बीच समझदारी का तरीक़ा बन गया है: बाज़ार में निवेश करें, अटकलों से बचें, कम फ़ीस चुकाएं. लार्ज-कैप इंडेक्स फ़ंड, जो सिर्फ़ Nifty 50 जैसे इंडेक्स को कॉपी करते हैं, अब ज़्यादातर एक्टिव फ़ंड्स से बेहतर रिटर्न दे रहे हैं. तो सवाल उठता है: क्या स्मॉल-कैप में भी पैसिव स्ट्रैटेजी काम करेगी?
पैसिव निवेश, जो कभी एक छोटा-सा तरीक़ा था, अब भारत के समझदार निवेशकों के बीच समझदारी का प्रतीक बन गया है. आइडिया बहुत सीधा है: मार्केट को मात देने की कोशिश मत करो; बस मार्केट को अपना लो.
पैसिव निवेश में पैसा किसी इंडेक्स फ़ंड या ETF (एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड) में लगाया जाता है, जो किसी बेंचमार्क की नकल करता है. जैसे Nifty 50 जो किसी एक्टिव तौर पर मैनेज किए गए फ़ंड का एक अंश है. इसकी कॉस्ट एक्टिव फ़ंड्स से बहुत कम होती है. पिछले कुछ सालों में, लार्ज-कैप इंडेक्स फ़ंड्स ने ज़्यादातर एक्टिव लार्ज-कैप फ़ंड्स से बेहतर रिटर्न दिया है. कम फ़ीस और फ़ंड मैनेजर पर निर्भर न होना पैसिव निवेश को और आसान बनाता है.
अब तार्किक सवाल है: क्या पैसिव स्ट्रैटेजी हर जगह चलेगी - लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप तक?
यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है.
स्मॉल-कैप फ़ंड्स का 10 साल का परफ़ॉर्मेंस
ऐसे 13 एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स हैं जिनका कम से कम 10 साल का इतिहास है. हमने 22 सितंबर 2015 से 22 सितंबर 2025 तक का परफ़ॉर्मेंस देखा.
इस दौरान Nifty 250 Smallcap TRI - स्मॉल-कैप का बेंचमार्क - ने 17.38% का सालाना रिटर्न दिया. ये पहले से ही काफ़ी अच्छा है. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 13 में से 10 एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने इससे बेहतर परफ़ॉर्म किया.
लेकिन, सिर्फ़ एक 10 साल का समय काफ़ी नहीं होता. क्या ये बस एक अच्छे दौर की वजह से अच्छा लग रहा है?
रोलिंग रिटर्न क्यों ज़रूरी हैं
यही वजह है कि रोलिंग रिटर्न देखे जाते हैं, जो कन्सिस्टेंसी का बेहतर टेस्ट है.
रोलिंग रिटर्न को ऐसे समझें जैसे किसी मूवी का सिर्फ़ पहला दिन नहीं, बल्कि हर दिन का कलेक्शन देखकर उसका एवरेज निकालना. फ़ंड्स में, रोलिंग रिटर्न हर ओवरलैपिंग समय का परफ़ॉर्मेंस दिखाते हैं - जैसे 2020 से 2025 तक हर पांच साल का पीरियड. इससे पता चलता है कि किसी भी दिन से निवेश शुरू करने पर फ़ंड ने कितनी बार प्रदर्शन किया होगा.
हमने 21 सितंबर 2020 से 19 सितंबर 2025 तक सभी 13 स्मॉल-कैप फ़ंड्स के पांच साल के डेली रोलिंग रिटर्न देखे और पाया:
- इस अवधि के दौरान Nifty 250 Smallcap TRI ने 18.07% का सालाना पांच साल का रिटर्न दिया है.
- 13 में से 12 एक्टिव फ़ंड्स ने इससे बेहतर परफ़ॉर्म किया और 10 ने 20% से ज़्यादा रिटर्न दिया है.
- टॉप परफ़ॉर्मर्स रहे:
- Quant Small Cap Fund: 29.34% का सलान रिटर्न
- Nippon India Small Cap Fund: 25.45%
- Axis Small Cap Fund: 24.06%
कितनी बार एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने बेंचमार्क को हराया?
औसत रिटर्न अच्छा होना एक बात है. लेकिन अगर किसी भी दिन से निवेश शुरू किया जाए और पांच साल तक रखा जाए, तो बेंचमार्क को हराने के चांस कितने हैं?
नतीजे ये कहते हैं:
- Nippon India Small Cap, HDFC Small Cap और HSBC Small Cap Funds ने इस पांच साल की अवधि में हर बार बेंचमार्क को मात दी.
- Quant Small Cap Fund ने 97.5% समय बेहतर परफ़ॉर्म किया.
- सिर्फ़ दो फ़ंड ऐसे थे जिन्होंने आधे से कम समय में बेंचमार्क को हराया.
- अगर पूछा जाए: “कितने एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने कम से कम 60% समय बेंचमार्क को हराया?”, तो 13 में से 10 फ़ंड्स ने ये किया.
मतलब, अगर टॉप एक्टिव फ़ंड्स में निवेश किया होता और पांच साल बाद निकले होते, तो लगभग हर बार पैसिव स्मॉल-कैप इंडेक्स से बेहतर रिटर्न मिलता.
और इसमें ट्रैकिंग एरर या पैसिव निवेश की कमियां - जैसे वॉलेटाइल मार्केट में लचीलापन न होना और इंडेक्स में घटिया स्टॉक्स से बचने का विकल्प न होना - शामिल भी नहीं हैं.
ये भी पढ़ेंः इंडेक्स फ़ंड्स पर टैक्स कैसे लगता है?
क्यों एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स अब भी काम करते हैं
जब लार्ज-कैप फ़ंड्स इंडेक्स फ़ंड्स से पीछे रह रहे हैं, तब स्मॉल-कैप फ़ंड्स क्यों बेहतर हैं?
- जानकारियों के मामले में बढ़त
स्मॉल-कैप स्टॉक्स पर उतनी नज़र नहीं होती जितनी लार्ज-कैप पर. इसलिए अच्छे मैनेजर सही मौक़ा पकड़ लेते हैं. - ज़्यादा फ़र्क़
स्मॉल-कैप में अच्छे और बुरे स्टॉक्स का फ़र्क़ बहुत बड़ा होता है. अच्छा मैनेजर घटिया स्टॉक्स से बचकर अच्छे बिज़नेस चुन सकता है और इंडेक्स से बेहतर रिटर्न दे सकता है. - एक्टिव रिस्क मैनेजमेंट
स्मॉल-कैप बियर मार्केट्स में ज़्यादा गिरते हैं. एक्टिव मैनेजर कैश होल्ड कर सकते हैं, एक्सपोज़र घटा सकते हैं या मजबूत कंपनियों में स्विच कर सकते हैं - इंडेक्स ऐसा नहीं कर सकता. - लिक्विडिटी मैनेजमेंट
कुछ स्मॉल-कैप स्टॉक्स में ट्रेडिंग कम होती है. एक्टिव फ़ंड्स धीरे-धीरे ख़रीद-बिक्री करके प्राइस पर असर कम कर सकते हैं, जबकि इंडेक्स को मैकेनिकली बदलना पड़ता है.
स्मॉल-कैप में एक्टिव बने रहने का केस
लार्ज-कैप में पैसिव निवेश सही है (26 में से सिर्फ़ 9 लार्ज-कैप फ़ंड्स ने बेंचमार्क को हराया), क्योंकि वहां जानकारी सबको आसानी से मिलती है और एक्टिव मैनेजर ज़्यादा वैल्यू नहीं जोड़ पाते. लेकिन स्मॉल-कैप में खेल अलग है.
हमारे आंकड़े बताते हैं कि 13 में से 10 एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स ने पिछले पांच सालों में 60% से ज़्यादा समय बेंचमार्क को हराया. तीन फ़ंड्स - Nippon, HDFC और HSBC - ने हर बार ऐसा किया. ये सिर्फ़ किस्मत नहीं बल्कि प्रोसेस का नतीजा है.
हां, एक्टिव स्मॉल-कैप फ़ंड्स की कॉस्ट और उतार-चढ़ाव ज़्यादा होते हैं. सही चुनाव, डाइवर्सिफ़िकेशन और लॉन्ग-टर्म बने रहना ज़रूरी है. लेकिन डेटा दिखाता है कि इस स्पेस में एक्टिव फ़ंड्स अभी भी पैसिव से बेहतर विकल्प हैं.
हमारे रेकमंडेशन में कौन से स्मॉल-कैप फ़ंड्स शामिल हैं?
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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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