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कतार में लगने का मनोविज्ञान और वेल्थ

क्यों iPhone की दीवानगी हमारी ख़र्च करने की ग़लतियों को उजागर करती है

iPhone के क्रेज से क्यों बचना चाहिए और समझदारी से निवेश क्यों करेंAditya Roy/AI-Generated Image

शुक्रवार की सुबह एप्पल स्टोर्स के बाहर का नज़ारा देखने लायक़ था. सिर्फ़ एक फ़ोन के लिए लोग रात 2 बजे से लाइन में खड़े थे, उमस भरी सितंबर की गर्मी में रातभर डेरा डाले बैठे थे, लाइन में जगह को लेकर झगड़ रहे थे. भारत में iPhone 17 का लॉन्च इंसानी मनोविज्ञान और पैसे से जुड़ी बिगड़ी प्राथमिकताओं पर मानो एक सबक़ जैसा था.

कभी मेरा दफ़्तर एक एप्पल रीसेलर स्टोर के ठीक ऊपर हुआ करता था. उस स्टोर मैनेजर ने मुझे एक दिलचस्प बात बताई थी. ज़्यादातर सेल या तो सबसे सस्ते मॉडल की होती थी या सबसे महंगे की. बीच वाले वेरिएंट्स तो मुश्किल से बिकते थे. तब मुझे अहसास हुआ कि इसका फ़ंक्शन या फ़ीचर्स से कोई लेना-देना नहीं है-ये पूरी तरह से स्टेटस का संकेत था. मुझे शक है कि लग्ज़री कार शोरूम्स में भी यही पैटर्न दिखता होगा.

सबसे सस्ता iPhone लेने वाले अक्सर युवा होते हैं, जो EMI या लोन पर ख़रीदते हैं और ऐसा असली ज़रूरत से ज़्यादा सोशल प्रेशर में करते हैं. दूसरी तरफ़ सबसे महंगे वाले मॉडल के ख़रीदार बिल्कुल अलग तरह का मैसेज देना चाहते हैं. लेकिन दोनों का मक़सद एक ही है: समाज में खुद को आगे दिखाना. असल में फ़ोन तो बस एक बहाना है.

इस चाहत में कोई बुनियादी ग़लती नहीं है. स्टेटस को दिखाना खाने और रहने जितनी बुनियादी इंसानी ज़रूरत है. हम सामाजिक प्राणी हैं और लोग हमें कैसे देखते हैं, इसका असर नौकरी से लेकर रिश्तों तक हर चीज़ पर पड़ता है. समस्या चाहत में नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग और तरीक़े में है.

ज़रा सोचिए: बेस iPhone 17 की क़ीमत लगभग ₹83,000 है-यानी एक औसत शहरी भारतीय की 160 दिन की सैलरी के बराबर. अगर कोई ₹30,000 महीने कमाता है, तो टैक्स और ख़र्चे छोड़कर ये उसकी तीन महीने की पूरी कमाई है. टॉप मॉडल की क़ीमत पांच महीने की आमदनी तक चली जाती है. फिर भी लोग सिर्फ़ एक ऐसा गैजेट लेने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं और जटिल EMI स्कीम्स बनाते हैं, जो कुछ सालों में पुराना हो जाएगा.

यही एनर्जी अगर कोई iPhone के कलर और स्टोरेज पर रिसर्च करने या EMI स्कीम्स की तुलना करने के बजाय दौलत बनाने में लगाए, तो असर कहीं ज़्यादा होता. लेकिन वेल्थ बिल्डिंग का तात्कालिक सुख नहीं है-जैसे हाथ में नया चमकता iPhone लेकर बाहर निकलने का होता है.

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वही मनोवैज्ञानिक ऊर्जा जो किसी को iPhone के रंग और स्टोरेज वेरिएंट्स पर रिसर्च करने, EMI स्कीम्स की तुलना करने और रातभर कतार में खड़े रहने के लिए प्रेरित करती है, वो कहीं ज़्यादा अच्छे काम- असली दौलत बनाने- में लगाई जा सकती है. लेकिन वेल्थ बिल्डिंग तुरंत वो संतोष नहीं देती, जैसा किसी स्टोर से जेब में नया चमकता हुआ स्टेटस सिम्बल लेकर बाहर निकलने पर मिलता है.

अब ज़रा गणित देखिए. वो ₹83,000 अगर किसी डाइवर्सिफ़ाइड इक्विटी फ़ंड में निवेश हो और मान लें कि ऐतिहासिक रिटर्न मिले, तो 10 साल में ये लगभग ₹4 लाख हो सकता है. वहीं, टॉप मॉडल पर खर्च किए ₹1.5 लाख अगले दशक में ₹7 लाख बन सकते हैं. ये हवा-हवाई आंकड़े नहीं हैं, बल्कि असली पैसा है-जो बेहतर पढ़ाई, घर की एडवांस पेमेंट या भविष्य में और बड़े स्टेटस सिग्नल के काम आ सकता है.

इसका मतलब ये नहीं कि इंसान संन्यासी बन जाए या हर सुख छोड़ दे. साफ़ कहूं तो मैं अभी भी iPhone 12 इस्तेमाल कर रहा हूं-और शायद एप्पल को ऐसे कस्टमर सबसे ज़्यादा खटकते हैं, जो सालों तक एक ही मॉडल चलाते रहते हैं. बात बस ये है कि अगर आप कुछ सालों तक स्टेटस दिखाने में थोड़ी लगाम कस लें, तो आगे चलकर कहीं ज़्यादा ताक़तवर नज़र आएंगे. सोचिए-हर दो साल में नया iPhone लेने के लिए जूझने के बजाय, आपके पास इतना पैसा हो कि बैंक बैलेंस देखे बिना जो चाहें खरीद लें. ये असली स्टेटस है.

रास्ता वही है: जिस प्लानिंग और जुनून के साथ लोग गैजेट ख़रीदते हैं, उसी को व्यवस्थित निवेश में लगाना होगा. जिस अनुशासन के साथ कोई रातभर लाइन में खड़ा रहता है, उसी अनुशासन से हर महीने SIP करनी होगी. आज जो युवा EMI पर iPhone ले रहा है, वही EMI अगर इक्विटी फ़ंड्स में लगती रहे, तो 10 साल बाद वो फ़ोन अपग्रेड्स में नहीं, बल्कि कार अपग्रेड्स में होगा. विकल्प ये नहीं है कि अच्छी चीज़ें लें या न लें-बल्कि ये है कि अभी लें और हमेशा पैसों की तंगी में रहें, या थोड़ी देर इंतज़ार करके असली फ़ाइनेंशियल फ़्रीडम पाएं.

एप्पल स्टोर्स के बाहर लगी लंबी लाइनें सिर्फ़ फ़ोन्स के बारे में नहीं थीं. वो प्राथमिकताओं, टाइमिंग और असली वेल्थ की समझ के बारे में थीं. स्टोर के अंदर मौजूद लोगों ने अपना चुनाव कर लिया. सवाल ये है: आपका किसका चुनाव करेंगे?

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