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ख़र्च की बहार, बचत पर वार

कम टैक्स और सस्ता सामान सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन क्या हम ऐसी जेनरेशन तैयार कर रहे हैं जो बचत नहीं कर सकती?

कम टैक्स और सस्ता सामान सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन क्या हम ऐसी जेनरेशन तैयार कर रहे हैं जो बचत नहीं कर सकती?Aditya Roy/AI-Generated Image

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हेडलाइनों में हर तरफ़ उत्साह नज़र आ रहा है. GST ढांचे का तर्कसंगत सुधार ज़्यादातर चीज़ों को सस्ता कर देगा. इनकम टैक्स में कटौती का मतलब है कि आपकी जेब में ज़्यादा पैसा बचेंगे. सरकार का संदेश साफ़ है: ज़्यादा ख़र्च कीजिए, ग्रोथ बढ़ाइए, भारत को खपत का पावरहाउस बनाइए. ये एक ऐसी आर्थिक रणनीति है जो पूरी तरह समझ में आती है. लेकिन मेरे मन में एक सवाल बार-बार सर उठा रहा है: क्या हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो बचत करना ही नहीं जानती? आंकड़े बताते हैं कि शायद हम बिल्कुल यही कर रहे हैं और पर्सनल फ़ाइनेंशियल सेफ़्टी के लिहाज़ से इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे.

भारत की घरेलू बचत का कुशन तेज़ी से पतला हो रहा है. कुल बचत - यानी परिवार जो पैसा डिपॉज़िट, इंश्योरेंस या मार्केट में रखते हैं, उसमें से उधारी घटाकर - 2023-24 में राष्ट्रीय आय का मुश्किल से 5 प्रतिशत रह गई है. ये दशकों में सबसे निचला स्तर है, कोविड के सालों को छोड़कर. एक दशक पहले ये आंकड़ा आमतौर पर 8 प्रतिशत के क़रीब हुआ करता था. उसी दौरान क़र्ज़ बढ़ रहा है - घरेलू क़र्ज़ का बोझ अब GDP का क़रीब 38 प्रतिशत है, और लायबिलिटी या देनदारी बचत से तेज़ी से बढ़ रही हैं. सबसे साफ़ संकेत है कि सिर्फ़ एक साल में क्रेडिट कार्ड आउटस्टैंडिंग ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.92 लाख करोड़ हो गई.

ये पैटर्न युवा भारतीयों में और भी साफ़ दिखता है. वे उधार ले रहे हैं, लेकिन एसेट बनाने या बिज़नस शुरू करने के लिए नहीं, बल्कि नया फ़ोन ख़रीदने, वीकेंड ट्रिप पर जाने, बाहर खाने और लाइफ़स्टाइल को अपग्रेड करने के लिए ले रहे हैं, जिसे अर्थशास्त्री शालीनता से "इंस्टेंट ग्रैटिफ़िकेशन" या फ़ौरन सुख-संतोष पाना कहते हैं. पहले इनके लिए पिछली पीढ़ियां महीनों तक बचत करती थीं.

अब, इससे पहले कि ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी दी जाने वाली नसीहत जैसी लगे, मैं साफ़ कर दूं: मौजूदा नीतिगत दिशा ग़लत नहीं है. कम टैक्स और घटे हुए GST रेट वाक़ई खपत बढ़ाएंगे और आर्थिक विकास को आगे ले जाएंगे. एक फलता-फूलता खपत-प्रधान अर्थतंत्र नौकरियां पैदा करता है, बिज़नस रेवेन्यू बढ़ाता है और कुल मिला कर जीवन स्तर को ऊपर ले जा सकता है. अमेरिका जैसे देशों ने खपत-आधारित ग्रोथ मॉडल पर अपार समृद्धि पाई है.

समस्या नीति में नहीं है; समस्या उस मान्यता में है कि इंसान पैसों को लेकर स्वाभाविक रूप से अच्छी आदतें बनाए रखेंगे, फिर चाहे प्रोत्साहित करने का तरीक़ा कुछ भी हो. जब सब कुछ ख़रीदना आसान हो जाता है और टैक्स कम हो जाते हैं, जब क़र्ज़ तक पहुंच आसान हो जाती है और सोशल मीडिया लगातार खपत को जीवनशैली की आकांक्षा के तौर पर दिखाता है, तब बचत आख़िरी प्राथमिकता बन जाती है.

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ये आपके पर्सनल फ़ाइनांस के लिए बेहद अहम है, चाहे GDP ग्रोथ पर इसका जो भी असर क्यों न हो. कंपाउंडिंग का गणित दोनों तरीक़े से काम करता है. जैसे जल्दी बचत शुरू करने से दशकों में बेशुमार पैसा बनता है, वैसे ही हर कमाई को ख़र्च करने - या उससे भी बुरा, कमाई से ज़्यादा ख़र्च करने - की आदत एक ऐसा फ़ाइनेंशियल ब्लैक होल बना देती है जिससे निकलना हर साल ज़्यादा मुश्किल होता जाता है.

ज़रा सोचिए: कोई व्यक्ति अगर 25 साल की उम्र से हर साल ₹1.2 लाख निवेश करना शुरू करे और 10 प्रतिशत सालाना रिटर्न मान लें, तो 60 की उम्र तक उसके पास क़रीब ₹3.2 करोड़ होंगे. यही आदत अगर 10 साल बाद, यानी 35 साल की उम्र से शुरू की जाए, तो आख़िर में मुश्किल से ₹1.2 करोड़ रह जाएंगे. और उसका क्या, जिसने कभी बचत नहीं की और सिर्फ़ खपत की है? उसका रिटायरमेंट सिर्फ़ EPF बैलेंस और शायद बच्चों की मदद पर टिका रहेगा.

अच्छी ख़बर ये है कि बचत की आदत बनाना न तो त्याग का जीवन जीने जैसा है और न ही कम टैक्स और सस्ते सामान के असली फ़ायदों को नज़रअंदाज़ करने जैसा. असली ट्रिक है बचत को ऑटोमेट कर देना, ताकि टैक्स से बची रक़म ख़र्च करने का मौक़ा ही न मिले. जब इनकम टैक्स घटने से आपकी टेक-होम सैलरी बढ़े, तो तुरंत उतने फ़र्क़ का SIP सेटअप कर लीजिए. जब GST कटौती से आपकी मासिक शॉपिंग सस्ती हो जाए, तो उतनी बचत को अलग निवेश अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दीजिए.

खपत-प्रधान व्यवहार का सबसे ख़तरनाक पहलू ये है कि उस वक़्त ये कितना तर्कसंगत लगता है. आख़िरकार, टैक्स के कम होने से आप ज़्यादा कमा रहे हैं, GST सुधारों से चीज़ें सस्ती हो रही हैं, और बाक़ी किसी भी चीज़ के लिए क़र्ज़ तुरंत उपलब्ध है. हर एक ख़रीद का फ़ैसला पूरी तरह सही लगता है. पर जब आप पीछे हटकर सालों का कुल असर देखते हैं, तभी असली समस्या सामने आती है.

यही वो बात है जिसे खपत को प्राथमिकता देने वाली ग्रोथ उत्साहजनक हेडलाइन नहीं बनाती - अर्थव्यवस्थाएं ग़लत नीतियों से उबर सकती हैं, लेकिन व्यक्ति शायद ही कभी दशकों की ग़लत फ़ाइनेंशियल आदतों से उबर पाते हैं.

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