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आपकी वेल्थ को निगल जाएंगी 'कैश के बिना मुनाफ़े' वाली कंपनियां. ये 3 स्टॉक्स हैं सबूत

ये एक रेशियो उन कंपनियों को पहचानने में मदद कर सकता है इससे पहले कि वे रिटर्न कम कर दें

ये एक रेशियो उन कंपनियों को पहचानने में मदद कर सकता है इससे पहले कि वे रिटर्न कम कर देंAditya Roy/AI-Generated Image

सारांश: ज़्यादातर निवेशक मुनाफ़ा देखते हैं लेकिन हर मुनाफ़ा कैश में नहीं बदलता. समझिए कैसे कमज़ोर कैश कन्वर्ज़न मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनियों के रिटर्न भी मिटा सकता है.

हर निवेशक ऐसी कंपनी को पसंद करता है जो बढ़ते मुनाफे़ को दर्ज करती हो. ये कंपनी की ग्रोथ, मार्केट शेयर और भविष्य में अच्छे रिटर्न का संकेत देती है. लेकिन मुनाफ़ा कभी-कभी गुमराह भी कर सकता है. कागजों पर ये शानदार लग सकता है, लेकिन असल में ये कंपनी के बैंक खाते में कभी नहीं पहुंच पाता. और जब मुनाफ़ा कैश में नहीं बदलता, तो शेयरहोल्डर्स को नुक़सान उठाना पड़ता है.

यही वजह है कि कैश फ्लो, अकाउंटिंग प्रॉफ़िट से ज़्यादा अहम है. और एक आसान रेशियो - CFO-to-EBITDA - असली वेल्थ बनाने वालों को दिखावटी मुनाफ़ा कमाने वालों में अंतर पहचानने में मदद कर सकता है.

असल परीक्षा: CFO-to-EBITDA

EBITDA यानी ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमॉर्टाइज़ेशन से पहले की कमाई बताता है कि कंपनी अपने काम से नॉन-कैश ख़र्च (जैसे डेप्रिसिएशन) और मुख्य ख़र्चों (जैसे ब्याज और टैक्स) से पहले कितना पैसा कमाती है. ये अलग-अलग कंपनियों और उद्योगों की कमाई की क्षमता का अंदाज़ा देता है.

CFO (ऑपरेशन से कैश फ्लो) से पता चलता है कि कंपनी के रोज़मर्रा के कामकाज से, लेन-देन और इन्वेंट्री को एडजस्ट करने के बाद कंपनी के खजाने में असल में कितना पैसा आता है.

अगर कोई कंपनी वाक़ई मुनाफ़ा कमा रही है, तो उसके EBITDA का एक बड़ा हिस्सा CFO के रूप में दिखना चाहिए.

हमारा सामान्य नियम है: आदर्श रूप से कम से कम पांच साल की अवधि में कम से कम 60% (0.6 गुना) कुल EBITDA लगातार कैश में बदलना चाहिए. इससे कम पर संदेह करना चाहिए.

तीन सीख देने वाली कहानियां

इतिहास कुछ अहम उदाहरण देता है. कई कंपनियों ने प्रॉफ़िट दिखाया लेकिन उसे कैश से सपोर्ट नहीं किया. जिन्होंने कमज़ोर CFO-to-EBITDA के संकेतों को अनदेखा किया, उन्होंने बड़ा नुक़सान उठाया.

  • PC Jeweller: PC Jeweller लगातार प्रॉफ़िट दिखाने के बावजूद, FY20 तक इसका पांच साल का कुल मिलाकर CFO-to-EBITDA सिर्फ़ -0.06 रहा. मतलब कंपनी कैश बना नहीं रही, बल्कि खा रही थी. एक ज्वेलर के लिए, जहां वर्किंग कैपिटल पर नियंत्रण ज़रूरी है, ये चेतावनी का बड़ा संकेत था. जिन निवेशकों ने होल्ड रखा, उनका स्टॉक हर साल 5% घटा.
  • GE Power: GE Power के आंकड़ों में भी यही कमी दिखी. FY20 में पांच साल का CFO-to-EBITDA -0.19 था. इसका मतलब प्रॉफ़िट कैश फ्लो में नहीं बदल रहा था, जो प्राप्तियों या प्रोजेक्ट कामकाज में गहरी दिक़्क़तें दिखता है. स्टॉक तब से हर साल 12% टूटा.
  • Shemaroo Entertainment: फ़ाइनेंशियल ईयर 20 तक Shemaroo का पांच साल का CFO-to-EBITDA 0.37 गुना रहा, जो भरोसेमंद स्तर से बहुत नीचे था. यानी कंपनी प्रॉफ़िट तो दिखा रही थी लेकिन कैश कलेक्शन बहुत पीछे था. नतीजा - स्टॉक ने सालाना 19% की गिरावट दर्ज की.

हर केस एक हक़ीक़त दिखाता है: कैश के बिना प्रॉफ़िट टिकाऊ नहीं. जिन्होंने ये आसान रेशियो चेक किया होता, वो बड़े नुक़सान से बच सकते थे.

क्यों ये रेशियो अहम है

लगातार कमज़ोर CFO-to-EBITDA अक्सर इन समस्याओं की ओर इशारा करता है:

  • जल्दी प्रॉफ़िट दिखाना: कंपनियां बढ़त दिखाने की जल्दी में कैश आने से पहले ही प्रॉफ़िट दिखा देती हैं.
  • फंसी हुई वर्किंग कैपिटल: प्राप्तियां या इन्वेंट्री के बढ़ने से कैश रुक जाता है, जबकि कागज़ पर प्रॉफ़िट अच्छे दिखते हैं.
  • कमज़ोर कैश अनुशासन: कमज़ोर कलेक्शन या कॉन्ट्रैक्ट प्रॉफ़िट को कैश में बदलने से रोकते हैं.

हालांकि, ये रेशियो बैंकों, NBFCs या बीमा कंपनियों (BFSI) पर लागू नहीं होता क्योंकि उनका कारोबार अलग तरह से चलता है. रियल एस्टेट और इन्फ्रा में प्रोजेक्ट टाइमलाइन अस्थायी रूप से कैश फ्लो बिगाड़ सकती है, जिससे ग़लत तस्वीर बन सकती है. इसलिए संदर्भ ज़रूरी है.

सीख

सबक़ साफ़ है. सिर्फ़ प्रॉफ़िट बढ़ने पर मत रुकिए. देखिए कि क्या वो प्रॉफ़िट असली कैश से जुड़ा है. अगर किसी कंपनी का CFO-to-EBITDA लगातार 0.6 से नीचे है, तो उसे ख़तरे का संकेत मानिए. चाहे प्रॉफ़िट नंबर कितने भी अच्छे दिखें, कारोबार धोखा हो सकता है.

जब प्रॉफ़िट और कैश साथ चलते हैं, निवेशक भरोसा कर सकते हैं. लेकिन जब दोनों अलग हो जाते हैं, इतिहास बताता है कि नतीजा अक्सर शेयरहोल्डर्स के खिलाफ़ जाता है.

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ये भी पढ़ेंः मारुति: वैल्यूएशन स्कोर में गिरावट के स्टॉक के लिए क्या मायने हैं?

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