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सेबी ने एक दशक बाद अपना पहला व्यापक निवेशक सर्वे जारी किया है और इसके आंकड़ों में एक ऐसा नंबर छिपा है जो भारतीय परिवारों की वित्तीय सोच को किसी भी “बढ़ते डीमैट अकाउंट्स” या “म्यूचुअल फ़ंड इनफ़्लो” की हेडलाइन से कहीं ज़्यादा समझाता हैः 79.7 प्रतिशत भारतीय परिवार रिटर्न से ज़्यादा पूंजी की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं. भले ही, हम सब पहले से यह जानते थे, लेकिन जब यह वास्तविक आंकड़ा सामने आता है तो निराशा और बढ़ जाती है.
यह मामला वित्तीय साक्षरता या बाज़ार को लेकर जागरूकता का नहीं है. सर्वे के अनुसार, 63 प्रतिशत परिवार सिक्योरिटीज़ मार्केट से जुड़े कम से कम एक उत्पाद के बारे में जानते हैं. यानी क़रीब 21 करोड़ परिवार इन उत्पादों से परिचित हैं. फिर भी, केवल 9.5 प्रतिशत-लगभग 3.2 करोड़ परिवार-वास्तव में इनमें निवेश करते हैं. यह अंतर जानकारी का नहीं, डर का है.
सर्वे में वही सामान्य कारण सामने आए-जटिलता, जानकारी की अधिकता और भरोसे की कमी. लेकिन सबसे प्रमुख कारण, 34 प्रतिशत गैर-निवेशकों ने बताया-बाज़ार से जुड़े जोखिमों के चलते पैसे खोने का डर. यह डर अव्यवहारिक नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक है. जब आपकी वित्तीय सुरक्षा सीमित हो, तो पूंजी बचाना संरक्षण नहीं बल्कि अस्तित्व की ज़रूरत बन जाता है.
दिलचस्प यह है कि यह डर उन लोगों में भी है जो पहले से निवेश कर रहे हैं. मौजूदा निवेशकों में केवल 36 प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें सिक्योरिटीज़ मार्केट के बारे में मध्यम से ज़्यादा जानकारी है. यहां तक कि सबसे ज़्यादा निवेश करने वाले वर्गों में भी लगभग आधे निवेशकों का जानकारियों का स्तर कम है. वे बाज़ार में तो हैं, लेकिन आत्मविश्वास या सहजता के साथ नहीं. इससे एक अजीब स्थिति बनती है. सर्वे दिखाता है कि नए निवेशक “लॉन्ग-टर्म वेल्थ बिल्डिंग” जैसी ज़्यादा अच्छी वजहों के साथ “छोटे निवेश से जल्दी मुनाफ़ा” और “शॉर्ट-टर्म के लिए अच्छा” जैसी सोच को अहमियत देते हैं.
जिस प्रभावशाली तंत्र के बारे में मैंने बार-बार लिखा है, वो ग़लत सोच के साथ अपना काम जारी रखे हुए है. व्यक्तिगत संपर्क और सोशल मीडिया पर वित्तीय रूप से प्रभावशाली लोग ही जानकारी के प्राथमिक स्रोत हैं. 93 प्रतिशत निवेशक इन प्रभावशाली लोगों को मध्यम से लेकर बेहद ज़्यादा विश्वसनीय मानते हैं और 62 प्रतिशत निवेशक उनकी सिफारिशों के आधार पर निवेश संबंधी फ़ैसले लेते हैं.
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यहीं सर्वे के आंकड़े असहज हो जाते हैं-निवेश करने के बाद भी डर और अनिश्चितता बनी रहती है. उम्मीद से कम रिटर्न मिलना, यह तय न कर पाना कि निवेश बनाए रखें या निकल जाएं, और समय पर बाज़ार की जानकारी न मिलना-ये निवेश के बाद की मुख्य चुनौतियां हैं. लगभग 70 प्रतिशत निवेशक बताते हैं कि उन्हें सटीक जानकारी न होना या स्टेटमेंट्स समझ में न आना जैसी दिक्कतें होती हैं और निवेश शुरू करने के बाद भी यही स्थिति बनी रहती है.
नीतिगत प्रयासों का ज़ोर निवेशक शिक्षा कार्यक्रमों पर रहा है, लेकिन सर्वे से पता चलता है कि ये पहल लोगों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच रहीं. प्रतिक्रिया देने वाले 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने किसी निवेशक शिक्षा कार्यक्रम-वेबिनार या वर्कशॉप-में भाग लिया है. लोगों की जानकारियों के पसंदीदा स्रोत हैं-सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप्स और टेलीविज़न-न कि व्यवस्थित शिक्षा. इससे एक अजीब स्थिति बनती है. बाज़ार इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि कुछ लोग अक्सर किसी साथी या इन्फ्लुएंसर की सिफ़ारिश से डर पर काबू पा लेते हैं, लेकिन वो ऐसा बिना ज्ञान हासिल किए करते हैं और आत्मविश्वासी निवेशक नहीं बन पाते हैं.
सर्वे संभावित ग्रोथ वाले सेगमेंट्स की भी पहचान करता है. 22 प्रतिशत “जानकार लेकिन गैर-निवेशक” अगले साल निवेश शुरू करने की इच्छा रखते हैं. लेकिन जिन गोल्स के साथ निवेश करते हैं वो चिंताजनक है, जो मुख्य रूप से हैं- “ऊंचे रिटर्न की संभावना” और “छोटे निवेश से जल्दी फ़ायदा.” ये लोग इसलिए निवेश में नहीं उतर रहे हैं, क्योंकि वे उत्पादों को बेहतर समझते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें यक़ीन दिलाया गया है कि जोखिम की तुलना में रिटर्न ज़्यादा हैं-जबकि सीमित जानकारी वाले निवेशकों के लिए सच्चाई अक्सर इसके विपरीत होती है.
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यही वो जगह है जहां वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र की भूमिका अहम हो जाती है. हमारा काम है जोखिम को एक प्रक्रिया में बदलना-इमरजेंसी फ़ंड बनाइए, सही फ़ंड मिक्स चुनिए, SIP को ऑटोमेट कीजिए, सालाना रिव्यू कीजिए, ज़रूरत पड़ने पर रीबैलेंस कीजिए और टैक्स व लागत कम रखिए. यही अनुशासित तरीक़ा सर्वे की दो सबसे बड़ी कमज़ोरियों-डर और जल्दी मुनाफ़े के आकर्षण-का असली समाधान है. अगर आप पहले से इस नियम का पालन करते हैं, तो उसी राह पर बने रहें. और, अगर आपके आस-पास कोई अभी भी “80 प्रतिशत” में फंसा है, तो उसे अपनी सरल, दोहराई जाने वाली निवेश प्रक्रिया के बारे में बताइए-क्योंकि कई बार एक दोस्त का उदाहरण किसी वेबिनार से ज़्यादा असरदार होता है.
गहरी समस्या यही है-80 प्रतिशत परिवार जोखिम से इसलिए नहीं डरते कि वे निवेश नहीं समझते, बल्कि इसलिए कि वे जोखिम का सामना नहीं कर सकते. जब तक भारतीय घरों की आमदनी उस स्तर तक नहीं पहुंचती जहां पूंजी की सुरक्षा प्रमुख चिंता न रहे, तब तक सिक्योरिटीज़ मार्केट की पैठ सीमित ही रहेगी.
हम फिर उसी 79.7 प्रतिशत पर लौटते हैं. ज़्यादातर भारतीय परिवारों के लिए पूंजी की सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि उनके हालात की मजबूरी है. असली सवाल यह नहीं है कि उन्हें मार्केट के बारे में समझाया जाए, बल्कि यह कि क्या मार्केट के अवसर वास्तव में उनके लिए उपयुक्त हैं. यह शायद आशावादी अंत नहीं है, लेकिन इस सर्वे के नतीजों के अनुसार यह सबसे यथार्थवादी निष्कर्ष है.
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