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इस लार्ज कैप इंडेक्स ने निफ़्टी 50 को 5.9% के अंतर से दी मात, क्या निवेश का है मौक़ा?

आइए निफ़्टी 50 इक्वल वेट इंडेक्स और निफ़्टी 50 की तुलना करते हैं

निफ़्टी 50 को पछाड़ने वाला इंडेक्स: क्या इक्वल वेट समझदारी भरी ख़रीद है?Aditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः ये एनालेसिस बताता है कि निफ़्टी 50 इक्वल वेट इंडेक्स की हालिया बढ़त के पीछे क्या वजहें हैं, अलग-अलग मार्केट साइकल में इसका प्रदर्शन कैसा रहा और निवेशकों के लिए इसके क्या मायने हैं.

पिछले कुछ महीनों से कई बड़े ब्रोकरेज और ग्लोबल रिसर्च हाउस की कई रिपोर्ट एक ही राग अलाप रही हैं: लार्ज-कैप शेयर फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं.

स्वाभाविक है कि अब रिटेल निवेशकों का ध्यान भी इस दिशा में है. लेकिन अगर नज़र लार्ज-कैप पर है तो एक इंडेक्स ऐसा है जिसने निफ़्टी 50 को चुपचाप पीछे छोड़ दिया है, वो है-निफ़्टी 50 इक्वल वेट (EW) इंडेक्स.

और ये बढ़त मामूली नहीं है.

पिछले पांच सालों में इनका प्रदर्शन इस प्रकार रहा है:

  • निफ़्टी 50 TRI: 18.4%
  • निफ़्टी 50 इक्वल वेट TRI: 24.3%

यानि, सालाना औसतन 5.9% की अतिरिक्त बढ़त इक्वल वेट इंडेक्स के पक्ष में. लेकिन निवेश करने से पहले समझना ज़रूरी है कि ये इंडेक्स असल में है क्या और क्या इसे पोर्टफ़ोलियो में जगह मिलनी चाहिए.

निफ़्टी 50 इक्वल वेट इंडेक्स क्या है?

निफ़्टी 50 TRI देश की 50 सबसे बड़ी लिस्टेड कंपनियों का इंडेक्स है. ये मार्केट-कैप वेटेड इंडेक्स है यानी जितनी बड़ी कंपनी, इंडेक्स में उसका वज़न उतना ज़्यादा. सीधे शब्दों में कहें तो रिलायंस इंडस्ट्रीज़, HDFC बैंक और इन्फ़ोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों का प्रदर्शन इंडेक्स को ज़्यादा प्रभावित करता है, जबकि डिवीज़ लैब्स या विप्रो जैसी कंपनियों का असर सीमित रहता है.

वहीं निफ़्टी 50 इक्वल वेट इंडेक्स में सभी को बराबर माना जाता है. 50 कंपनियों में से हरेक को 2% का समान वेटेज दिया जाता है.

इस संतुलन को बनाए रखने के लिए इंडेक्स हर री-बैलेंसिंग में अपने आप कमज़ोर प्रदर्शन करने वाले शेयरों को ख़रीदता है और अच्छा प्रदर्शन करने वालों का थोड़ा हिस्सा बेच देता है. यानि इसमें पहले से ही एक अनुशासित “सस्ता ख़रीदो, महंगा बेचो” स्ट्रैटेजी शामिल है. वही अनुशासन जो ज़्यादातर निवेशक चाहते तो हैं पर निभा नहीं पाते.

इसी स्ट्रक्चर की वजह से निफ़्टी 50 EW TRI कुछ अवधियों में बेहतर दिखा, ख़ासकर तब जब छोटे या मिड-साइज़ लार्ज-कैप शेयर दिग्गज कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे.

प्रदर्शन कितना लगातार रहा है?

निरंतरता को मापने के लिए हमने रोलिंग रिटर्न का इस्तेमाल किया. यानि, किसी एक तय पांच साल की अवधि के बजाय हर संभव पांच साल की विंडो में देखा गया कि इंडेक्स ने कितनी बार अच्छा प्रदर्शन किया.

26 अक्तूबर 2020 से 24 अक्तूबर 2025 के बीच 1,231 तारीख़ों के औसत पांच साल के रिटर्न ऐसे रहे:

  • निफ़्टी 50 TRI: 15.6%
  • निफ़्टी 50 EW TRI: 16.6%

ये एक और प्वाइंट इक्वल वेट इंडेक्स के पक्ष में है. पर गहराई से देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है.

EW इंडेक्स की असली बढ़त मई 2023 के बाद शुरू हुई. सिर्फ़ दो मौक़ों को छोड़ दें तो उसके बाद से अक्तूबर 2025 तक, इसके पांच साल के रोलिंग रिटर्न लगभग हर मौके़ पर बेंचमार्क से बेहतर रहे.

लेकिन पूरे पांच साल के डेटा में EW इंडेक्स ने निफ़्टी 50 TRI को सिर्फ़ 49% मौक़ों पर ही मात दी, यानि आधा समय बराबर या पीछे रहा.

इसलिए, हालिया रिटर्न प्रभावशाली दिखते हैं, ज़्यादातर बेहतर प्रदर्शन हाल की घटना है, न कि लंबे समय का कमाल.

हाल में इक्वल वेट इंडेक्स क्यों आगे निकला?

इसका जवाब है मार्केट लीडरशिप में बदलाव.

2018 से 2022 के बीच निफ़्टी 50 के रिटर्न का बड़ा हिस्सा कुछ बड़ी कंपनियों से आया जैसे रिलायंस, HDFC बैंक, इन्फ़ोसिस और TCS. बाक़ी लार्ज-कैप शेयर पीछे रह गए थे.

लेकिन 2023 के बाद कहानी बदली. बाज़ार में बड़े पैमाने पर भागीदारी लौट आई, लार्सन एंड टुब्रो, कोल इंडिया, पावर ग्रिड जैसे मिड-साइज़ लार्ज-कैप शेयरों ने भी तेज़ी पकड़ी. 

इक्वल वेट इंडेक्स हरेक कंपनी को समान रूप से अहमियत देता है, इसलिए, इस बार की बड़ी रैली में ये ज़्यादा फ़ायदे मे रहा.

लंबे समय का प्रदर्शन

चूंकि पांच साल का प्रदर्शन दो हिस्सों की कहानी थी, इसलिए हमने समय सीमा को बढ़ाने का निर्णय लिया ताकि हमें साफ़ तरवीर मालूम हो.

10-साल के रोलिंग रिटर्न के आधार पर, हम ये देखते हैं:

  • निफ़्टी 50 TRI: 11.9%
  • निफ़्टी 50 EW TRI: 11.4%

और इस दौरान निफ़्टी 50 TRI ने अपने इक्वल वेट इंडेक्स से 54% मौक़ों पर बेहतर प्रदर्शन किया है.

इसलिए, भले ही इक्वल वेट इंडेक्स ने हाल ही में मज़बूत बढ़त हासिल की है पर लंबे समय की स्थिरता अब भी रेगुलर निफ़्टी 50 के पक्ष में है.

हमने ये भी देखा कि हरेक इंडेक्स ने बीते 10 साल के उतार-चढ़ाव को कैसे झेला है, क्योंकि ये स्थिरता का दूसरा पहलू है.

बाज़ार में बड़ी गिरावट के दौरान, निफ़्टी 50 TRI ज़्यादा मज़बूत साबित हुआ.

  • 2008 का ग्लोबल फ़ाइनेंशियल क्राइसिस: -44.8% बनाम 47.1% (EW)
  • 2020 का कोविड क्रैश: -28.6% बनाम -28.9% (EW)
  • सितंबर 2024–फ़रवरी 2025 का करेक्शन: -15.3% बनाम -17.7% (EW)

यहां तक कि आंकड़ों में भी उनके उतार-चढ़ाव का पैटर्न साफ़ दिखाई देता है.

2005 से 2025 के बीच भी यही पैटर्न दिखा. निफ़्टी 50 TRI का स्टैंडर्ड डिविएशन 2.3% रहा जबकि EW इंडेक्स का 2.7%.

यानि, EW इंडेक्स के रिटर्न ज़्यादा उतार-चढ़ाव भरे रहे, जिसमें कभी दमदार रैली तो कभी गहरी गिरावट देखने को मिली.

क्या निफ़्टी इक्वल वेट समझदारी भरा क़दम है?

ये पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह के निवेशक हैं.

अगर आप अनुशासित री-बैलेंसिंग के विचार को पसंद करते हैं और थोड़े ज़्यादा उतार-चढ़ाव से दिक्कत नहीं है, तो निफ़्टी 50 इक्वल वेट एक असरदार विकल्प हो सकता है. ये ख़ासकर तब अहम हो जाता है, जब बढ़त सिर्फ़ कुछ बड़ी कंपनियों में नहीं बल्कि पूरे बाज़ार में देखने को मिल रही हो.

लेकिन अगर आपका लक्ष्य है स्थिर और कम जोखिम वाला लॉन्ग-टर्म निवेश तो निफ़्टी 50 TRI अब भी कई ज़्यादा भरोसेमंद विकल्प है. लंबे समय में निफ़्टी 50 ने ज़्यादा स्थिरता, बेहतर प्रदर्शन और कम गिरावट दिखाई हैं, जो इसे ज़्यादातर पोर्टफ़ोलियो के लिए बेहतर कोर होल्डिंग बनाती हैं.

म्यूचुअल फ़ंड और शेयर बाजार के बारे में ऐसी ही और जानकारी के लिए पढ़ते रहिए वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन, जहां हर आंकड़ा निवेशक की समझ को और गहराई देता है.

ये भी पढ़ें: इस इंडेक्स ने स्टॉक मार्केट को 90% समय पीछे छोड़ा

ये लेख पहली बार अक्तूबर 29, 2025 को पब्लिश हुआ.

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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