Nitin Yadav/AI-Generated Image
सारांशः हर किसी की फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड के बारे में अपनी राय है. “एक्टिव ज़्यादा अच्छे”, “लेज़ी ज़्यादा सुरक्षित”, “टर्नओवर सब सच बता देता है”… लेकिन असल में अहम ये है कि डेटा क्या कहता है? और उससे भी अहम-क्या किसी फ़ंड का टर्नओवर रेशियो निवेश करने से पहले देखने लायक एक मायने रखने वाला मेट्रिक है? आइए जानते हैं.
फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड भारतीय निवेशकों के लिए एक तरह का कम्फ़र्ट फ़ूड यानि आसानी से चुने जाने वाले निवेश बन गए हैं. ज़्यादातर निवेशकों के पास एक होता है और इसकी वजह भी साफ़ है. वैल्यू रिसर्च में भी, हम निवेश पोर्टफ़ोलियो के मुख्य हिस्से के लिए एक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड की ही सलाह देते हैं.
इतिहास में भी फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स का प्रदर्शन अच्छा रहा है. एक औसत फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड ने पिछले पांच सालों में 17.7 प्रतिशत सालाना रिटर्न दिया है और पिछले 10 सालों में 14 प्रतिशत. इसीलिए ये कैटेगरी म्यूचुअल फ़ंड की दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त में से एक बन चुकी है, जो 31 अक्तूबर 2025 तक ₹5.3 लाख करोड़ से ज़्यादा की एसेट संभाल रही है.
लेकिन असली सवाल ये है: क्या कोई पैटर्न ऐसा है जिसे देखकर एक मज़बूत फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड चुना जा सके-जो दूसरों से बेहतर कर सके?
हाल में, एक यूट्यूबर ने सिर्फ़ इसलिए एक मशहूर फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड को ‘ख़राब’ कहा क्योंकि उसका टर्नओवर रेशियो ज़्यादा था. इससे मेरे मन में सवाल आया: “क्या ज़्यादा टर्नओवर का मतलब फ़ंड वाक़ई ख़राब है? क्या एक्टिव रहना फ़ायदेमंद है? या कम बदलाव करने वाले ‘लेज़ी’ फ़ंड जीतते हैं?”
इसका जवाब पाने के लिए मैंने जल्दी से डेटा में झांका. (नतीजे का इंतज़ार कीजिए क्योंकि वही सबसे अहम सीख है.)
लेकिन पहले ये समझते हैं कि टर्नओवर रेशियो होता क्या है?
टर्नओवर रेशियो बताता है कि एक साल में फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो का कितना हिस्सा बदला गया.
उदाहरण के लिए, अगर टर्नओवर 100 प्रतिशत है तो इसका मतलब है कि फ़ंड का पूरा पोर्टफ़ोलियो 12 महीनों में बदल गया-एक तरह से पूरी सफ़ाई.
सीधे शब्दों में:
- ज़्यादा टर्नओवर का मतलब ज़्यादा ख़रीद-फ़रोख़्त.
- कम टर्नओवर का मतलब कम बदलाव और ज़्यादा ‘ख़रीदो और होल्ड करो’ (buy-and-hold) वाली रणनीति.
अब जबकि हम समझ गए कि टर्नओवर रेशियो क्या है, आइए समझते हैं कि क्या ज़्यादा टर्नओवर वाले फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड का प्रदर्शन बेहतर होता है या नहीं.
इसका जवाब पाने के लिए, हमने उन सभी फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स को परखा जिनका कम से कम 10 साल का इतिहास है और जून 2017 से उनके हर महीने के टर्नओवर रेशियो देखे. असल में, इसके कुछ पहले ही एसोसिएशन ऑफ़ म्यूचुअल फ़ंड्स इन इंडिया (AMFI) ने फ़्लेक्सी-कैप यूनिवर्स के निवेश के नियमों को औपचारिक रूप से बदला था.
और जो बातें सबसे ऊपर आईं, वो ये थीं:
3 सबसे ज़्यादा टर्नओवर वाले फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड
जून 2017 और अक्तूबर 2025 के बीच टर्नओवर एवरेज
| फ़ंड | टर्नओवर (%) |
|---|---|
| PGIM | 160 |
| Taurus | 153.9 |
| LIC | 81 |
| डायरेक्ट प्लान्स पर विचार किया गया | |
तीनों फ़ंड्स का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए हमें ऐसा मेट्रिक चाहिए था जो निरंतरता दिखाए. इसीलिए हमने रोलिंग रिटर्न देखे. यानी 1 जून 2020 से 18 नवंबर 2025 तक, हर दिन इन तीनों फ़ंड्स के तीन-वर्षीय रिटर्न मापे और जो हमने जो पाया:
3 सबसे ज़्यादा टर्नओवर वाले फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड
| फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड (डायरेक्ट) | Turnover | रिटर्न (%) | बेंचमार्क (16.9%) को दी मात? |
|---|---|---|---|
| PGIM | 160% | 19.7 | हां |
| Taurus | 153.90% | 11.7 | नहीं |
| LIC | 81% | 14.4 | नहीं |
‘लेज़ी’ कम टर्नओवर वाले फ़ंड्स का क्या?
असल में, तीन हाई-चर्न यानि भारी बदलाव वाले फ़ंड्स में से सिर्फ़ एक (PGIM) ही बेंचमार्क को पछाड़ पाया. बाक़ी-इतनी हलचल के बावजूद-पीछे रह गए. यानी एक्टिव रहने से बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं मिलती.
अच्छी ख़बर ये है: अपने ‘ख़रीदो और होल्ड करो’ स्ट्रैटजी के लिए मशहूर पराग पारिख फ़्लेक्सी कैप ने शानदार 22.3 प्रतिशत रिटर्न दिया और आसानी से बेंचमार्क को पीछे छोड़ा.
‘लेज़ी’ कम-टर्नओवर वाले फंड्स का क्या?
सबसे कम टर्नओवर रेशियो वाले तीन फ्लेक्सी-कैप फंड्स और 1 जून, 2020 और 18 नवंबर, 2025 के बीच उनका एवरेज तीन साल का रिटर्न नीचे दिया गया है:
| फ़ंड | टर्नओवर | रिटर्न (%) | बेंचमार्क को दी मात? |
|---|---|---|---|
| Parag Parikh | 9.60% | 22.3 | हां |
| UTI | 11.80% | 15.3 | नहीं |
| Kotak | 17.40% | 15.8 | नहीं |
कम अच्छी ख़बर: बाक़ी दो लो-चर्न यानि कम बदलाव करने वाले फ़ंड बेंचमार्क को मात नहीं दे पाए.
इसका मतलब ये हुआ कि ‘लेज़ी’ टीम भी एक्टिव फ़ंड्स से बेहतर साबित नहीं हुई.
ये भी पढ़ेंः मिड-कैप फ़ंड में कितने साल तक निवेश बनाए रखना चाहिए?
कहानी का सबक़
और यही इस कहानी का सबसे ज़रूरी हिस्सा है.
सच कहूं तो म्यूचुअल फ़ंड्स में टर्नओवर रेशियो को ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत दी जाती है.
इसकी वजह ये है कि टर्नओवर रेशियो निकालने का कोई एक समान तरीक़ा है ही नहीं.
काग़ज़ पर इसकी परिभाषा सीधी है: साल में फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो का कितने प्रतिशत हिस्सा ख़रीदा या बेचा गया. लेकिन हकीक़त में क्या होता है? असल में, अलग-अलग फ़ंड हाउस अलग नियम अपनाते हैं.
- कुछ सिर्फ़ वो ट्रेड जोड़ते हैं जो फ़ंड मैनेजर करते हैं.
- कुछ निवेशकों की रिडेम्शन से होने वाली बिक्री भी जोड़ देते हैं.
- कुछ रिडेम्शन को पूरी तरह अलग ही रख देते हैं.
- और भी कई तरीके हैं.
इसलिए, किसी फ़ंड का टर्नओवर ज़्यादा दिख रहा हो तो ये ज़रूरी नहीं कि वो सच में बहुत ट्रेडिंग कर रहा है; हो सकता है वो सिर्फ़ अलग तरह से कैलकुलेशन कर रहा हो. जब कैलकुलेशन ही समान न हो, तो फ़ंड्स की तुलना करना बेकार हो जाता है.
यही वजह है कि वैल्यू रिसर्च के एनालिस्ट टर्नओवर रेशियो पर भरोसा नहीं करते.
हम ये आंकड़ा इसलिए प्रकाशित करते हैं क्योंकि ये मौजूद है और निवेशक इसे देखना चाहते हैं. लेकिन हमारे एनालिस्ट इसे फ़ंड चुनने के लिए कभी इस्तेमाल नहीं करते. और दिलचस्प बात ये है कि एक्टिव और लेज़ी दोनों तरह के फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड के लंबे समय के प्रदर्शन ने यही साबित किया. यानी ज़्यादा सौदे करने से अच्छे रिटर्न की गारंटी नहीं है; और कम सौदे करने से भी नहीं.
तो फिर किन फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स में निवेश करें?
यहीं वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपकी मदद करता है.
अगर आप फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स की एक साफ़, रिसर्च-आधारित, साफ़-सुथरी शॉर्टलिस्ट चाहते हैं-जो निरंतरता, रिस्क एडजस्टेड रिटर्न और लंबे समय के व्यवहार पर बनी हो, न कि टर्नओवर जैसे अविश्वसनीय मापदंडों पर-तो फ़ंड एडवाइज़र सबसे अच्छी शुरुआत है.
ये आपकी मदद करता है:
- अपने गोल्स के हिसाब से सही फ़ंड पहचानने में
- ऐसे फ़ंड्स से बचने में जो काग़ज़ पर अच्छे दिखते हैं
- ऐसा पोर्टफ़ोलियो बनाने में जो कई मार्केट साइकिल झेल सके, सिर्फ़ बुल रन नहीं
- अनुमान नहीं, भरोसे के साथ निवेश करने में
अगर फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड चुनना मुश्किल लगता है, तो फ़ंड एडवाइज़र को ये काम करने दें-ताकि आप निवेश पर ध्यान दें और फ़ंड के गणित को समझने में समय न गंवाएं.
आज ही फ़ंड एडवाइज़र को एक्सप्लोर करें.
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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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