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सारांशः इतने सारे निवेशक दो साल के अंदर ही म्यूचुअल फ़ंड छोड़ क्यों देते हैं, जबकि असल कंपाउंडिंग का असर तो इसके बाद शुरू होता है? AMFI के हाल के डेटा से एक ऐसे पैटर्न का पता चलता है, जो बताता है कि लगभग 40 प्रतिशत निवेशकों को कभी भी इक्विटी में अच्छा ख़ासा मुनाफ़ा क्यों नहीं होता. जवाब बिल्कुल सामने छिपा है.
AMFI (एसोसिएशन ऑफ़ म्यूचुअल फ़ंड्स इन इंडिया) के मुताबिक़. 10 में से क़रीब 4 भारतीय निवेशक, यानी लगभग 39 प्रतिशत, इक्विटी में 24 महीने यानि दो साल से ज़्यादा समय तक निवेश नहीं रखते हैं. ये समय किसी पौधे के जड़ पकड़ने के लिए भी काफ़ी नहीं है. ऐसे में किसी के लिए भी अच्छे इक्विटी रिटर्न की उम्मीद करना तो दूर की बात है.
गिरावट का हालिया दौर निवेशकों की शॉर्ट-टर्म सोच को साफ़ दिखाता है. निवेश में में रुकावट और कैंसलेशन बढ़े हैं. लार्ज-कैप फ़ंड्स में निवेश ₹2,319 करोड़ (सितंबर) से गिरकर ₹972 करोड़ रह गया. मिड-कैप में ₹5,085 करोड़ से ₹3,807 करोड़ और स्मॉल-कैप में ₹4,363 करोड़ से ₹3,476 करोड़ रह गया है.
ये बिना सोचे-समझे किया गया व्यवहार नहीं, बल्कि भावनात्मक व्यवहार है. लेकिन इक्विटी में भावनात्मक व्यवहार का असर टैक्स के रूप में सामने आता है और बहुत महंगा भी. स्ट्रैटेजी के नाम पर SIP रोकना या जल्दी पैसे निकाल लेना, निवेशकों को सीधे तीन बड़े-बड़े जाल (ट्रैप) में धकेल देता है.
पहला ट्रैप: मार्केट के सबसे फ़ायदेमंद महीनों को मिस करना
हमने हाल ही में एक एनालेसिस पब्लिश किया था जिसमें दिखाया गया है कि पिछले तीन सालों में सिर्फ़ तीन सबसे अच्छे महीने मिस करने से मुनाफ़ा आधे से ज़्यादा कम हो गया, ख़ासकर मिड-कैप और स्मॉल-कैप फ़ंड्स में. ये कोई थ्योरी नहीं, बल्कि मार्केट कैसे काम करता है इसका सीधा उदाहरण है.
ज़्यादातर पैसा धीरे-धीरे या एक जैसा नहीं बनता. ये अचानक आता है, अक्सर ऐसे महीनों में जब निराशा और उतार-चढ़ाव होता है. यही वजह है कि “परफ़ेक्ट एग्ज़िट” एक कल्पना है. बाहर निकलने से, भले ही सही समय पर वापस आने का इरादा हो, निवेशक उन कुछ महीनों को चूकने की संभावना को बहुत ज़्यादा बढ़ा देते हैं जिनमें बहुत ज़्यादा रिटर्न मिलता है.
दूसरा ट्रैप: ये सोचना कि कंपाउंडिंग फ़िज़ूल है
कंपाउंडिंग बहुत शक्तिशाली है, लेकिन शुरुआत में ये बेहद धीमी महसूस होती है. ₹10,000 की मंथली SIP शुरू करने वाला कोई भी निवेशक इसे किसी भी किताबी ज्ञान से कहीं ज़्यादा महसूस करता है.
5 साल में, ₹6 लाख निवेश करने के बाद, 12 प्रतिशत रिटर्न मानें तो पोर्टफ़ोलियो की क़ीमत लगभग ₹8.11 लाख हो जाती है. 7 साल बाद, ₹8.4 लाख से बढ़कर ₹13.19 लाख हो जाती है. और 10 साल में, ₹12 लाख से बढ़कर ₹23.2 लाख की वैल्यू बन जाती है. अंकड़े बेहतर लगते हैं, पर ये आपकी ज़िंदगी बदल देने जितने ख़ास नहीं हैं. ये मामूली लगते हैं. और यही मामूलीपन कई निवेशकों का भरोसा डगमगा देता है.
लेकिन ये शुरुआती दौर ही असल वेल्थ बनाने का टिकट है. निवेशक जब अपना साइकोलॉजिकल लेवल पार कर लेते हैं, वहीं से कंपाउंडिंग अपना असली रूप दिखाना शुरू करती है.
10वें और 15वें साल के बीच, वही SIP ₹23.2 लाख से बढ़कर ₹50.5 लाख हो जाती है. 20वें साल तक ये ₹24 लाख की SIP को क़रीब ₹1 करोड़ में बदल देती है. 25 साल पूरे होने पर ₹30 लाख लगभग ₹1.9 करोड़ हो जाते हैं. 30 साल पर, ₹36 लाख बढ़कर ₹3.52 करोड़ हो जाते हैं.
असल में, उछाल पहले दशक के बाद आता है, इससे पहले नहीं. यानी जो लोग शुरुआत में ही बाहर निकल जाते हैं, वो कंपाउंडिंग को शुरू ही नहीं होने देते.
तीसरा ट्रैप: इक्विटी बहुत ज़्यादा वॉलेटाइल है
जी हां बिल्कुल, इक्विटी में भारी उतार-चढ़ाव होता है, पर सिर्फ़ शॉर्ट और मीडियम-टर्म में.
शॉर्ट-टर्म मार्केट का बर्ताव, ख़ासकर मिड और स्मॉल-कैप में, कई बार उथल-पुथल जैसा होता है. मिड-कैप फ़ंड्स के हमारे एनालिसिस से पता चला कि पहले कुछ सालों में रिटर्न दोनों तरफ़ तेज़ी से ऊपर-नीचे हुए हैं.
स्मॉल-कैप तो और भी नाटकीय थे. BSE 250 स्मॉल-कैप TRI के 10 साल के रोलिंग के हमारे एनालिसिस से पता चलता है कि एक साल का अनुभव कितना उथल-पुथल वाला हो सकता है.
किसी भी 12-महीने की अवधि में, आपके पैसे डूबने की संभावना 3 में से 1 थी. लेकिन समय बढ़ने के साथ तस्वीर बदल जाती है. 3 साल में नुक़सान की संभावना 11 प्रतिशत और 5 साल में ये रिस्क लगभग गायब हो जाता है. यानि, नेगेटिव रिटर्न की आशंका सिर्फ़ 2 प्रतिशत रह जाती है. और दो-तिहाई अवधि में 10 प्रतिशत से ज़्यादा सालाना रिटर्न मिला है.
लेकिन असली कमाल 7 साल के बाद दिखता है. 2015 से अब तक, सलाना 7 साल के दौरान, स्मॉल-कैप इंडेक्स ने कभी भी नेगेटिव रिटर्न नहीं दिया. और लगभग हर चार में से एक पीरियड में 15 प्रतिशत से ज़्यादा का सालाना रिटर्न मिला.
कुल मिलाकर, पहले दो सालों में निवेश रोक देना खुद को नुक़सान पहुंचाना है. इसलिए नहीं कि फ़ंड में कोई कमी है या मार्केट टूटा हुआ है. बल्कि इसलिए कि एक एसेट क्लास के तौर पर इक्विटी को समय चाहिए, जितना समय आज के दौर में 40 प्रतिशत निवेशक उसे दे ही नहीं रहे. और इसी वजह से वो कंपाउंडिंग का जादू नहीं देख पा रहे हैं.
क्या आप अपनी दौलत को ज़्यादा बेहतर बनाना चाहते हैं?
अगर आपने कभी अपने निवेश को रोक दिया या पैसे निकाल लिए क्योंकि आपके पास जो फ़ंड हैं वो अचानक से “बहुत रिस्की” लगने लगा, तो आप अकेले नहीं हैं और आप ग़लत भी नहीं हैं. समस्या आमतौर मार्केट नहीं, बल्कि आपकी रिस्क लेने की क्षमता और आपके फ़ंड चुनने के बीच का अंतर है.
यही वजह है कि आपको वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र पर ग़ौर करना चाहिए. ये आपको समझने में मदद करता है कि आप किस तरह के निवेशक हैं और फिर आपको वही फ़ंड्स दिखाता है जो आपके रिस्क सहने की क्षमता से मेल खाते हों. यानी, जो भी ट्रेंडिंग है उसके पीछे भागने के बजाय, आपको ऐसे फ़ंड्स की लिस्ट मिलती है जो इस बात को पुख्ता करती है अपनी रिस्क लेने की क्षमता के मुताबिक़ आप आसानी से फ़ंड्स का चुनाव कर सकें
नतीजा? आप ज़्यादा समय तक निवेशित रहते हैं. घबराहट में कम फ़ैसले लेते हैं और कंपाउंडिंग को काम करने के लिए ज़रूरी समय देते हैं. आसान शब्दों में, आप ज़्यादा रिस्क लेकर नहीं, बल्कि सही मात्रा में रिस्क लेकर पैसा बनाते हैं.
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ये लेख पहली बार नवंबर 26, 2025 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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