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सारांशः NPS सैलरीड कर्मचारियों के लिए एक मज़बूत रिटायरमेंट टूल के रूप में उभर रहा है. प्री-टैक्स एम्प्लॉयर कॉन्ट्रिब्यूशन, बेहद कम लागत और नए नियमों के तहत एन्युटी की कम अनिवार्यता के साथ ये ज़्यादा पूंजी निवेश और बेहतर लॉन्ग-टर्म कंपाउंडिंग की अनुमति देता है. इससे रिटायरमेंट प्लानिंग में इसकी भूमिका पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा अहम हो गई है.
कई वर्षों तक नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) की एक ऐसी छवि बनी रही, जिसने कई निवेशकों को इससे दूरी बनाए रखने पर मजबूर किया. एग्ज़िट के समय सख़्ती, ज़्यादा एन्युटी और सीमित लचीलापन इसकी पहचान मानी जाती थी. लेकिन हाल के हफ़्तों में इस धारणा पर दोबारा विचार करना ज़रूरी हो गया है.
कुछ बदलाव पहले ही लागू हो चुके हैं और कुछ जल्द लागू होंगे. इन सुधारों ने NPS में निवेश करने, पैसा निकालने और रिटायरमेंट इनकम को स्ट्रक्चर करने के तरीक़े को काफ़ी हद तक बदल दिया है. अब सवाल ये नहीं है कि NPS बेहतर हुआ है या नहीं. ये तो साफ़ है कि इसमें सुधार हुआ है. असली सवाल ये है कि ये बदलाव NPS को इस्तेमाल करने के तरीक़े को कैसे बदलते हैं.
रिफ़ॉर्म 1: कम एन्युटी, ज़्यादा आज़ादी
सबसे बड़ा रिफ़ॉर्म एग्ज़िट स्टेज पर किया गया है.
16 दिसंबर 2025 से प्राइवेट सेक्टर के NPS सब्सक्राइबर के लिए अनिवार्य एन्युटी की सीमा 40 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई है. इस एक बदलाव से रिटायरमेंट कॉर्पस का वह हिस्सा काफ़ी बढ़ जाता है, जिस तक सीधे पहुंच संभव है.
अब कॉर्पस के साइज़ के आधार पर एग्ज़िट इस तरह काम करता है:
- ₹8 लाख तक: पूरी रक़म एकमुश्त निकाली जा सकती है, किसी भी एन्युटी की ज़रूरत नहीं.
- ₹8-12 लाख: ₹6 लाख तुरंत निकाले जा सकते हैं, बाकी रक़म कम-से-कम छह साल में चरणबद्ध निकासी (SWP जैसी व्यवस्था) से मिलेगी.
- ₹12 लाख से ज़्यादा: 80 प्रतिशत रक़म निकाली जा सकती है, जबकि 20 प्रतिशत एन्युटी में लगानी होगी.
रिफ़ॉर्म 2: SWP का NPS संस्करण
एक और अहम रिफ़ॉर्म है सिस्टमैटिक यूनिट रिडेम्शन (SUR) की शुरुआत, जिसे म्यूचुअल फ़ंड में इस्तेमाल होने वाले सिस्टमैटिक विदड्रॉल प्लान (SWP) का NPS संस्करण कहा जा सकता है.
अब रिटायरमेंट के समय सिर्फ़ एकमुश्त रक़म या एन्युटी-केंद्रित स्ट्रक्चर में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं है. निवेशक अब मार्केट से जुड़े, चरणबद्ध विदड्रॉल का विकल्प चुन सकते हैं, जिससे मिलते हैं:
- ज़्यादा अनुमानित रिटायरमेंट कैशफ़्लो
- पैसा कब और कैसे निकालना है, इस पर ज़्यादा कंट्रोल
- बड़ी रक़म को तुरंत एन्युटी में लॉक करने का एक विकल्प
इससे NPS रिटायर्ड निवेशकों के उस तरीक़े के क़रीब आ जाता है, जिससे वे म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो से इनकम मैनेज करते हैं.
अन्य रिफॉर्म्स
कुछ ऑपरेशनल बदलाव भी किए गए हैं, जो इस्तेमाल को बेहतर बनाते हैं:
- निवेश की उम्र सीमा बढ़ाकर 85 साल कर दी गई है, जिससे अक्यूम्यूलेशन (जमा करने या निवेश करने) फ़ेज़ पहले से काफ़ी लंबा हो गया है.
- आंशिक निकासी की संख्या तीन से बढ़ाकर चार कर दी गई है, जो हर चार साल में एक बार, सब्सक्राइबर के अपने कॉन्ट्रिब्यूशन के 25 प्रतिशत तक हो सकती है.
- NPS बैलेंस के एवज में लोन लेने की अनुमति अब दी गई है.
- नागरिकता बदलने की स्थिति में, अकाउंट स्थायी रूप से बंद करते हुए 100 प्रतिशत रक़म एकमुश्त निकाली जा सकती है.
- लापता व्यक्ति या संभावित मृत्यु के मामलों में, 20 प्रतिशत रक़म तुरंत और FIR या कोर्ट की औपचारिकताओं के बाद 80 प्रतिशत रक़म दी जाएगी, पूरी रक़म एकमुश्त मिलेगी.
अक्तूबर से लागू हुए पिछले रिफ़ॉर्म
अब तक NPS निवेशकों के पास दो ही विकल्प थे:
- ऑटो चॉइस, जिसमें उम्र के साथ एसेट एलोकेशन अपने-आप बदलता है.
- एक्टिव चॉइस, जिसमें निवेशक इक्विटी (E), कॉर्पोरेट डेट (C) और गवर्नमेंट सिक्योरिटीज़ (G) में अपना एलोकेशन तय करते हैं.
1 अक्तूबर 2025 से एक तीसरा विकल्प जोड़ा गया: मल्टीपल स्कीम फ़्रेमवर्क (MSF).
एक्टिव चॉइस बनाम MSF: क्या फ़र्क़ है?
इक्विटी एक्सपोज़र
- एक्टिव चॉइस (कॉमन स्कीम): इक्विटी की सीमा 75 प्रतिशत
- MSF: कुछ ‘हाई-रिस्क’ वेरिएंट में 100 प्रतिशत तक इक्विटी की अनुमति
एसेट एलोकेशन पर कंट्रोल किसका?
- एक्टिव चॉइस: सब्सक्राइबर खुद E, C और G का एलोकेशन तय करता है और रीबैलेंस कर सकता है
- MSF: एलोकेशन स्कीम के मैनडेट से तय होता है. यहां सब्सक्राइबर प्रतिशत नहीं, बल्कि स्कीम चुनता है
फ़ंड मैनेजर की फ़्लेक्सिबिलिटी
- एक्टिव चॉइस: हर एसेट क्लास के लिए एक पेंशन फ़ंड मैनेजर (PFM)
- MSF: अलग-अलग PFM के तहत कई MSF स्कीम रखी जा सकती हैं
लागत
- कॉमन स्कीम: एक्सपेंस रेशियो अधिकतम 0.09 प्रतिशत
- MSF स्कीम: एक्सपेंस रेशियो अधिकतम 0.30 प्रतिशत
स्विचिंग और लॉक-इन
- एक्टिव चॉइस: साल में एक बार PFM बदला जा सकता है
- MSF: MSF के भीतर 15 साल तक स्विचिंग की अनुमति नहीं है. हालांकि, कॉमन स्कीम में वापस जाना संभव है
एक अहम बारीक़ बात ये है कि जब तक किसी MSF स्कीम का AUM ₹5 करोड़ से ऊपर नहीं जाता, तब तक फ़ंड मैनेजर को फ़ैक्टशीट में बताए गए मॉडल एसेट एलोकेशन के अनुरूप पोर्टफ़ोलियो बनाना ज़रूरी नहीं है. इसलिए शुरुआती निवेशकों को समझना चाहिए कि:
- शुरुआती दौर में पोर्टफ़ोलियो दिखाए गए एलोकेशन जैसा न भी हो सकता है, और
- पर्याप्त साइज़ तक पहुंचने से पहले ये स्कीम ज़्यादा लचीले तरीक़े से मैनेज की जा सकती है.
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कुछ निवेशकों के लिए कॉर्पोरेट NPS क्यों बेहतर हो सकता है
कॉर्पोरेट NPS का मतलब है वही नेशनल पेंशन सिस्टम, जिसमें निवेश सीधे न करके एम्प्लॉयर के ज़रिये किया जाता है.
असल में, अब NPS का सबसे मज़बूत पक्ष कॉर्पोरेट NPS में दिखाई देता है, ख़ासकर उन सैलरीड निवेशकों के लिए जो सबसे ऊंचे टैक्स ब्रेकेट में आते हैं.
ये तर्क तीन आधारों पर टिका है:
1. प्री-टैक्स निवेश का फ़ायदा
कॉर्पोरेट NPS की सबसे बड़ी ताक़त है प्री-टैक्स निवेश. जब एम्प्लॉयर का कॉन्ट्रिब्यूशन NPS के ज़रिये किया जाता है, तो टैक्स कटने से पहले ही वो रक़म निवेश हो जाती है.
इसे एक उदाहरण से समझें. अगर ₹10,000 प्री-टैक्स रूट से NPS में जाते हैं, तो पूरे ₹10,000 निवेश होते हैं. वहीं, वही सैलरी कैश में लेकर टैक्स के बाद इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करने पर लगभग 31 प्रतिशत टैक्स और सेस कटने के बाद सिर्फ़ ₹6,900-7,000 ही निवेश के लिए बचते हैं.
यानि, एक ही सैलरी कॉस्ट पर NPS के ज़रिये लगभग 40-45 प्रतिशत ज़्यादा पूंजी निवेश की जा सकती है. लॉन्ग-टर्म में ये बड़ा अंतर पैदा कर सकता है.
2. कम कॉस्ट
NPS की एक और संरचनात्मक ख़ासियत इसकी कम कॉस्ट है. NPS में फ़ंड मैनेजमेंट चार्ज आमतौर पर 0.03-0.09 प्रतिशत के बीच रहता है, जबकि डायरेक्ट इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड में यह 0.5-1.2 प्रतिशत तक हो सकता है.
ये अंतर पहली नज़र में छोटा लग सकता है, लेकिन दशकों में कम कॉस्ट का मतलब है कि रिटर्न का ज़्यादा हिस्सा निवेश में बना रहता है और कंपाउंडिंग का फ़ायदा देता है.
3. लॉन्ग-टर्म कंपाउंडिंग
30 साल की अवधि में 11 प्रतिशत सालाना रिटर्न मानकर की गई एक तुलना इसे साफ़ दिखाती है. NPS में अनुमानित कॉर्पस लगभग ₹2.83 करोड़ बनता है, जबकि टैक्स के बाद किए गए इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड निवेश से लगभग ₹1.98 करोड़.
NPS के एग्ज़िट नियमों को ध्यान में रखने के बाद भी, जहां 60 प्रतिशत कॉर्पस टैक्स-फ़्री है, 20 प्रतिशत टैक्सेबल है (जिसमें से 80 प्रतिशत तक निकाला जा सकता है) और बाकी एन्युटी में जाता है, टैक्स के बाद मिलने वाली कुल रक़म अब भी NPS के पक्ष में रहती है. इसमें लगभग ₹2.12 करोड़ की रक़म और सालाना लगभग ₹2.83 लाख की पेंशन मिलती है. इसके मुक़ाबले, म्यूचुअल फ़ंड से 12.5 प्रतिशत लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स (₹1.25 लाख से ऊपर) लगाने के बाद लगभग ₹1.51 करोड़ ही बचते हैं.
हालांकि, ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि कॉर्पोरेट NPS पूरी तरह कमीशन-फ़्री नहीं है. कॉन्ट्रिब्यूशन पर 0.5 प्रतिशत तक कमीशन लग सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹25,000 है.
इन बदलावों का असली मतलब
इन सभी रिफ़ॉर्म्स को मिलाकर देखें, तो 2025 के बदलाव NPS को बनाते हैं:
- एग्ज़िट के समय कम सख़्त
- रिटायरमेंट इनकम प्लानिंग में ज़्यादा लचीला
- इक्विटी एक्सपोज़र के मामले में ज़्यादा प्रतिस्पर्धी
- फिर भी म्यूचुअल फ़ंड से स्ट्रक्चर के लिहाज़ से अलग
लेकिन इन रिफ़ॉर्म्स के साथ नए फ़ैसले भी आते हैं. जैसे एक्टिव चॉइस और MSF में से क्या चुना जाए, ज़्यादा इक्विटी के बदले लंबे लॉक-इन को कैसे संतुलित किया जाए और एम्प्लॉयर कॉन्ट्रिब्यूशन गणित को किस तरह बदल देता है.
NPS अब पहले से सरल नहीं हुआ है. ये ज़्यादा ताक़तवर ज़रूर हुआ है, लेकिन तभी, जब इसे साफ़ समझ के साथ इस्तेमाल किया जाए.
ऐसे ही और इनसाइट्स के लिए वैल्यू रिसर्च पढ़ते रहें.
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ये लेख पहली बार दिसंबर 22, 2025 को पब्लिश हुआ.





