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एडलवाइस मिड कैप फ़ंड कैसे चुपचाप कर रहा दमदार प्रदर्शन?

जब ज़्यादातर मिड कैप फ़ंड पीछे रह जाते हैं, तो यह अपने साथियों और बेंचमार्क से आगे कैसे रहता है

एडलवाइस मिड कैप फ़ंड चुप-चाप बढ़ता मुनाफ़ा. क्या है इसकी स्ट्रैटिजीAman Singhal/AI-Generated Image

सारांशः मिड कैप फ़ंड से उम्मीद होती है कि वे चमक़ दिखाएं. लेकिन ज़्यादातर ऐसा नहीं कर पाते. इसके बावजूद यह फ़ंड बार-बार बेहतर नतीजे देता है. एडलवाइस मिड कैप ने अलग-अलग मार्केट दौर में अपनी कैटेगरी के दूसरे फ़ंड्स और बेंचमार्क, दोनों को चुपचाप पीछे छोड़ा है. क्या यह सिर्फ़ क़िस्मत है, सही समय का फ़ायदा है या इसके पीछे कोई ठोस वजह है. जानिए, आंकड़े क्या संकेत देते हैं?

मिड कैप फ़ंड को एक्टिव फ़ंड मैनेजमेंट की असल परीक्षा माना जाता है. बाज़ार के उस हिस्से में काम करते हुए, जहां जानकारी पूरी तरह सब तक नहीं पहुंचती, माना जाता है कि अच्छे फ़ंड मैनेजर के पास बेंचमार्क को पछाड़ने के मौके़ ज़्यादा होते हैं. लेकिन हक़ीक़त में मिड कैप में लंबे समय तक बेहतर रिटर्न देना, इस वादे जितना आसान नहीं होता.

जनवरी 2018 से अब तक के पांच साल के रोलिंग दौर को देखें तो 51 प्रतिशत मिड कैप फ़ंड अपने बेंचमार्क को पीछे नहीं छोड़ पाए. कई फ़ंड अच्छे बाज़ार में थोड़े समय के लिए बेहतर करते हैं, लेकिन हालात बदलते ही बढ़त गंवा देते हैं. इस माहौल में एडलवाइस मिड कैप अलग नज़र आता है. इस अवधि में इसने रोलिंग विंडो में 91 प्रतिशत समय में अपने बेंचमार्क को हराया है और कई बार अच्छी ख़ासी बढ़त के साथ ऐसा किया है. इसके उलट, इस कैटेगरी का एवरेज फ़ंड लगातार बेंचमार्क को हराने में जूझता दिखता है.

यह फ़र्क एक साफ़ सवाल खड़ा करता है. एक जैसे बाज़ार में बाक़ी फ़ंड की तुलना में एडलवाइस मिड कैप लगातार बेहतर प्रदर्शन क्यों दिखा रहा है?

यह संयोग से मिली बढ़त नहीं है

किसी फ़ंड की क़ाबिलियत की पहली कसौटी उसका लगातार अच्छा करना है. इस पैमाने पर एडलवाइस मिड कैप आसानी से खरा उतरता है.

एडलवाइस मिड कैप की बढ़त लगातार और दमदार रही

एडलवाइस की बढ़त
कैटेगरी के औसत के मुक़ाबले (%) बेंचमार्क के मुक़ाबले (%)
आउटपरफ़ॉर्मेंस (%) 100 91.8
0–2% बढ़त 6.3 50.1
2–4% बढ़त 60.6 36.3
4–6% बढ़त 30.9 5.4
6% से ज़्यादा बढ़त 2.2 0
आंकड़े जनवरी 2018 से पांच साल के रोलिंग रिटर्न पर आधारित हैं. कैटेगरी के औसत फ़ंड से तुलना की गई है.

जहां कैटेगरी का औसत फ़ंड इस अवधि में किसी भी पांच साल के रोलिंग दौर में बेंचमार्क को नहीं हरा पाता और अक्सर 0 से 4 प्रतिशत पीछे रह जाता है, वहीं एडलवाइस ने 92 प्रतिशत समय बेंचमार्क को पीछे छोड़ा है, वह भी स्पष्ट साफ बढ़त के साथ. 60 प्रतिशत से ज़्यादा दौर में इसकी बढ़त 2 से 4 प्रतिशत के बीच रही है, जबकि 31 प्रतिशत मामलों में 4 से 6 प्रतिशत तक ज़्यादा रिटर्न मिला है. बहुत मामूली बढ़त के उदाहरण कम हैं. इसके अलावा, तीन और पांच साल की अवधि में फ़ंड का औसत अल्फ़ा क्रमशः 3.8 प्रतिशत और 3.2 प्रतिशत रहा है. इसका मतलब यह है कि रिस्क को ध्यान में रखने के बाद भी फ़ंड ज़्यादा रिटर्न देने में सफ़ल रहा है.

रिस्क के हिसाब से देखने पर भी यह पैटर्न बना रहता है. एडलवाइस मिड कैप का बीटा तीन साल में 0.94 और पांच साल में 0.96 रहा है, जो कैटेगरी के क़रीब ही है. यानी फ़ंड ने बाज़ार के उतार-चढ़ाव के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हुए बिना बेहतर प्रदर्शन किया है.

नतीजा साफ़ है. यह कभी-कभार चमक दिखाने या सही समय पर दांव लगाने का मामला नहीं है. फ़ंड की बढ़त बार-बार देखने को मिलती है, और जब कभी यह पीछे भी रहता है, तो गिरावट सीमित समय और सीमित स्तर तक ही रहती है. यही निरंतरता इसके अंदरूनी कारणों को समझने की वजह देती है.

असल में रिटर्न कहां से आते हैं

पोर्टफ़ोलियो को ग़हराई से देखने पर साफ़ होता है कि एडलवाइस मिड कैप का रिटर्न न तो संयोग है और न ही ज़रूरत से ज़्यादा जटिल. यह कुछ चुने हुए सेक्टर, मज़बूत भरोसे वाले शेयर और कमज़ोर विचारों को समय पर हटाने की सधी हुई सोच पर टिका है.

सेक्टर की हिस्सेदारी को देखें. पिछले पांच साल में फ़ंड ने कैपिटल गुड्स सेक्टर में औसतन क़रीब 10 प्रतिशत निवेश रखा, जबकि इसी अवधि में इस सेक्टर ने सालाना 29.4 प्रतिशत रिटर्न दिया. यह निवेश थोड़े समय के लिए नहीं था. फ़ंड ने डिक्सन टेक्नोलॉजीज, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, कमिंस इंडिया और मझगांव डॉक जैसी कंपनियों में लंबे समय तक हिस्सेदारी बनाए रखी. इन शेयरों ने पोर्टफ़ोलियो में रहते हुए 53 प्रतिशत से लेकर 290 प्रतिशत तक का XIRR दिया और जैसे-जैसे सेक्टर का निवेश साइकल आगे बढ़ा, ये मल्टीबैगर बन गए.

ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी ऐसा ही दिखता है. जहां पूरा सेक्टर पांच साल में सालाना 24.4 प्रतिशत की दर से बढ़ा, वहीं एडलवाइस के चुने शेयरों ने ज़्यादा काम किया. UNO मिंडा, TVS मोटर और अशोक लीलैंड जैसे शेयर अपने होल्डिंग दौर में क्रमशः 7.6 गुना, 4.6 गुना और 3.1 गुना बढ़े. यहां फर्क इस बात का नहीं है कि सेक्टर पोर्टफ़ोलियो में था या नहीं, बल्कि इस बात का है कि फ़ंड ने चुनी हुई कंपनियों को अलग-अलग मार्केट हालात में भी थामे रखा.

इससे भी ज़्यादा अहम यह है कि फ़ंड अपने भरोसे को कैसे संभालता है. डिक्सन टेक्नोलॉजीज़, ट्रेंट, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर इंडस्ट्रीज और इंडियन बैंक जैसे शेयर, जिनका औसत वेट 1 प्रतिशत से ज़्यादा रहा, पांच साल या उससे ज़्यादा समय तक पोर्टफ़ोलियो में बने रहे. इन शेयरों ने तीन साल या उससे ज़्यादा समय में 55 प्रतिशत से 112 प्रतिशत तक का XIRR दिया. यही लंबे समय तक रखी गई हिस्सेदारी फ़ंड के रिटर्न की रीढ़ बनती है और कंपाउंडिंग को बिना रुकावट काम करने देती है.

जहां एडलवाइस अपने जैसे दूसरे फ़ंड्स से साफ़ अलग दिखता है, वह यह है कि वह किन शेयरों को ज़्यादा समय तक नहीं रखता. कैटेगरी के अन्य तीन शीर्ष पांच साल के अल्फा देने वाले फ़ंड से तुलना करें तो पिछले छह साल में एडलवाइस की औसत होल्डिंग अवधि 22.8 महीने रही है, जबकि उसके जैसे दूसरे फ़ंड्स के मामले में यह आंकड़ा 25.8 महीने है. इसके सिर्फ़ 22.5 प्रतिशत शेयर तीन साल से ज़्यादा समय तक रखे गए, जबकि अन्य फ़ंड में यह आंकड़ा 27.8 प्रतिशत है. मतलब साफ है. जिन शेयरों पर मज़बूत भरोसा होता है, उन्हें समय दिया जाता है और जिन पर भरोसा कम होता है, उनसे जल्दी बाहर निकल लिया जाता है.

निष्कर्ष

एडलवाइस मिड कैप की लगातार बढ़त न तो बहुत एग्रेसिव सेक्टर दांव का नतीजा है और न ही ज़्यादा रिस्क लेने का. यह एक दोहराए जा सकने वाले तरीके़ का नतीजा है. कुछ चुनी हुई कंपनियों को पहचाना जाता है और पूरे मार्केट साइकल में धैर्य के साथ रखा जाता है. निवेश का आकार इतना होता है कि सफ़लता का असर कुल नतीजों पर साफ़ दिखे. साथ ही, कमज़ोर आइडियाज़ को समय रहते हटा दिया जाता है, ताकि वो लंबे समय तक नुक़सान न पहुंचा सकें.

फिर भी, फ़ंड के पुराने अल्फ़ा का एक बड़ा हिस्सा ऐसे सेक्टर से आया है, जिनमें उतार-चढ़ाव ज़्यादा रहता है. तेज़ी के दौर में यह फ़ायदेमंद रहा है, लेकिन इससे मार्केट और सेक्टर के मोड़ पर संवेदनशीलता भी आती है. आगे फ़ंड की बढ़त इस बात पर ज़्यादा निर्भर करेगी कि गिरावट के दौर में वह इन हिस्सेदारियों को कितनी समझदारी से संभाल पाता है, सेक्टर में बदलाव कर पाता है और भरोसे को कमज़ोर किए बिना उतार-चढ़ाव को कम कर पाता है या नहीं.

आख़िरकार, यह बढ़त बनी रहेगी या नहीं, यह इस बात पर टिका होगा कि मार्केट साइकल बदलने, फ़ंड का आकार बढ़ने और हालात बदलने पर भी फ़ंड अपनी वही सधी हुई सोच कायम रख पाता है या नहीं.

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