Aditya Roy/AI-Generated Image
कभी-कभार कोई ऐसी किताब सामने आती है, जो बिल्कुल वही बात साफ़ शब्दों में कह देती है, जो आप सालों से सोचते आ रहे होते हैं. जॉन कैंपबेल और तरुण रामदोराई की किताब “Why Personal Finance is Broken and How to Fix It” ऐसी ही एक किताब है. पश्चिमी और भारतीय-दोनों फ़ाइनेंशियल सिस्टम की गहरी समझ रखने वाले इन प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की किताब पढ़ते हुए ऐसा लगा, मानो उन सिद्धांतों की कठोर अकादमिक पुष्टि मिल रही हो, जिनके आधार पर मैंने तीन दशक पहले वैल्यू रिसर्च की स्थापना की थी और तब से लगातार उनका समर्थन करता आया हूं. लेखकों ने भारत समेत कई देशों से सबूत इकट्ठा करने का कठिन काम किया है, ताकि यह दिखाया जा सके कि जिसे सतर्क निवेशक पहले से ही समझते हैं-पर्सनल फ़ाइनेंस का सिस्टम कोई संयोग नहीं है; इसे इसी तरह काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
किताब के शीर्षक में समझदारी से एक डबल मीनिंग छिपा है. पर्सनल फ़ाइनेंस “टूटा हुआ” भी है और “फिक्स” भी-यानी न सिर्फ़ ख़राब, बल्कि सिस्टमैटिक तरीके़ से सेट किया हुआ. लेखक ठोस प्रमाणों के साथ तर्क देते हैं कि फ़ाइनेंशियल सर्विस इंडस्ट्री आपकी ग़लतियों के बावजूद मुनाफ़ा नहीं कमाती-वह आपकी ग़लतियों की वजह से मुनाफ़ा कमाती है. यह कोई साज़िश का सिद्धांत नहीं है, बल्कि इस बात का तार्किक नतीजा है कि बाज़ार मांग पर कैसे प्रतिक्रिया देता है.
यहां एक कड़वी सच्चाई है. पूंजीवाद-जो मानव इतिहास में समृद्धि का सबसे ताक़तवर इंजन रहा है-लोगों की ज़रूरतों पर नहीं, बल्कि उनकी चाहतों पर प्रतिक्रिया देता है. जब उपभोक्ता गुणवत्ता और क़ीमत को ठीक से समझते हैं, तो प्रतिस्पर्धा वाजिब लागत पर बेहतरीन उत्पाद देती है. लेकिन जब उपभोक्ता फ़ायदों को लेकर भ्रमित हों और लागतों से अनजान, तो वही प्रतिस्पर्धी ताक़तें उन्हें वही चीज़ें देती हैं, जो भ्रमित उपभोक्ता समझते हैं कि वे -बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए फ़ायदे और छिपे हुए शुल्क वाले उत्पाद-चाहते हैं. लेखक इसे “phishing for phools” (मूर्खों के लिए जाल बिछाना) कहते हैं. यह मुहावरा नोबेल विजेता जॉर्ज एकरलोफ़ और रॉबर्ट शिलर से लिया गया है. ज़्यादातर मामलों में फ़ाइनेंशियल कंपनियां बुरी नहीं होतीं; वे बस वही करती हैं, जो मुनाफ़ा कमाने वाले कारोबार करते हैं.
यह भी पढ़ेंः बेदम कानूनों का क्या फ़ायदा?
देखिए, व्यवहार में यह कैसे सामने आता है. हमें फ़ीचर्स, जार्गन और जटिलता से ज़्यादा कुछ प्रभावित नहीं करता. हमारी तकनीकी दुनिया ने हमें यह मानने की आदत डाल दी है कि जो चीज़ जटिल है, वही परिष्कृत और इसलिए बेहतर होगी. फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री ने इस सबक़ को बख़ूबी समझ लिया है. एक साधारण टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी, जो वही करती है जो बीमा को करना चाहिए-आपकी मृत्यु की स्थिति में परिवार की सुरक्षा-बेचने वाले को सीमित कमीशन देती है. वहीं, निवेश सुविधाओं से जुड़ी जटिल यूनिट-लिंक्ड योजना, जिसे ज़्यादातर ख़रीदार ठीक से समझते भी नहीं, बेचने वाले को कहीं ज़्यादा कमाई कराती है. बताइए, इंडस्ट्री किस उत्पाद को बेचने में ज़्यादा उत्साह दिखाएगी?
लेखक चिकित्सा क्षेत्र से एक समानांतर उदाहरण भी देते हैं. सौ साल पहले दवाओं का बाज़ार प्रतिस्पर्धी और बिना नियमन के था. विज्ञापनों में तंबाकू के स्वास्थ्य लाभ गिनाए जाते थे और असली डॉक्टरों के साथ-साथ इलाज करने वाले झोलाछाप भी बाज़ार में थे. समाज ने अंततः यह समझा कि खुले बाज़ार, अगर अपने हाल पर छोड़ दिए जाएं, तो इलाज जितनी ही आसानी से झूठे इलाज की मांग भी पूरी करेंगे. नतीजा यह हुआ कि आधुनिक चिकित्सा नियमन अस्तित्व में आया-जहां जटिल उपचारों के लिए प्रशिक्षित पेशेवरों की पर्ची ज़रूरी हो गई, जबकि केवल बुनियादी दवाएं ही खुले तौर पर उपलब्ध रहीं. बेशक, मैं व्यक्तिगत रूप से इस उदाहरण से पूरी तरह सहमत नहीं हूं-आधुनिक चिकित्सा में भी गंभीर नैतिक समस्याएं हैं, कई तो फ़ाइनेंशियल समस्याओं से भी बड़ी-लेकिन आज हमारा विषय वह नहीं है.
लेखकों के अनुसार, पर्सनल फ़ाइनेंस आज भी उसी पूर्व-नियामक दौर में अटका हुआ है. ऐसे जटिल उत्पाद, जो घरेलू फ़ाइनेंसेज को नुक़सान पहुंचा सकते हैं, किसी को भी बेचे जा रहे हैं-बस उसे ख़रीदने के लिए मना लिया जाए. वहीं, साधारण उत्पाद, जो ज़्यादातर लोगों के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं, बाज़ार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए जूझते रहते हैं, क्योंकि उनमें मुनाफ़ा कम है.
तो जब तक ऐसे प्रणालीगत सुधार की प्रतीक्षा की जाए, जो शायद कभी आए ही नहीं, तब तक व्यक्तिगत निवेशक क्या करें? जवाब वही है, जिसे मैं हमेशा दोहराता आया हूं-जटिलता आपकी मित्र नहीं है. हर अतिरिक्त फ़ीचर, हर बंडल किया गया फ़ायदा और हर प्रभावशाली-सी दिखने वाली रणनीति लागत छिपाने और आपके हितों को सेलर के हितों से अलग करने का एक और अवसर है. फ़ाइनेंशियल इंडस्ट्री ने दशकों में अनुपयुक्त चीज़ों को आकर्षक दिखाने की कला में महारत हासिल कर ली है. आपका बचाव है-पूर्ण सादगी. सुरक्षा के लिए एक टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी, निवेश के लिए कुछ चुने हुए म्यूचुअल फ़ंड और बाक़ी सबको नज़रअंदाज़ करने का अनुशासन. इस कॉलम के पुराने पाठक पहचान लेंगे कि मैं वर्षों से यही कहता आ रहा हूं. यह देखकर संतोष होता है कि दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद ग़हरे शोध के ज़रिये उसी नतीजे पर पहुंचे हैं.
यह किताब वही पुष्टि करती है, जो इस उद्योग को तीन दशक तक नज़दीक से देखने ने मुझे सिखाया है. व्यवस्था सचमुच “फिक्स” है-शब्द के दोनों अर्थों में. लेकिन इसे समझ लेना ही उसका शिकार न बनने की पहली सीढ़ी है.
यह भी पढ़ेंः ULIP का भ्रम फिर लौटा




