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वह थाली जो कभी नहीं बदलती

लगभग एक सदी पहले भी, एक्सपर्ट्स बाज़ार के बारे में वही पुरानी बातें बता रहे थे. अभी भी कुछ नहीं बदला है

आपकी रणनीति मार्केट एक्सपर्ट्स पर क्यों निर्भर नहीं होनी चाहिएAditya Roy/AI-Generated Image

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लगभग एक साल पहले मैंने एक कॉलम लिखा था, जिसमें बाज़ार के एक्सपर्ट्स की तुलना उन रेस्टोरेंट्स से की थी, जो थाली में दर्जनों डिश परोसने का दावा करते हैं. मैंने लिखा था कि बाज़ार की हर गिरावट के साथ वजहों -भू-राजनीतिक तनाव, FII की बिक़वाली, निराशाजनक नतीजे, ऊंचे वैल्यूएशन- की वही जानी-पहचानी थाली सामने आ जाती है. हर वजह ऐसे पेश की जाती है, मानो किसी ने ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्य सुलझा लिए हों. मैंने सुझाव दिया था कि एक्सपर्ट की ऐसी राय को निवेश की सलाह की बजाय एंटरटेनमेंट की तरह देखना बेहतर है.

हाल ही में मुझे कुछ ऐसा मिला, जिससे लगा कि मैं एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ शायद कुछ ज़्यादा ही सख़्त हो गया था.

एंड्रयू रॉस सोर्किन की नई किताब, जिसका सीधा-सा नाम 1929 है, उस शेयर बाज़ार के क्रैश की गहराई से रिसर्च की गई कहानी है, जिसने ग्रेट डिप्रेशन की शुरुआत की थी. इसमें मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी क्रैश के नाटक से नहीं हुई, हालांकि उसकी कमी नहीं है, बल्कि इस बात से हुई कि उससे पहले की बहसें आज कितनी जानी-पहचानी लगती हैं. बाज़ार की समझ की थाली, जैसा कि पता चलता है, लगभग एक सदी से मेन्यू में बनी हुई है.

1929 की शुरुआत में, जब अमेरिकी शेयर अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंच रहे थे, तब सार्वजनिक मंच पर एक गरमागरम लड़ाई छिड़ गई. एक तरफ़ वे लोग थे, जिन्हें लगता था कि बाज़ार खतरनाक रूप से गरम हो चुका है, और दूसरी तरफ़ वे, जिन्हें भरोसा था कि अच्छे दिन हमेशा चलते रहेंगे. फेडरल रिज़र्व के आर्किटेक्ट्स में से एक, सीनेटर कार्टर ग्लास ने “स्टॉक स्पेकुलेशन” (शेयरों में अटकलबाजी) के ख़िलाफ़ ज़ोरदार आवाज़ उठाई और नेशनल सिटी बैंक के चेयरमैन चार्ल्स मिशेल पर कार्रवाई की मांग की, जिन पर इसे बढ़ावा देने का आरोप था. वहीं एक सम्मानित बैंकर थे और फेड की स्थापना में मदद कर चुके थे पॉल वारबर्ग ने “बेलगाम सट्टेबाज़ी के उन्माद” की चेतावनी दी और तबाही की आशंका जताई.

तेजड़ियों ने अपनी थाली सामने रखी. प्रिंसटन के एक अर्थशास्त्री ने ग्लास और उनके साथियों पर “कट्टर भावनाओं और सीमित समझ” का आरोप लगाया और वॉल स्ट्रीट को एक “मासूम कम्युनिटी” बताया. वर्जीनिया के एक बैंकर ने तो ग्लास से इस्तीफ़ा देने तक को कहा. द न्यू यॉर्क टाइम्स के फ़ाइनेंशियल एडिटर अलेक्ज़ेंडर नॉयस ने वारबर्ग पर “अमेरिकी समृद्धि को कमज़ोर करने” का आरोप लगाया. हर किसी के पास अपनी बात के समर्थन में गंभीर लगने वाली वजहें- क्रेडिट की स्थिति, इंडस्ट्रियल ग्रोथ, फेड की मॉनेटरी पॉलिसी और रेडियो व ऑटोमोबाइल जैसी नई टेक्नोलॉजी की बदलती ताक़त-  थीं.

मतलब साफ़ है. स्क्रिप्ट वही थी, जो आज भी सुनाई देती है. “रेडियो” की जगह “AI” रख दीजिए, “फेड की चिंता” की जगह “रेट कट की उम्मीदें” लिख दीजिए और ये बहसें बिना एक शब्द बदले कल के बिज़नेस अख़बार में छप सकती हैं. जैसा कि सोर्किन की किताब साफ़ करती है, दोनों पक्ष तर्कसंगत थे, अपनी बात अच्छे से रख रहे थे और अपनी-अपनी सही होने की धारणा से पूरी तरह आश्वस्त थे. आख़िरकार मंदी की भविष्यवाणी करने वाले सही निकले, लेकिन उनकी टाइमिंग महीनों चूक गई और उनमें से कई लोग बाज़ार गिरने से पहले शॉर्ट करने की कोशिश में अपनी रक़म गंवा बैठे.

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मैंने इसमें सबसे बड़ा सबक़ यह लिया कि इन एक्सपर्ट की बहसों का आम निवेशकों के लिए, जो जीवन भर की दौलत बनाना चाहते थे, कोई ख़ास मतलब नहीं था. जो व्यक्ति 1929 में एक अनुशासित बचत प्रोग्राम शुरू करता, क्रैश, डिप्रेशन, दूसरे विश्व युद्ध और उसके बाद आए हर संकट से गुज़रते हुए नियमित निवेश करता रहता, वह 1960 या 1970 तक असाधारण रूप से अच्छा कर चुका होता. वहीं जो व्यक्ति एक्सपर्ट की राय के आधार पर बाज़ार को टाइम करने की कोशिश करता, चाहे तेज़ी की हो या मंदी की, वह ख़ुद को ही परेशान करता रहता.

ऐसा भी नहीं है कि इन बहसों का कोई बौद्धिक महत्व नहीं था. मॉनेटरी पॉलिसी, क्रेडिट से जुड़े हालात और वैल्यूएशन को समझना नीति बनाने वालों और फ़ाइनेंशियल प्रोफ़ेशनल्स के लिए वाक़ई ज़रूरी है. लेकिन रिटेल निवेशक के लिए, जो ये तय कर रहा होता है कि SIP जारी रखनी है या म्यूचुअल फ़ंड बेचकर घबराहट में बाहर निकलना है, ये बहसें बिल्कुल बेकार हैं. ये ध्यान भटकाती हैं. ये भ्रम पैदा करती हैं कि सफल निवेश के लिए एक्सपर्ट की राय के साथ बने रहना ज़रूरी है, जबकि असल में ज़रूरत ठीक उलट होती है, जो उसे नज़रअंदाज़ करने के अनुशासन की होती है.

सोर्किन की किताब के किरदारों और आज के समय के बीच लगभग सौ साल का फ़ासला है. आज टिकर टेप की जगह एल्गोरिदम हैं, ट्रेडिंग फ़्लोर की जगह ऐप्स हैं और अख़बार के कॉलमिस्ट्स की जगह इन्फ़्लुएंसर्स हैं. लेकिन बुनियादी ढांचा वही है. एक्सपर्ट्स के पास हमेशा वजहें होंगी, वजहें हमेशा भरोसेमंद लगेंगी और वे लगभग कभी भी लंबे समय के निवेश के फ़ैसलों में मदद नहीं करेंगी.

अगली बार जब बाज़ार की चाल को लेकर कोई आत्मविश्वास से भरी वजह सुनें, चाहे वह 1929 की हो या 2025 की, तो याद रखिए कि सामने बहुत पुराना मेन्यू है. डिश के नाम बदल गए हैं, लेकिन थाली वही की वही है.

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