फ़ंड एडवाइज़र

आपके पोर्टफ़ोलियो में 4.5% की समस्या

अगर आपका हर रुपया सिर्फ़ भारतीय शेयरों में लगा है, तो आप दुनिया के 5 प्रतिशत से भी कम कारोबार पर दांव लगा रहे हैं. ज़्यादातर भारतीय निवेशकों के लिए यह कोई सोचा-समझा फ़ैसला नहीं है. यह बस एक चूक है.

दुनिया की बड़ी कंपनियां आपके पोर्टफ़ोलियो में नहीं हैं, क्यों?Aditya Roy/AI-Generated Image

19 मार्च को सेंसेक्स 3.26 प्रतिशत गिरा. 10 लाख करोड़ रुपये एक दिन में साफ़. सेंसेक्स के हर शेयर का रंग लाल. अमेरिका-ईरान जंग में भारत कहीं नहीं था. फिर भी चोट लगी, क्योंकि जब भी दुनिया में ख़तरा बढ़ता है, विदेशी पैसा हर उभरते बाज़ार से एक साथ निकलता है.

इधर उसी जंग से डिफेंस कंपनियां, साइबर सिक्योरिटी फ़र्म, एनर्जी प्रोड्यूसर और शिपिंग कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमा रही थीं. सब विदेशों में लिस्टेड हैं. एक भी भारत में नहीं. आप एक ऐसी जंग से चोट खा सकते हैं जिसमें आप शामिल नहीं और उससे फ़ायदा उठाने वाली कंपनियां ख़रीद भी नहीं सकते. यही होता है जब पोर्टफ़ोलियो डाइवर्सिफ़ाइड नहीं हो.

सिर्फ़ एक जंग की बात नहीं है

दुनिया के कुल शेयर बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी क़रीब 4.5 प्रतिशत है. AI, सेमीकंडक्टर, क्लाउड कंप्यूटिंग और बायोटेक में आगे चल रही कंपनियां यहां लिस्टेड नहीं हैं. हमारे पास कोई Nvidia नहीं, कोई TSMC नहीं, कोई Microsoft नहीं, कोई ASML नहीं. अगर आपकी पूरी ज़िंदगी में जो सबसे बड़ी कंपनियां बनेंगी वो कहीं और लिस्टेड हैं, तो उनमें से एक में भी निवेश न करना एक ऐसा फ़ैसला है जो आगे चलकर अजीब लगेगा.

एक और बात. भारत और अमेरिकी बाज़ार के बीच ऐतिहासिक रूप से लगभग 0.5% का सहसंबंध (correlation) रहा है. यानी,  ये अक्सर अलग-अलग दिशाओं में चलते हैं, बाक़ी उभरते बाज़ारों के साथ भारत का सहसंबंध क़रीब 0.9% हैं. असल में जो डाइवर्सिफ़िकेशन काम करता है, वह दूसरे उभरते बाज़ारों में जाने से नहीं, बल्कि विकसित बाज़ारों में जाने से होता है.

और आज़ादी के बाद से हर दशक में रुपया डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ है. यह कोई अनुमान नहीं है. यह तथ्य है. डॉलर में रखा कोई भी निवेश हर साल रुपये के हिसाब से 3 से 4 प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़त देता है. एक ऐसा फ़ायदा जिसे ज़्यादातर भारतीय निवेशक यूं ही छोड़ देते हैं.

एक बड़ी समस्या जो 2024 में दूर हो गई

सालों तक इंटरनेशनल फ़ंड पर होने वाले फ़ायदे पर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से, यानी 30 प्रतिशत तक, टैक्स लगता था. यह फ़र्क़ असली था और बड़ा नुक़सान पहुंचाता था. 2024 के टैक्स बदलाव ने इसे ख़त्म कर दिया. अब इंटरनेशनल फ़ंड पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5% टैक्स लगता है. यह घरेलू इक्विटी फ़ंड के बराबर है. 20 साल की SIP पर यह एक बदलाव ₹87 लाख के कॉर्पस में क़रीब ₹11 लाख जोड़ देता है. आप ज़्यादा नहीं कमाते. बस ज़्यादा रख पाते हैं.

अब क्या करें

ज़्यादातर निवेशकों को अपनी इक्विटी का 15 से 20 प्रतिशत इंटरनेशनल फ़ंड में रखना चाहिए. लेकिन कौन से फ़ंड अभी खुले हैं, कौन से ख़रीदने लायक़ हैं और प्रीमियम से कैसे बचें, यह उतना आसान नहीं जितना लगता है. असल में, RBI की विदेशी निवेश की लिमिट के चलते कई बेहतरीन विकल्प बंद हो गए हैं.

हम इस शनिवार, 25 अप्रैल को फ़ंड एडवाइज़र लाइव में इसी मुद्दे को कवर करेंगे. कौन से इंटरनेशनल फ़ंड हम सुझाते हैं, उन्हें कैसे ख़रीदें और कितना निवेश करें. अगर आप इस बारे में सोचते रहे हैं लेकिन अभी तक क़दम नहीं उठाया, तो शनिवार इस सोच पर अमल करने का सबसे छोटा रास्ता है.

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Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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