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सारांशः 10 साल तक कोई भी देख सकता था कि उनके फ़ंड हाउस के CEO को कितना मिलता है. असली नंबर, नाम के साथ, वेबसाइट पर दो मिनट में. SEBI के नए प्रस्ताव से यह नाम हट जाएंगे और सिर्फ़ कुल आंकड़े रहेंगे.
10 साल तक आप देख सकते थे कि आपके फ़ंड हाउस के CEO की कमाई क्या है. असली नंबर, उनके नाम के साथ. CIO, COO, टॉप 10 कमाने वाले और ₹1.02 करोड़ से ज़्यादा पाने वाले सबके बारे में. AMC की वेबसाइट पर दो मिनट में.
SEBI यह बंद करना चाहता है.
10 जून को कंसल्टेशन पेपर आया. नाम की जगह कुल आंकड़े देने का विचार है. CEO, CIO और COO के लिए एक मिला-जुला नंबर. टॉप 10 के लिए एक. तय सीमा से ऊपर सबके लिए एक, साथ में उन लोगों की संख्या. तो आपको पता चलेगा कि फ़ंड हाउस ने 40 लोगों को ₹120 करोड़ दिए. यह नहीं पता चलेगा कि CEO ने ₹5 करोड़ लिए या ₹25 करोड़. आप नहीं देख पाएंगे जब किसी फ़ंड मैनेजर की तनख़्वाह एक साल में दोगुनी हो जाए जबकि उसका फ़ंड कहीं नहीं गया.
अब ज़्यादातर निवेशकों ने वो सैलरी पेज कभी खोला भी नहीं और इंडस्ट्री को यह पता है. SEBI को उसका जवाब साफ़ कहता है: निवेशक प्रदर्शन और लागत देखते हैं, सैलरी नहीं.
लेकिन सैलरी ही लागत है. उस ₹120 करोड़ का हर रुपया उस एक्सपेंस रेशियो से आता है जो आप चुकाते हैं. यह आपका पैसा है जिसकी बात हो रही है.
और यह कभी नहीं कहा गया कि खुलासा इसलिए काम करता है कि बहुत लोग पढ़ते हैं. यह इसलिए काम करता है कि कोई भी पढ़ सकता है. जिस CEO की सैलरी सार्वजनिक वेबपेज पर हो वो उससे थोड़ा अलग बर्ताव करता है जिसकी सैलरी एक बड़े आंकड़े में छुपी हो. अगर शक हो तो ख़ुद से पूछिए कि इंडस्ट्री 10 साल से इस नियम से क्यों लड़ रही है.
लड़ती रही है. जब 2016 में नियम आया तो कुछ फ़ंड हाउस ने आख़िरी तारीख़ ही पार कर ली. कुछ ने नंबर वेब फ़ॉर्म के पीछे छुपा दिए जो सैलरी दिखाने से पहले फ़ोलियो नंबर, PAN, रजिस्टर्ड मोबाइल और जन्म तारीख़ मांगते थे. SEBI को कहना पड़ा कि ये फ़िल्टर हटाएं और इन्हें ग़ैरज़रूरी और नुकसानदेह बताया. उसके बाद लड़ाई AMFI में चली गई जो अपनी बात भेजती रही. AMFI ने तीन बातें मांगी और तीनों मिलीं, लगभग शब्द-दर-शब्द.
दलीलें पुरानी हैं. आप यूनिटहोल्डर हैं, शेयरहोल्डर नहीं. निजता. PMS और AIF कंपनियों को खुलासा नहीं करना पड़ता इसलिए वो टैलेंट ले जाती हैं. इनमें से कुछ सच भी है. लेकिन 2016 में भी यही सब सच था जब SEBI ने सुना और फ़ैसला किया कि निवेशक पहले आते हैं. तब से बदला कुछ नहीं सिवाय नियामक की सोच के.
और याद रखिए, भारत के 53 में से सिर्फ़ 7 AMC लिस्टेड हैं. हां, हर AMC को अपनी सालाना रिपोर्ट वेबसाइट पर डालनी होती है, लेकिन उससे कंपनी स्तर के वित्तीय आंकड़े मिलते हैं. बड़े अधिकारियों की नाम-वार सैलरी बोर्ड की रिपोर्ट में सिर्फ़ लिस्टेड कंपनियों के लिए होती है. बाकी 46 के लिए यह वेबपेज ही एकमात्र जगह थी जहां आप देख सकते थे कि किसने क्या कमाया.
प्रस्ताव में एक सुविधा है. फ़ंड मैनेजर की तनख़्वाह, पहली बार स्कीम-दर-स्कीम. फ़ंड मैनेजर आपका पैसा चलाता है इसलिए यह असल में पूरी बात में सबसे उपयोगी नंबर है. लेकिन शर्तें देखिए. यह किसी वेबसाइट पर नहीं होगा; मांगना पड़ेगा. स्कीम के सभी मैनेजरों का एक मिला-जुला आंकड़ा मिलेगा. और सिर्फ़ उन्हीं स्कीम के बारे में पूछ सकते हैं जो पहले से आपके पास हैं. यह नंबर आपका फ़ैसला सिर्फ़ तभी बदल सकता है जब आप पैसा लगाने से पहले हों. और ठीक तभी आप यह नहीं ले सकते.
टिप्पणियां 30 जून तक बंद हो जाएंगी. फ़ॉर्म sebi.gov.in पर है, 10 मिनट लगते हैं और हर प्रस्ताव पर अलग-अलग सहमति या असहमति जता सकते हैं. फ़ंड हाउस अपनी राय ज़रूर भेजेंगे. उन्हें अकेला मत छोड़िए.
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