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इंश्योरेंस रेगुलेटर के भीतर आख़िर क्या बदल गया?

IRDAI का एक कंसल्टेशन पेपर किसी पॉलिसी प्रपोजल से ज़्यादा जांच-पड़ताल जैसा लगता है और इस इंडस्ट्री पर नज़र रखने वाले किसी के लिए भी ये हैरानी की बात है

IRDAI का एक कंसल्टेशन पेपर किसी पॉलिसी प्रपोजल से ज़्यादा जांच-पड़ताल जैसा लगता है और इस इंडस्ट्री पर नज़र रखने वाले किसी के लिए भी ये हैरानी की बात हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः दशकों तक भारत का इंश्योरेंस रेगुलेटर इस बारे में बहुत कम बोला कि ये इंडस्ट्री ख़रीदारों को असल में कितनी महंगी पड़ती है. अब उसका अपना कंसल्टेशन पेपर इंश्योरेंस कंपनियों को कोड से पहचानता है और उन तरीक़ों पर आंकड़े सामने रखता है जिनके बारे में बरसों से दबी ज़ुबान में बातें होती रही हैं. IRDAI के अंदर कुछ तो बदला है. ज़्यादा मुश्किल सवाल ये है कि क्या ये बदलाव टिकेगा.

पिछले महीने जब IRDAI ने इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन पर अपना कंसल्टेशन पेपर जारी किया, तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि इसमें कहने लायक ज़्यादा कुछ होगा. लेकिन मुझे बड़ी हैरानी हुई. पेपर के आंकड़े बेहद बेबाक और असाधारण रूप से बारीक थे और मुझे इतनी दिलचस्प बातें मिलीं कि दो हफ़्तों में दो कॉलम लिख डाले. पहले कॉलम में IRDAI के बेनेफ़िट डेटा से दिखाया कि इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी सरेंडर की वजह से जितना पैसा चुकाती हैं, वो गुज़र चुके पॉलिसीहोल्डर्स के परिवारों को दी जाने वाली रक़म का पांच गुना है. दूसरे में शिकायतों के आंकड़ों से दिखाया कि जो पॉलिसीहोल्डर शिकायत करते हैं और उसे आगे बढ़ाते रहते हैं, वो इस प्रक्रिया के हर पड़ाव पर इंश्योरेंस कंपनियों से ज़्यादा बार जीतते हैं. मैं सचमुच दशकों से इस इंडस्ट्री के बिगड़े हुए इंसेंटिव्स पर लिखता आया हूं, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि मेरी बात को सही साबित करने वाले आंकड़े ख़ुद IRDAI जारी करेगा.

मीडिया और सोशल मीडिया ने इस पेपर में प्रस्तावित कमीशन कैप पर ख़ूब बात की है, लेकिन मेरा सवाल अलग है: इतना बेबाक दस्तावेज़ आख़िर बना कैसे?

अगर आप इसका दूसरा हिस्सा पलटें, तो लगभग हर पन्ने पर ऐसे आंकड़े हैं जो IRDAI ने पहले कभी जारी नहीं किए. कुछ उदाहरण देखिए: अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियों को कोड से पहचाना गया है और लागत के हिसाब से उनकी रैंकिंग की गई है. अलग-अलग बैंकों के बारे में बताया गया है कि उन्होंने कितनी इंश्योरेंस कंपनियों से टाई-अप किया है और हर टाई-अप की लागत कितनी है. एक जगह पता चलता है कि कुछ इंश्योरेंस कंपनियों में ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस का कमीशन प्रीमियम के 93% तक पहुंच जाता है. रेगुलेटर के अपने शब्दों में ये "असामान्य और उम्मीद के उलट" है, क्योंकि ग्रुप स्कीमों में आमतौर पर क्लेम कम होते हैं और कॉरपोरेट ख़रीदार के पास मोलभाव की ताक़त होनी चाहिए. दशकों के अपने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, IRDAI ने ऊंची लागत के बारे में "असामान्य और उम्मीद के उलट" जैसी बात ग़लती से नहीं लिखी. इस तरह की टिप्पणी बताती है कि कुछ तो बदला है.

इसी दस्तावेज़ के दो और दिलचस्प उदाहरण इसी पैटर्न में फ़िट बैठते हैं. जब कोई बैंक सिर्फ़ एक इंश्योरेंस कंपनी से टाई-अप करता है, तो औसत पेआउट नए बिज़नेस प्रीमियम का 13% होता है. लेकिन जिन बैंकों का टाई-अप कई इंश्योरेंस कंपनियों से होता है, वहां औसत पेआउट बढ़कर 33% हो जाता है और 72% तक पहुंच सकता है. बैंक के भीतर इंश्योरेंस कंपनियां बिज़नेस पाने के लिए होड़ करती हैं और इसका नतीजा ये हो सकता है कि ग्राहक को बेहतर के बजाय और ख़राब डील मिले. बैंक उसी इंश्योरेंस कंपनी की पॉलिसी आगे बढ़ाएगा जो उसे सबसे ज़्यादा पैसा देती है, न कि उसकी जो ग्राहक के लिए सही हो.

दूसरा उदाहरण व्हीकल इंश्योरेंस का है. कोई भी गाड़ी इंश्योरेंस के बिना शोरूम से बाहर नहीं निकल सकती, इसलिए ये इंडस्ट्री का एक अनोखा कोना है जहां बिक्री सिर्फ़ इस बात पर टिकी होती है कि कौन-सी इंश्योरेंस कंपनी चुनी जाए, इस पर नहीं कि इंश्योरेंस ख़रीदना है या नहीं. इसके बावजूद बिचौलियों को औसतन 38% तक कमीशन मिलता है और डीलर्स का ग्राहकों पर किसी ख़ास इंश्योरेंस कंपनी को चुनने का दबाव डालने जैसी गड़बड़ियां आम हैं. पिछले दो-एक दशकों में जिसने भी नई कार ख़रीदी है, वो इससे अनजान नहीं है. नई बात ये है कि अब रेगुलेटर के अपने, पहले कभी न छपे आंकड़े इस बात को साबित कर रहे हैं.

तो आख़िर बदला क्या? जिन लोगों से मैंने बात की, उनमें से ज़्यादातर कहते हैं कि इसकी वजह लीडरशिप में बदलाव है. जुलाई 2025 में अजय सेठ IRDAI के चेयरमैन बनाए गए. वो करियर ब्यूरोक्रेट हैं, जिन्होंने दशकों वित्त मंत्रालय में बिताए और इकोनॉमिक अफ़ेयर्स सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए. बेशक, सिर्फ़ एक नियुक्ति से कोई संस्था अपने आप नहीं बदल जाती. सरकार के एक बड़े हिस्से ने भी आख़िरकार ये माना होगा कि इस इंडस्ट्री की गड़बड़ियां अब बहुत आगे निकल चुकी हैं.

ये पेपर मुझे उम्मीद तो देता है, लेकिन इससे आंख मूंदकर आशावादी नहीं हो जाना चाहिए. याद रखिए कि LIC और बड़ी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों की मालिक भी यही सरकार है. इंश्योरेंस को रेगुलेट करने की प्रक्रिया में ये हितों का बड़ा टकराव है. कोई भी असली सुधार मुनाफ़े में कटौती करेगा और इससे इंश्योरेंस कंपनियों से सरकार को मिलने वाला डिविडेंड भी घटेगा. इसका मतलब ये नहीं कि ये पेपर दिखावटी है. पेपर में जो कुछ है, वो तो इसके ठीक उलट कहानी कहता है. मैं बस इतना कह रहा हूं कि किसी भी इलाज की असली परीक्षा ये नहीं होती कि डायग्नोसिस कितना अच्छा है या कौन-सा इलाज प्लान किया जा सकता है, बल्कि ये होती है कि मरीज़ की हालत सुधरती है या नहीं. यहां इसका मतलब है फ़ाइनल रेगुलेशन और ये कि इंडस्ट्री के ऐतराज़ों के बावजूद कमीशन कैप टिक पाते हैं या नहीं.

मैं लंबे समय से IRDAI पर नज़र रखता आया हूं और कभी उम्मीद की ज़्यादा वजह नहीं मिली, लेकिन पहली बार मुझे उम्मीद है.

यह भी पढ़ेंः आसान हिस्सा हो जाएगा, मुश्किल काम बाक़ी रहेगा

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