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सारांश: जब इंश्योरेंस ग़लत तरीक़े से बेचा जाता है, तो असल में किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए: पॉलिसी बेचने वाले व्यक्ति को या उस सिस्टम को जो बिक्री के लिए इनाम देता है? एक नया रेगुलेटरी प्रस्ताव एक अहम सवाल उठाता है, लेकिन हो सकता है कि यह ज़्यादा मुश्किल सवाल का जवाब न दे पाए.
बीमा नियामक ने कुछ ऐसा प्रस्ताव रखा है जो मिस-सेलिंग की असली जवाबदेही जैसा लगता है. मैं आपको बताना चाहता हूं कि क्यों इसका सिर्फ़ आधा हिस्सा ही होने की संभावना है और बाक़ी के लिए आपको ख़ुद क्या करना होगा.
पिछले हफ़्ते दिल्ली में इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन के रजत जयंती समारोह में, बीमा नियामक IRDAI के चेयरमैन अजय सेठ ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिससे असहमत होना मुश्किल है, कि हर पॉलिसी को सिर्फ़ बैंक या ब्रोकिंग फ़र्म तक नहीं, उस व्यक्ति तक ट्रेस किया जा सके जिसने उसे बेचा. एक पब्लिक रजिस्टर में यह दर्ज होगा, ताकि जब किसी को टर्म कवर की जगह महंगा एंडोमेंट प्लान बेचा जाए, तो बेचने वाले की पहचान हो सके और उसका रिकॉर्ड एक नौकरी से दूसरी नौकरी तक उसके साथ जाए. यह असली जवाबदेही की शुरुआत जैसा लगता है और एक सीमित मायने में है भी.
सेठ की तारीफ़ इस बात के लिए भी बनती है कि वे सिर्फ़ रजिस्टर पर नहीं रुके. इन्हीं टिप्पणियों में, और उसके बाद के इंटरव्यू में, उन्होंने बिक्री के फ़ायदे को कारोबार की मात्रा की बजाय सलाह की क़्वालिटी से जोड़ने की बात कही, अनुपयुक्त बिक्री को ऐसी चीज़ बनाने की बात कही जिसके लिए इंश्योरर को इनाम नहीं बल्कि सज़ा मिले और इन प्रोडक्ट्स को बेचने के तरीक़े में एक बड़े सुधार की बात कही. यह ऐसा नियामक नहीं है जो इंसेंटिव की अहमियत भूल गया हो. उन्होंने समस्या के दोनों उपाय बताए हैं. दिक़्क़त यह है कि इन दोनों उपायों के लागू होने की संभावना बराबर नहीं है.
इससे मुझे चार्ली मंगर की सबसे काम की बात याद आती है कि अगर आप उसे इंसेंटिव दिखाएं, तो वह आपको नतीजा दिखा देगा. दोनों उपायों में से एक, आख़िर में, सिर्फ़ एक डेटाबेस है जो यह दर्ज करता है कि किसने क्या किया और यह डिस्ट्रिब्यूशन बिज़नेस का कुछ नहीं बिगाड़ता, क्योंकि इससे कमाई के किसी मौजूदा ज़रिए को कोई ख़तरा नहीं है. दूसरा इंडस्ट्री से उन्हीं कमीशन में कटौती मांगता है जो बैंक काउंटर, ब्रोकर नेटवर्क, और उस पूरे तंत्र को चलाते हैं जिसके ज़रिए ज़्यादातर पॉलिसी बेची जाती हैं. यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि इन दोनों में से कौन-सा लागू होगा और कौन-सा एक डिस्कशन पेपर बनकर रह जाएगा, फिर एक कंसल्टेशन और आख़िर में इतना साधारण सर्कुलर कि सेल्स की मशीन वैसे ही चलती रहे.
मैंने हाल में देखा है कि कुछ कार बनाने वाली कंपनियों ने अपनी गाड़ियों में स्टेपनी देना बंद कर दिया है, इसकी जगह सिर्फ़ पंक्चर रिपेयर किट दी जा रही है. शहर में यह किसी हद तक चल सकता है, लेकिन रात के वक़्त हाईवे पर यह किसी हादसे से कम नहीं. इन गाड़ियों को बेचने वाले सेल्समैनों का कोई रजिस्टर कोई नहीं बनाता, क्योंकि हम समझते हैं कि यह फ़ैसला उनके स्तर से ऊपर, क़ीमत या मार्जिन बचाने के लिए लिया गया था, और इसका दोष उस पर है जिसने टारगेट तय किया, न कि उस पर जिसने उसे पूरा किया. हर शोरूम सेल्समैन का स्थायी रिकॉर्ड रखना और जिस बोर्डरूम ने स्टेपनी हटाई उसका नाम तक न लेना, यह हमें बेतुका लगेगा. फिर भी बीमा बेचने वालों का रजिस्टर ठीक यही करता है, यह डेस्क पर बैठे आदमी का नाम लिख लेता है और यह खाली छोड़ देता है कि किसने तय किया कि उस डेस्क से एंडोमेंट ही बेचे जाएं. बीमा ख़रीदार के सामने बैठा एजेंट भी बिल्कुल इसी स्थिति में है, क्योंकि वह उस इंसेंटिव को बनाने वाला नहीं है जिसके हिसाब से वह काम करता है, वह तो बस उसे अंजाम देने वाला है. रजिस्टर उसे चाहे जितनी ईमानदारी से पकड़ ले, जिसने फ़ायदे की यह व्यवस्था बनाई उसे तस्वीर से बाहर ही रखता है.
यही वजह है कि यह वादा कि बेचने वाले का इतिहास उसके साथ चलेगा, सुनने में जितना सख़्त लगता है, असल में उतना है नहीं. आप एक्ज़िक्यूटर (मिस-सेलिंग करने वाले) को जितना चाहें उतना ट्रेस करते रहिए, उसी सेटअप में जो अगला आदमी भर्ती होगा, वह भी बिल्कुल वैसा ही करेगा, क्योंकि यह काम इंसान नहीं, सेटअप कर रहा होता है. जब लाइफ़ इंश्योरर्स के ख़िलाफ़ हर पांच में से एक से ज़्यादा शिकायत पॉलिसी बेचे जाने के तरीक़े को लेकर हो, तो हम एक ऐसा सिस्टम देख रहे होते हैं जो वैसे ही काम कर रहा है जैसा उसे डिज़ाइन किया गया था. सारी शिकायतों का पांचवां हिस्सा ख़ुद बिक्री को लेकर होना कुछ इक्का-दुक्का ख़राब लोगों की बात नहीं, यह मशीन के सामान्य ढंग से चलने की आवाज़ है. कोई रजिस्टर इस समस्या को हल नहीं करेगा. मैंने क़रीब एक साल पहले भी यही बात कही थी, यह सुझाव देते हुए कि ख़रीदारों को ख़ुद संगठित होना चाहिए, क्योंकि और कुछ काम करता नहीं दिखता.
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि रजिस्टर नहीं बनना चाहिए, बस यह साफ़ रहना चाहिए कि यह क्या कर सकता है और क्या नहीं. जो नियामक मुश्किल वाला आधा हिस्सा भी सच में चाहता, वह दूसरे सिरे से शुरुआत करता, अनुपयुक्त बिक्री को घाटे का सौदा बनाकर पहले, और उसे ट्रेस करने की ज़हमत बाद में उठाता, ताकि रजिस्टर सिर्फ़ यह पुष्टि करने के काम आए कि समस्या पहले से ही घट रही है. जब तक वह दिन नहीं आता, ख़रीदार की अपनी सावधानी ही वह इकलौता रजिस्टर है जिसने कभी उसकी हिफ़ाज़त की है. मुझे ख़ुशी होगी अगर मैंने जो कहा है वह ग़लत साबित हो, लेकिन पैसा जिस दिशा में बहता है, वह हमेशा से एक बेहतरीन भविष्यवाणी करने वाला रहा है.
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