Illustration: Anand Kumar
सारांशः एक सब्सक्राइबर ने पूछा कि Stock Advisor की 9 साल की रेकमेंडेशन इंडेक्स से सिर्फ़ करीब 1 प्रतिशत आगे क्यों हैं. यह लेख इसका जवाब देता है और बताता है कि इस मिले-जुले आंकड़े को कैसे पढ़ें: विनर्स की गिनती से ज़्यादा उनकी जीत का साइज़ क्यों मायने रखता है और गिरते बाज़ार में क्वालिटी पोर्टफ़ोलियो साधारण क्यों दिखते हैं.
कुछ दिन पहले हमने वो किया जो हमारे जैसा कोई कारोबार नहीं करता. जब हमने अपने सब्सक्राइबर्स को मेरे और मेरी टीम के साथ होने वाले नियमित लाइव सेशन के लिए जुटाया, तो शुरुआत ही अपनी सबसे ख़राब स्टॉक रेकमेंडेशन स्क्रीन पर दिखाकर की. ये 15 स्टॉक्स थे जिन्होंने हमारी रेकमेंडेशन के बाद से बाज़ार के मुक़ाबले आधा या उससे भी कम रिटर्न दिया है. इसके बाद हमने अपने मेंबर्स के सवाल लिए.
मैंने ऐसी शुरुआत इसलिए की क्योंकि हाल में निवेशकों के मूड में बदलाव दिखा है. पिछले एक साल से कुछ ज़्यादा वक़्त तक हमारे मेंबर्स के सवालों में डर झलकता था. बाज़ार का हाल बुरा था और लोग जानना चाहते थे कि घबराहट से कैसे बचें. लेकिन पिछले दो-एक महीनों में मूड बदल गया है: बाज़ार लगातार 8 हफ़्तों से गिर रहा है, जैसा आख़िरी बार अप्रैल 2001 में हुआ था. अब लोग पूछ रहे हैं कि इतनी रिसर्च और धैर्य का मतलब क्या है. क्या इसमें से कुछ वाक़ई काम कर रहा है या ये बस एक रस्म भर है?
हमारे एक मेंबर ने यह बात बड़े तीखे अंदाज़ में रखी. उन्होंने कहा कि 9 साल पहले यह सर्विस शुरू होने के बाद से हमारी रेकमेंडेशन BSE500 इंडेक्स से सिर्फ़ क़रीब 1 प्रतिशत आगे हैं. उनका सवाल था कि इतने सालों की मेहनत के बाद बाज़ार पर बस इतनी छोटी-सी बढ़त, जो एक सतर्क निवेशक इंडेक्स फ़ंड से काफ़ी हद तक हासिल कर सकता था?
सवाल जायज़ है और मैं आपको वही ईमानदार जवाब दूंगा जो मैंने उस सेशन में दिया था. मैं उस आंकड़े की सफ़ाई देने की कोशिश नहीं करूंगा, बल्कि यह दिखाऊंगा कि उसे पढ़ा कैसे जाए. सच यह है कि 9 साल का एक मिला-जुला आंकड़ा वो सब कुछ छिपा लेता है जो यह समझने के लिए ज़रूरी है कि कोई एडवाइज़री सर्विस असल में कैसा परफ़ॉर्म करती है.
चलिए, सबसे असहज आंकड़े से शुरू करते हैं. शुरुआत से अब तक हमने 96 रेकमेंडेशन दी हैं और इनमें से आधे से थोड़ी कम ने बाज़ार को पीछे छोड़ा है, बाक़ी ऐसा नहीं कर पाईं. सुनने में यह 'फ़ेल' जैसा लगता है, पर है नहीं और इसकी वजह एक ऐसी बात है जिस पर निवेशक कम ही ध्यान देते हैं.
जब कोई रेकमेंडेशन ग़लत साबित होती है, तो आप ज़्यादा से ज़्यादा उतना गंवा सकते हैं जितना आपने लगाया था और असल में नुक़सान इससे काफ़ी कम होता है. लेकिन जब कोई सही निकलती है, तो फिर फ़ायदा काफ़ी ज़्यादा हो सकता है. यानी गिरने वाला स्टॉक आपके लगाए हर रुपये पर ज़्यादा से ज़्यादा एक रुपया डुबोएगा, जबकि सही निकले स्टॉक सालों तक कंपाउंड होते रहेंगे और हर रुपये पर कई-कई रुपये कमाकर देंगे.
इसलिए विनर्स और लूज़र्स की गिनती बेमानी है. हमारे 96 स्टॉक्स में से 42 की क़ीमत दोगुनी से ज़्यादा हो चुकी है और इनमें से गिने-चुने स्टॉक्स ने पूरे पोर्टफ़ोलियो का बोझ अपने कंधों पर उठाया है. इक्विटी से वेल्थ असल में ऐसे ही बनती है: उन चंद होल्डिंग्स से जिनके साथ आपने धैर्य बनाए रखा, न कि बहुत ऊंचे स्ट्राइक रेट से.
अब बात करते हैं टाइम-फ़्रेम की, क्योंकि जिस मेंबर ने शिकायत की थी कि हमारे एक साल के रिटर्न लंबी अवधि के रिटर्न से बेहतर हैं, उन्होंने अनजाने में ही बता दिया कि एक सच्चा क्वालिटी पोर्टफ़ोलियो कैसा बर्ताव करता है. पिछले एक साल में, जो हम सब जानते हैं कि गिरावट का साल था, हमारी रेकमेंडेशन इंडेक्स से करीब 1 प्रतिशत आगे हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई कमाल नहीं, बल्कि नुक़सान को सीमित रखना है.
अच्छे कारोबार गिरते बाज़ार में कम गिरते हैं, लेकिन उसके बाद चढ़ते भी धीरे हैं. दोनों ही दिशाओं में उनमें उतार-चढ़ाव कम होता है. इसलिए मज़बूत निवेशों वाला पोर्टफ़ोलियो किसी भी वक़्त देखने पर कम प्रभावशाली लगेगा, लेकिन कई सालों में शानदार दिखेगा.
इससे मैं लंबी अवधि में हमारी मामूली बढ़त की असली वजह पर आता हूं. इस पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि यह कोई नाकामी नहीं है. जब हमने यह सर्विस शुरू की थी, तब हमने ITC जैसे ब्लू चिप्स पर काफ़ी भरोसा किया था. पिछले 4-5 सालों में ये स्टॉक्स ठहर-से गए हैं. इन्होंने कमाना बंद नहीं किया है; जब हमने ITC के लिए रेकमेंडेशन दी थी, तब उसकी यील्ड करीब 10 प्रतिशत थी. तब से इसकी कमाई हमारी उम्मीद से बेहतर बढ़ी है और इसने हमें ITC Hotels के शेयर भी दिए हैं.
हालांकि, बाज़ार की ऐसी कंपनियों में दिलचस्पी ही ख़त्म हो गई है, ज़्यादातर इसलिए क्योंकि विदेशी निवेशक लगातार भारत से पैसा निकाल रहे हैं. यह एक साइक्लिकल पैटर्न है और जब हवा बदलेगी तो ये नाम सबसे आगे होंगे, पर तब तक ये हमारे रिटर्न को नीचे खींच रहे हैं.
तो कुल मिलाकर, मैं अपनी बात इस तरह रख रहा हूं. कोई भी एडवाइज़री सर्विस अच्छे दौर में आपको अच्छे आंकड़े दिखा सकती है, लेकिन पैसे देने लायक़ सर्विस की असली परीक्षा यह है कि क्या वो बुरे दौर में ईमानदारी से आपके सामने खड़ी होकर खुलकर बात करेगी.
हमारी सर्विस पर हमारी दी हुई हर रेकमेंडेशन पूरी जानकारी के साथ मौजूद है: हमने उसे कब दिया, उसके पीछे क्या तर्क था और अगर हमने अपनी राय बदली तो कब बदली. यह सब ईमानदारी से ट्रैक करने के लिए हम हर सोमवार हर पिक में काग़ज़ी तौर पर ₹10 लाख का निवेश मानकर चलते हैं और डिविडेंड, बोनस, स्प्लिट वग़ैरह सब कुछ ट्रैक करते हैं, ताकि आपको असलियत दिखा सकें.
यह ईमानदारी और निष्पक्षता उस चीज़ का हिस्सा है जिसके लिए आप साल के ₹9,999 देते हैं. हम यहां आपको सुकून देने वाली कहानियां सुनाने नहीं, बल्कि सच्ची बातें बताने के लिए हैं और चाहते हैं कि आप हमें एक पूरे साइकिल में पूरे पोर्टफ़ोलियो के आधार पर परखें, क्योंकि किसी भी पोर्टफ़ोलियो को परखने का यही सही तरीक़ा है.
हम आपको सच बताना, उसे ख़ुद पढ़ने के टूल्स आपके हाथ में देना और पूरे साइकिल में पूरे पोर्टफ़ोलियो के आधार पर हमें परखने देना पसंद करेंगे, क्योंकि हमारी जैसी सर्विस को परखने का यही एक ईमानदार तरीक़ा है.
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