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सारांशः बाज़ार को सबसे ज़्यादा ग्रोथ का आंकड़ा भाता है, लेकिन ये एडिटोरियल बताता है कि जब तक आप यह न पूछें कि उस ग्रोथ को पाने में कितना ख़र्च आया, तब तक ये आंकड़ा कुछ ख़ास नहीं बताता. बफ़े की कैंडी कंपनी के उदाहरण से यह लेख समझाता है कि शेयरहोल्डर्स के लिए सबसे अच्छे बिज़नेस अक्सर सबसे बोरिंग होते हैं और कवर स्टोरी बताती है कि भारतीय शेयरों के बीच ऐसे बिज़नेस कैसे खोजे जा सकते हैं.
चाहे बच्चा हो, शहर हो या स्क्रीन पर कोई नंबर, हमारी आदत है कि हम ग्रोथ को हमेशा अच्छी चीज़ और सेहत का सबूत मानते हैं. शेयर बाज़ार इसी सोच पर चलता है, और मुझे लगता है कि भारत में ऐसा और भी ज़्यादा है. किसी स्टॉक को बेचने वाली सबसे आसान कहानी हमेशा यही होती है कि कंपनी कितनी बड़ी बनेगी और कितनी जल्दी. चूंकि बाज़ार में क़रीब-क़रीब हर कोई यही मानता है, इसलिए अक्सर ये बात ख़ुद-ब-ख़ुद सच होने लगती है, कम से कम कुछ समय के लिए.
दिक़्क़त ये है कि सिर्फ़ ग्रोथ हमें लगभग कुछ नहीं बताती. ये तब तक एक अधूरा आंकड़ा है, जब तक हम उस ग्रोथ की लागत भी न देखें, यानी उसे हासिल करने में कितना पैसा लगा. एक बिज़नेस तेज़ी से बढ़ सकता है और उसे बहुत कम या बिल्कुल भी कैपिटल की ज़रूरत न पड़े. दूसरा बिज़नेस उसी रफ़्तार से बढ़ सकता है, लेकिन ग्राफ़ की लाइन को ऊपर बनाए रखने के लिए उसे हर तरफ़ ज़्यादा से ज़्यादा निवेश करना पड़े. पहले वाले में शेयरहोल्डर अमीर होते हैं, दूसरे में बस कुछ समय के लिए ख़ुश रहते हैं.
वॉरेन बफ़े ने बिज़नेस को तीन तरह का -शानदार, अच्छे और भयानक- बताकर ये बात समझाई थी. हैरानी की बात यह है कि शेयरहोल्डर्स के लिए जो सबसे अच्छे साबित हुए, उनमें से कई की ग्रोथ सबसे कम थी. उनका पसंदीदा उदाहरण See's Candies है, जो दशकों तक मुश्किल से बढ़ी, लगातार अच्छा-ख़ासा मुनाफ़ा कमाती रही और उसे अतिरिक्त कैपिटल की लगभग कोई ज़रूरत नहीं पड़ी. इसके आंकड़े तो लगभग अविश्वसनीय हैं. इस करिश्माई निवेश की पूरी कहानी जानने के लिए कवर स्टोरी ध्यान से ज़रूर पढ़िए. इसके उलट, रोमांचक कंपनियां तेज़ी से बढ़ीं, अक्सर इसलिए क्योंकि उनकी इंडस्ट्री तेज़ी से बढ़ रही थी. इनमें से कई कंपनियां डूब गईं, कुछ तो एक से ज़्यादा बार. भारत की कई इंडस्ट्रीज़, मिसाल के तौर पर एयरलाइंस में आप यही देख सकते हैं.
इस आकर्षण से बचना मुश्किल है, क्योंकि 'ग्रोथ यानी अच्छी चीज़' वाली सोच हमारे दिमाग़ में गहराई से बैठी हुई है. पसंदीदा इंडस्ट्रीज़ बदलती रहती हैं, एयरलाइंस से इंफ़्रास्ट्रक्चर, फिर ई-कॉमर्स, फिर EV और फिर कुछ और, लेकिन ग्रोथ का लालच वही रहता है. निवेशक ये मानने लगते हैं कि बहुत तेज़ी से बढ़ रही कंपनियों पर आम नियम लागू नहीं होते, लेकिन वो हमेशा लागू होते हैं.
इसलिए निवेशकों के लिए किसी बिज़नेस के बारे में पहला सवाल कोई रोमांचक सवाल नहीं होना चाहिए, जैसे कि वो कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, बल्कि एक नीरस सवाल होना चाहिए, जैसे कि उसकी ग्रोथ की असल लागत क्या है. टॉप लाइन या रोज़ का प्राइस देखना कहीं ज़्यादा रोमांचक (और आसान) है, लेकिन इससे आपके निवेश का कोई भला नहीं होगा.
यही वजह है कि मुझे लंबे समय से वो कंपनियां पसंद नहीं हैं जिनके स्टॉक इस आधार पर ख़रीदे जाते हैं कि भविष्य में किसी दिन क्या हो सकता है, न कि आज क्या हो रहा है. मैं गिनती भूल चुका हूं कि कितनी बार मैंने अपने पाठकों को उन 'डिजिटल' स्टॉक्स से सावधान किया है जिन्होंने कभी पैसा नहीं कमाया. लुभावने वादे सुनना अच्छा लगता है, लेकिन बैंक में पहले से पड़ा कैश उससे कहीं ज़्यादा अच्छा है.
मुझे उम्मीद है कि इन सब बातों से आपको ये नहीं लगेगा कि मैं ग्रोथ को दुश्मन मानता हूं, क्योंकि मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा. संदेश बहुत सीधा है: ग्रोथ बढ़िया है, अगर वो अपना ख़र्च ख़ुद उठाती है. अगर उसे शेयरहोल्डर्स से लगातार सब्सिडी की ज़रूरत पड़ती है, तो वो असल में ग्रोथ है ही नहीं.
दरअसल, हम में से जो लोग ऐसी स्मॉल-कैप कंपनियां खोजना पसंद करते हैं जो आगे चलकर बेहतरीन बिज़नेस बनेंगी, उनके लिए यहां एक बड़ी मुश्किल है. असली खोज यहीं होती है. लेकिन यही वो जगह भी है जहां भविष्य के नगीनों और खोखले, महंगे वादों में फ़र्क़ करना सबसे मुश्किल होता है. महंगी ग्रोथ वाली कंपनियों के मैनेजर हमेशा यही कहेंगे कि ये बस एक दौर है जो गुज़र जाएगा, और सच कहें तो कुछ कंपनियों के मामले में ऐसा होता भी है. असली निवेश, जिसमें हुनर और मेहनत लगती है लेकिन फ़ायदा भी बड़ा होता है, ज़्यादातर बाज़ार के इसी हिस्से में होता है. ये ऊंची ग्रोथ देखकर भावनाओं में बहने से नहीं होता, बल्कि ठंडे दिमाग़ से बिज़नेस को परखने और स्टॉक्स को नकारने की हिम्मत रखने से होता है.
यही बात निवेश को मुश्किल भी बनाती है और फ़ायदेमंद भी. हमारी कवर स्टोरी, 'Good Stocks. Fair Prices', इन तीन तरह के बिज़नेस को समझाती है और बताती है कि Value Research Stock Ratings की मदद से भारतीय स्टॉक्स में इन्हें कैसे पहचानें.
