Anand Kumar/AI-Generated Image
सारांशः 1990 के दशक के आख़िर में बैंडविड्थ को 'न्यू ऑयल' (new oil) कहा जाता था और Global Crossing ने महासागरों और महाद्वीपों के पार फ़ाइबर बिछाने के लिए भारी क़र्ज़ लिया. मांग सच में असीमित निकली. फिर भी इसका अंत इतिहास के सबसे बड़े दिवालियेपन में से एक में क्यों हुआ और आज AI पर नज़र गड़ाए छोटे निवेशक के लिए इसमें क्या संदेश है?
जैसा कि अब तक सब जानते हैं, Microsoft ने 60,000 कर्मचारियों को अपनी मर्ज़ी से नौकरी छोड़ने (वॉलंटरी एग्ज़िट) का ऑफ़र दिया है, जो उसकी कुल वर्कफ़ोर्स का क़रीब एक-चौथाई है. इसका मतलब ये नहीं कि वो अपने एक-चौथाई कर्मचारियों को निकाल रही है. इस साल की शुरुआत में जब उसने 9,000 कर्मचारियों को ऐसा ही ऑफ़र दिया था, तो क़रीब 30% ने इसे मंज़ूर किया था. दिलचस्प बात यह है कि ये ऑफ़र उसी साल आ रहे हैं जिस साल कंपनी AI की क्षमता खड़ी करने पर क़रीब 175 अरब डॉलर (लगभग ₹15 लाख करोड़) ख़र्च कर रही है.
इस मामले पर सोशल मीडिया की टिप्पणियों में मुझे सबसे दिलचस्प यह लगता है कि आप डर फैलाने वाले किस शख़्स की बात मानते हैं, उसके हिसाब से आप दो बिल्कुल उलटी तस्वीरों में से किसी एक पर पहुंच सकते हैं. एक ख़ेमा इसे इस बात का सबूत मानता है कि बड़ी कंपनियों में (कम से कम सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री में) AI इतना असरदार काम कर रहा है कि उन्हें अब बहुत कम लोगों की ज़रूरत है और आने वाले समय में शायद ही किसी की ज़रूरत पड़े. दूसरे ख़ेमे का मानना है कि AI में भारी निवेश इन कंपनियों की माली हालत बिगाड़ रहा है और ये निवेश फ़ायदा देने से इतने दूर हैं कि कंपनियां तबाही की ओर बढ़ रही हैं.
दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं और लोग जिस जोश से इनमें से किसी एक को पकड़ लेते हैं, उससे मुझे लगता है कि असल में किसी को कुछ नहीं पता. सच कहूं तो, मेरा ध्यान क़रीब 30 साल पीछे यानी उस आख़िरी दौर में चला जाता है, जब पूरी दुनिया को लगता था कि भविष्य बनाया जा रहा है.
1990 के दशक के आख़िर में, जब ये साफ़ हो गया कि इंटरनेट दुनिया भर में छा जाने वाला है, तो कुछ गिनी-चुनी कंपनियों ने तय किया कि आने वाले सालों में फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल के एक विशाल ग्लोबल नेटवर्क की ज़रूरत पड़ेगी. उन्होंने महासागरों और महाद्वीपों के पार ये फ़ाइबर बिछाने के लिए भारी-भरकम क़र्ज़ लिया. उस दौर की पोस्टर बॉय थी बड़े ही दिलचस्प नाम वाली एक कंपनी, Global Crossing, जिसकी शुरुआत 1997 में हुई थी. Global Crossing ने दुनिया भर में फ़ाइबर का जाल बिछाने पर 10 अरब डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए और 2000 की शुरुआत में, जब डॉटकॉम बूम ज़ोरों पर था, उसकी वैल्यू क़रीब 50 अरब डॉलर के पीक पर पहुंच गई. उस दौर में बैंडविड्थ को 'न्यू ऑयल' कहा जाता था और सबको पक्का यक़ीन था कि इसकी मांग असीमित होगी और डेटा की पाइपलाइनों का जो भी मालिक होगा, भविष्य पर उसी का राज होगा.
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आख़िर में हुआ ये कि मांग तो सच में असीमित निकली, लेकिन टाइमिंग पूरी तरह ग़लत थी. डेटा ट्रैफ़िक उस वक़्त आया जब क़र्ज़ चुकाने की तारीख़ें कई साल पहले निकल चुकी थीं. इसलिए 2002 की शुरुआत में, अपनी पीक वैल्यूएशन के सिर्फ़ 2 साल बाद, Global Crossing ने इतिहास के सबसे बड़े दिवालियेपन में से एक के लिए अर्ज़ी दी. उसने जो फ़ाइबर-ऑप्टिक केबल बिछाई थी, उसका बड़ा हिस्सा सालों तक बिना इस्तेमाल के पड़ा रहा. लेकिन दिवालियेपन के दौरान दूसरों ने वो फ़ाइबर सस्ते में ख़रीद लिया और वो आज भी इस्तेमाल हो रहा है. इसलिए पूरी तरह मुमकिन है कि मेरे ये शब्द उसी के ज़रिए आप तक पहुंच रहे हों. आधुनिक इंटरनेट की रीढ़ तो तैयार हो गई. जिन्होंने इसे बनाया वो दिवालिया हो गए, लेकिन आख़िरकार उस एसेट ने अपना काम कर दिखाया.
ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ था. 1840 के दशक में ब्रिटेन का 'रेलवे मेनिया' भी कुछ ऐसी ही कहानी थी. निवेशकों का पैसा डूब गया, लेकिन उनके पैसे से रेलवे लाइनों की वो पहली पीढ़ी बनी, जिसने आगे कई दशकों तक वहां की अर्थव्यवस्था का बोझ उठाया.
भले ही मेरी कहानियां 'अंत भला तो सब भला' जैसी लगें, लेकिन आज निवेश करने की सोच रहे लोगों को इनसे कोई मदद नहीं मिलती. AI डेटा सेंटर्स और दूसरे एसेट्स में जो भारी भरकम पैसा झोंका जा रहा है, वो आख़िरकार न सिर्फ़ काम आएगा, बल्कि उनके बिना काम ही नहीं चलेगा, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि फ़ायदा उन्हीं को मिलेगा जो आज क़र्ज़ लेकर ख़र्च कर रहे हैं.
तो आकार ले रही इस क्रांति को लेकर छोटे निवेशक को क्या करना चाहिए? मेरा सीधा-सा जवाब है: कुछ नहीं. न आप, न मैं, और शायद दुनिया में कोई भी ये नहीं बता सकता कि AI वरदान है, तबाही है या बुलबुला. शायद ये सब कुछ एक साथ है, लेकिन ये बताना नामुमकिन है कि कब और किस क्रम में. ख़बरों के आधार पर निवेश करने का लालच हमेशा रहता है, लेकिन फ़िलहाल, निवेश के लिहाज़ से, हमारा काम उस मशीन को अनदेखा करना है जो ऐसी कहानियां लगातार गढ़ती रहेगी.
जैसा कि मेरी सलाह में अक्सर होता है, बोरिंग बने रहना ही हमें बचाएगा. हमें ऐसे बिज़नेस में हिस्सेदारी रखनी चाहिए (सीधे शेयरों या इक्विटी फ़ंड्स के ज़रिए) जिन्हें हम इतनी अच्छी तरह समझते हों कि सालों के शोर-शराबे के बीच भी उन्हें थामे रख सकें, या ज़रूरत पड़ने पर उस शोर के बावजूद बेच सकें. भविष्य का अंदाज़ा लगाने के बजाय, अपनी बचत की दर और धैर्य को अपना काम करने दें. मुझे सबसे ज़्यादा भरोसा बड़े दायरे वाले, कम लागत के निवेशों की कहानी पर है, क्योंकि ये हमेशा कारगर रहे हैं. AI का इस्तेमाल एक बेहतर निवेशक बनने के लिए करें, न कि उसे निवेश की चीज़ समझें. फ़िलहाल, यही उसकी असली ख़ूबी है.
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